Friday, 6 March 2026

बोलावें तें आम्ही आतां अबोलणें । एकाचि वचनें सकळासि ॥

एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए आमंत्रित किया। वह फकीर बड़ी खुशी से राजी हो गया। लेकिन मस्जिद में जाने के बाद, जहां कि गांव के बहुत से लोग इकट्ठा हुए थे, उस फकीर ने मंच पर बैठ कर कहा: मेरे मित्रो, मैं जो बोलने को हूं, जिस संबंध में मैं बोलने वाला हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? बहुत से लोगों ने एक साथ कहा: नहीं, हमें कुछ भी पता नहीं है। वह फकीर मंच से नीचे उतर आया और उसने कहा: ऐसे अज्ञानियों के बीच बोलना मैं पसंद न करूंगा, जो कुछ भी नहीं जानते। जो कुछ भी नहीं जानते हैं उस विषय के संबंध में जिस पर मुझे बोलना है, उनके साथ कहां से बात शुरू की जाए? इसलिए मैं बात शुरू ही नहीं करूंगा। वह उतरा और वापस चला गया।
वह सभा, वे लोग बड़े हैरान रह गए। ऐसा बोलने वाला उन्होंने कभी देखा न था। लेकिन फिर दूसरा शुक्रवार आया और उन्होंने जाकर उस फकीर से फिर से प्रार्थना की कि आप चलिए बोलने। वह फकीर फिर से राजी हो गया और मंच पर बैठ कर उसने फिर पूछा, मेरे मित्रो, मैं जिस संबंध में बोलने को हूं, क्या तुम्हें पता है वह क्या है? उन सारे लोगों ने कहा: हां, हमें पता है। क्योंकि नहीं कह कर वे पिछली दफा भूल कर चुके थे। उस फकीर ने कहा: तब फिर मैं नहीं बोलूंगा, क्योंकि जब तुम्हें पता है तो मेरे बोलने का कोई प्रयोजन नहीं। जब तुम्हें ज्ञात ही है तो ज्ञानियों के बीच बोलना फिजूल है। वह उतरा और वापस चला गया।
उन गांव के लोगों ने बहुत सोच-विचार कर यह तय किया था कि अब कि बार "नहीं' कोई भी नहीं कहेगा, लेकिन हां भी फिजूल चली गई।

तीसरा शुक्रवार आया। वे सारे लोग फिर उस फकीर के पास गए और उन्होंने कहा कि चलें और हमें उपदेश दें, वह फकीर फिर राजी हो गया। वह मंच पर आकर बैठा और उसने पूछा, मेरे मित्रो, क्या तुम्हें पता है मैं क्या बोलने वाला हूं? उन लोगों ने कहा: कुछ को पता है और कुछ को पता नहीं है। उस फकीर ने कहा: तब जिनको पता है वे उनको बता दें जिनको पता नहीं है। मेरा क्या काम है। वह उतरा और वापस चला गया।

चौथे शुक्रवार को उस गांव के लोगों ने हिम्मत नहीं की कि उस फकीर को फिर से आमंत्रण दें। क्योंकि उनके पास चौथा कोई उत्तर ही न था। तीन उत्तर थे और तीनों समाप्त हो गए थे और तीनों व्यर्थ हो गए थे।
अगर आज मैं भी आपसे यह कहूं, तो आपके पास चौथा उत्तर है? चौथा उत्तर क्या हो सकता है? जो कि यदि दिया गया होता, तो वह फकीर उस दिन वहां बोलता और लोगों से अपने हृदय की बातें कहता। क्या यह नहीं हो सकता था कि वे सारे लोग कोई भी उत्तर न देते और चुप रह जाते? वह चौथा उत्तर होता। वे कोई भी उत्तर न देते और चुप रह जाते। वह चुप रह जाना चौथा उत्तर होता। और जो चुप रह जाने में समर्थ है, वह उस बात को भी समझ सकेगा, जो कही जा रही है। और उस जीवन को भी समझ सकेगा, जो हमारे चारों ओर मौजूद है। लेकिन हममें से चुप रहने में कोई भी समर्थ नहीं है। हम बोलने में समर्थ हैं लेकिन चुप रहने में समर्थ नहीं। हम शब्दों के साथ खेलने में समर्थ हैं लेकिन मौन रह जाने में नहीं। और इसीलिए शायद हम जीवन को गंवा देते हैं।



जो जीवन हमारे चारों तरफ मौजूद है, चाहे उसे कोई परमात्मा कहे और जो जीवन हमारे भीतर मौजूद है, चाहे कोई उसे आत्मा कहे। हम उस जीवन को जानने से वंचित रह जाते हैं क्योंकि हम चुप होने में समर्थ नहीं। जानने के लिए चाहिए साइलेंट माइंड, जानने के लिए चाहिए मौन, जानने के लिए चाहिए एक ऐसा मन जो बिलकुल चुप हो सके। लेकिन हम बोलते हैं, बोलते हैं। जागते हैं तब भी और सोते हैं तब भी। किसी से बात करते हैं तब भी और नहीं बात करते हैं तब भी हमारे भीतर बोलना चल रहा है। यह जो चैटरिंग है, यह जो निरंतर बोलना है, ये जो निरंतर शब्द ही शब्द हैं, इन शब्दों और शब्दों में हमारा मन उस सामर्थ्य को खो देता है, उस शक्ति को खो देता है, उस शांति को खो देता है, उस दर्पण को खो देता है, जिसमें कि जीवन को जाना और जीया जा सकता है। लेकिन शायद हमें इसका कोई स्मरण भी नहीं है।


मनुष्य के पास दो तरह के शब्द हैं। एक तो वे शब्द हैं, जो उसके अनुभव से निर्मित हुए हैं और एक वे शब्द हैं, जिनके साथ उसका कोई अनुभव नहीं है। धर्म और दर्शन और फिलासफी के संबंध में हम जो कुछ जानते हैं, वे दूसरे तरह के शब्द हैं, जिनके साथ हमारा कोई अनुभव नहीं है। और उन शब्दों के आधार पर, जो बिलकुल निष्प्राण, जो बिलकुल डेड और मुर्दा हैं.


हमारे पास भी शब्द पहुंच जाते हैं, अनुभूतियां नहीं पहुंचतीं। सत्य के किनारे पर जो अनुभव किया जाता है, उसे सत्य के किनारे पर ही जाकर अनुभव किया जा सकता है।


मौन हो जाने का पहला सूत्र है: उत्तरों से मुक्त हो जाइए।


जब भी जीवन में कोई अनहोनी और नई घटना घटती है, तो हम पुराने शब्दों से उसकी व्याख्या कर लेते हैं, और उसका नयापन समाप्त हो जाता है और खत्म हो जाता है।... पुराने शब्द फीके पड़ जाते हैं तो हम नये शब्द पकड़ लेते हैं। महावीर पर आज लड़ाई होनी बंद हो गई, शायद मोहम्मद पर भी लड़ाई होनी करीब-करीब बंद हो गई, तो नये नाम आ गए हैं। माक्र्स नया नाम है। इस पर लड़ाई शुरू हो गई। कम्युनिज्म नया शब्द है, इस्लाम-हिंदू पुराने पड़ गए, अब इस पर लड़ाई शुरू हो गई। अब सारी दुनिया में कम्युनिज्म एक शब्द है, जिस पर लड़ाई खड़ी हुई है।

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Osho Ganga : अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-01

ओशो सत्‍संग/ OSHO SATSANG : अंतर की खोज-(विविध)-प्रवचन-01





Monday, 6 October 2025

जालासि पंडित पुराण सांगसी । परि तूं नेणसी मीं हें कोण ॥

जालासि पंडित पुराण सांगसीपरि तूं नेणसी मीं हें कोण ॥ १ ॥
गाढवभरी पोथ्या उलथिशी पानेंपरि गुरुगम्यखुणे नेणशी बापा ॥ २ ॥
तुका कुणबियाचा नेणे शास्त्रमतएक पंढरीनाथ विसंबेना ॥ ३ ॥ 

मैं कौन हूं?-(प्रवचन-01)
पहला प्रवचन- स्वयं की पहचान क्या? 

 मेरे प्रिय आत्मन!
एक छोटी सी कहानी से मैं तीन दिनों की इन चर्चाओं को शुरू करना चाहूंगा।
एक व्यक्ति बहुत विस्मरणशील था। छोटी-छोटी बातें भी भूल जाता था। बड़ी कठिनाई थी उसके जीवन में, कुछ भी स्मरण रखना उसे कठिन था। रात वह सोने को जाता तो अपने कपड़े उतारने में भी उसे कठिनाई होती, क्योंकि सुबह उसने टोपी कहां पहन रखी थी और चश्मा कहां लगा रखा था और कोट किस भांति पहन रखा था वह भी सुबह तक भूल जाता था। तो करीब-करीब कपड़े पहन कर ही सो जाता था ताकि सुबह फिर से स्मृति को कष्ट देने की जरूरत न पड़े। पास में ही एक चर्च था और चर्च के पुरोहित ने जब उसके विस्मरण की यह बात सुनी तो बहुत हैरान हुआ। और एक रविवार की सुबह जब वह आदमी चर्च आया तो उसे कहा कि एक किताब पर लिख रखो कि कौन सा कपड़ा कहां पहन रखा था, किस भांति पहन रखा था ताकि तुम रात में कपड़े उतार सको और सुबह उस किताब के आधार पर उन्हें वापस पहन सको। उस रात उसने कपड़े उतार दिए और किसी किताब पर सब लिख लिया।

सुबह उठा और सब तो ठीक था। टोपी सिर पर पहननी है यह भी लिखा था। कोट कहां पहनना है यह भी लिखा था। कौन सा मोजा किस पैर में पहनना है यह भी लिखा था, कौन सा जूता किस पैर में डालना है यह भी लिखा था। लेकिन वह यह लिखना भूल गया कि खुद कहां है और तब बहुत परेशान हुआ। सब चीजें तो ठीक थीं, और सब चीजें कहां पहननी हैं यह भी ज्ञात था लेकिन मैं कहां हूं, यह वह रात लिखना भूल गया था। वह सुबह मुंह अंधेरे ही पादरी के घर पहुंच गया। नग्न था बिलकुल, पादरी भी देख कर घबड़ा गया और पहचान न पाया। हमारी सारी पहचान तो वस्त्रों की है। नग्न व्यक्ति को देख कर शायद हम भी न पहचान पाएं कि वह कौन है।
पादरी बहुत हैरान हुआ, उसने पूछा, आप कौन हैं और कैसे आए? उस व्यक्ति ने कहाः यही तो पूछने मैं भी आया हंू कि मै कौन हंू और कहां हूं? क्योंकि बाकी सारे वस्त्र तो ठीक हैं लेकिन रात में यह लिखना भूल गया-अपने बाबत लिखना भूल गया। पता नहीं उस धर्म-पुरोहित ने क्या उसे कहा। उससे कोई संबंध भी नहीं। लेकिन इस कहानी से मैं इसलिए इन तीन दिनों की चर्चाओं को शुरू करना चाहता हंू, क्योंकि करीब-करीब इसी हालत में हम सारे लोग हैं। हमें ज्ञात हैं बहुत सी बातें, जीवन का सब कुछ ज्ञात है सिर्फ एक तथ्य को छोड़ कर कि हम कहां हैं और कौन हैं? मैं कौन हंू? इसका हमें कोई भी स्मरण नहीं है। और उस व्यक्ति के साथ बात तो ठीक भी थी, क्योंकि वह और सब बातें भी भूल जाता था इसलिए यह बहुत स्वाभाविक मालूम होता है कि अपने को भी भूल जाए। लेकिन हमारे साथ बड़ी मुश्किल है। हमें और सब बातें तो याद हैं, यह हमें याद नहीं कि हम कौन हैं और कहां है? इसलिए उस पर हंसना उतना उचित नहीं है जितना अपने पर हंसना उचित होगा। विस्मरण उसकी आदत थी। विस्मरण हमारी आदत नहीं है और सब कुछ हमें स्मरण है। सिर्फ एक बात स्मरण नहीं है। इसलिए हम कपड़े भी ठीक से पहन लेते हैं और जूते भी, और घर भी ठीक से बसा लेते हैं, लेकिन जीवन हमारा ठीक नहीं हो पाता है। जीवन हमारा ठीक होगा भी नहीं। जो केंद्रीय है जीवन में उसकी हमें कोई स्मृति नहीं। और मैने कहा कि नग्न जब वह धर्म-पुरोहित के द्वार पर खड़ा हो गया। तो धर्म पुरोहित भी पहचान नहीं पाया कि वह कौन है क्योंकि हम सभी एक दूसरे को वस्त्रों से ही पहचानते हैं। यहां हम इतने लोग आए हैं अगर निर्वस्त्र आ जाएं तो कोई किसी को पहचान भी नहीं सकेगा कि कौन कौन है? लेकिन यह तो ठीक भी है कि हम दूसरों को वस्त्रों से पहचानें। बड़े मजे और आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपने को भी अपने वस्त्रों से पहचानते हैं। अपनी आत्मा का तो हमें कोई स्मरण नहीं, अपने स्वरूप का तो हमें तो कोई बोध नहीं, तो अपने वस्त्रों और बहुत प्रकार के वस्त्र हैं। वस्त्र हम जो पहने हुए हैं वे धन के, पदवियों के, पदों के, सामाजिक प्रतिष्ठा के, अहंकार के, उपाधियों के, वे सारे वस्त्र हैं और उनसे ही हम अपने को भी पहचानते हैं? वस्त्रों से जो अपने को पहचानता है उसका जीवन यदि अंधकारपूर्ण हो जाए, यदि उसका जीवन दुख से भर जाए, पीड़ा और विपन्नता से, तो आश्चर्य नही है क्योंकि वस्त्र हमारे प्राण नहीं हैं, और वस्त्र हमारी आत्मा नहीं हैं। लेकिन हम अपने को अपने वस्त्रों से ही जानते हैं। उससे गहरी हमारी कोई पहुंच नहीं है।
इन तीन दिनों में इन वस्त्रों के बाहर जो हमारा होना है उस तरफ, उस दिशा में कुछ बातें आपसे कहंूगा और यह स्मरण दिलाना चाहूंगा कि जो वस्त्रों में खोया है वह अपने जीवन को गवां रहा है। और जो केवल वस्त्रों में अपने को पहचान रहा है, वह अपने को पहचान ही नहीं रहा है, वह अपने को पा भी नहीं सकेगा। और जो व्यक्ति अपने को ही ना पा सके उसके और कुछ भी पा लेने का कोई भी मूल्य नहीं है। अपने को खोकर अगर सारी दुनियां भी पाई जा सके तो उसका कोई मूल्य नहीं है।
एक और छोटी कहानी मुझे स्मरण आई वह मैं कहूंू और फिर आज की सुबह इस आत्म-विस्मरण के संबंध में जो मुझे कहना है वह आपको कहंूगा। तीन मित्र यात्रा पर निकले। पहली ही रात एक जंगल में उन्हें विश्राम करना पड़ा। खतरनाक स्थान था जंगली जानवरों का डर था। डाकू और लूटेरों का भी भय था। अंधेरी रात थी तो उन तीनों ने तय किया कि एक-एक व्यक्ति जागता रहे, दो सोएं और एक जागा हुआ पहरा दे। एक तो उनमें गांव का पंडित था, एक उनमें गांव का लड़ाका बहादुर क्षत्रिय था, एक गांव का नाई था। नाई को ही सबसे पहले पासा फेंका गया और उसका ही सबसे पहले नाम पड़ा। वह रात पहरा देने के लिए पहले पहर बैठा। नींद उसे जल्दी आने लगी। दिन भर की थकान थी तो किसी भांति अपने को जगाए रखने के लिए उसने बगल में सोए हुए क्षत्रिय मित्र की हजामत बनानी शुरू कर दी। जागे रखने के लिए अपने को उसने अपने मित्र के सारे बाल काट डाले। उसका समय पूरा हुआ। तीसरा जो मित्र था वह था, रात्रि के अंतिम पहर में उस पंडित को पहरा देने को था। उसके तो बाल नहीं थे उसका तो सिर पहले से ही साफ था, उसके सारे बाल गिर गए थे। दूसरे मित्र का जैसे ही मौका आया उस नाई ने उसे उठाया और कहा कि मित्र उठो! तुम्हारा समय आ गया। अब मैं सोऊं। उस क्षत्रिय ने अपने सिर पर हाथ फेरा और देखा बाल बिलकुल भी नहीं हैं तो उसने कहा कि मालूम होता है कि तुमने मेरी जगह भूल से पंडितजी को उठा दिया है। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा और कहा मालूम होता है कि भूल से मेरी जगह पंडितजी को उठा दिया था और वह वापस सो गया। हम अपने को इसी भांति पहचानते हैं। हमारी पहचान हमारे वस्त्रों तक है। अगर बहुत गहरी जाती है तो अपने शरीर तक जाती है। पर वह भी वस्त्र से ज्यादा गहरा नहीं है। और भी गहरी जाती हो तो मन तक जाती है।
मन भी वस्त्रों से ज्यादा गहरा नहीं है। लेकिन उससे गहरी हमारी कोई पहचान नहंीं जाती। जीवन में सारा दुख और सारा अंधकार इस आत्म-अज्ञान से पैदा होता है। केंद्र पर, अपने स्वयं के केंद्र पर अंधकार होता है और हम सारे रास्तों पर दीये जलाने की कोशिश करते हैं। वे सब दीये काम नहीं प.ड़ते। क्योंकि मेरे भीतर अंधकार होता है तो मैं जहां भी जाता हूं अपने साथ अंधकार ले जाता हंू। उन रास्तों पर भी जहां कि मैने प्रकाश के दीये जलाए हैं, मेरे पहुंचने से अंधकार हो जाता है क्योंकि मैं अंधकार हंू। जब तक मैं स्वयं को नही जानता तब तक मैं अंधकार हंू। मैं अपने अंधकार को लिए फिरता हूं जीवन में और सारे लोग अपने-अपने अंधकार को लिए फिरते हैं। हम सब जहां इकट्ठे हो जाते हैं वहाँ अंधकार बहुत घना हो जाता है। एक-एक व्यक्ति उतने अंधकार में है और जहां पूरी मनुष्य-जाति इकट्ठी हो वहां अंधकार बहुत घना हो जाता है। मनुष्य-जाति के पिछले तीन-चार हजार वर्षों का इतिहास इसी अंधकार का इतिहास है। फिर इस अंधकार से संघर्ष पैदा होता है, युद्ध पैदा होते हैं,हिंसा पैदा होती है। इस अंधकार से, ईष्र्या पैदा होती है, घृणा पैदा होती है, क्रोध पैदा होता है। इस अंधकार से विध्वंस पैदा होता है। हम खुद दुखी होते हैं औरों को दुखी करते हैं। ये कोई तीन-चार हजार वर्षों से चला है और अब तक हम सफल नहीं हो पाए हैं इस बात में कि एक ऐसा समाज निर्मित हो सके जिसका जीवन प्रकाश से आलोकित हो, प्रकाश से मंडित हो।
क्या आपको ज्ञात है कि तीन हजार वर्षों में कोई चैदह हजार छह सौ युद्ध हुए। केवल तीन हजार वर्षों में चैदह हजार छह सौ युद्ध, कोई पंद्रह हजार युद्ध। प्रति वर्ष पांच युद्ध। हम शायद लड़ते ही रहे हैं। हमने कुछ और नहीं किया। और ये तो बड़े-बड़े युद्धों की बात है। रोज हम जो छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ रहे हैं उनकी तो कोई गिनती नहीं है। जो हम रोज छोटी-छोटी हिंसा कर रहे हैं उसका तो कोई आकलन नहीं, कोई गणना नहीं है। अगर तीन हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध हमें लड़ने पड़े हों तो क्या इससे यह सूचना नहीं मिलती है कि मनुष्य-जाति का मस्तिष्क किसी बहुत गहरे रोग से पीड़ित है? कोई इन तीन हजार वर्षों में मुश्किल से थोड़े से वर्ष हैं जब युद्ध न हुआ हो और उन वर्षों को भी हम शांति का समय नहीं कह सकते क्योंकि उन क्षणों में हमने नये युद्धों की तैयारियां की हैं। या तो हम लड़ते रहे हैं या हम लड़ने की तैयारियां करते रहे हैं। मनुष्य के पूरे इतिहास को दो खंडों में बांटा जा सकता है। युद्ध के खंड और युद्ध की तैयारियों के खंड। शांति हमने अब तक नहीं जानी। और व्यक्तिगत जीवन में भी हम देखें तो शांति का कहीं भी कोई, कहीं कोई पता नहीं मिलेगा। कोई आनंद की किरण उपलब्ध नहीं होगी। कोई प्रेम का संगीत नहीं सुनाई पड़ेगा। हम सारे लोग यहां इकट्ठेे हैं। कौन अपने भीतर प्रेम के संगीत को अनुभव करता है?
कौन अनुभव करता है अपने भीतर सुगंध को जीवन की, कौन अनुभव करता है जीवन की धन्यता को, कृतार्थता को? एक अर्थहीनता, एक मीनिंगलेसनेस हमें पकड़े है। लेकिन किसी भांति हम जीए जाते हैं कल की आशा में। शायद कल सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जिसका आज गलत है उसका कल कैसे ठीक होगा? क्योंकि कल तो आज से ही निकलेगा, आज से ही पैदा होगा। अगर आज दुख से भरा है तो स्मरण रखें कल आनंद से भरा हुआ नहीं हो सकता है क्योंकि कल का जन्म तो आज से होगा। कल आने वाला जीवन आप पैदा करेंगे उसे आप प्रतिक्षण पैदा कर रहे हैं। तो यदि आज दुखी हैं तो जान लें कि कल भी दुखी रहेंगे। कल की आशा में, कल की सुख की आशा में आज के दुख को झेला तो जा सकता है। लेकिन कल के सुख को निर्मित नहीं किया जा सकता है। कल के आनंद की कल्पना में आज की पीड़ा को सहा जा सकता है लेकिन कल के आनंद को पैदा नहीं किया जा सकता है। इसलिए आनंद है केवल आशा और जीवन है दुख ऐसा हमारे सबके अनुभव में है। यह कोई सिद्धांत की बात नहीं है। जो भी अपने जीवन को थोड़ा सा खोल कर देखेगा उसे यह दिखाई पड़ेगा ये सीधे तथ्य हैं। जीवन के संबंध में पहला तथ्य यही है कि जिस भांति हम उसे जी रहे हैं उस भांति कहीं कोई, कहीं आनंद का फूल उसमें नहीं लगता है और ना लग सकता है। इसीलिए कल की आशा पर, कल ठीक हो जाएगा, कल आने वाले वर्ष या आने वाली जिंदगी में, परलोक में पुर्नजन्म में सब ठीक हो जाएगा ये सब कल की आशा का विस्तार है। कोई सोचता हो कि इस जन्म के बाद अगले जन्म में सब ठीक हो जाएगा। वह उसी तरह की भ्रांति में है जिस तरह की भ्रांति में जो सोचता है आज दुख है कल शांति, कल सुख हो जाएगा। कोई सोचता हो मोक्ष में सब ठीक हो जाएगा तो भ्रांति में है। क्योंकि कल मुझसे पैदा होगा। आने वाला जन्म भी, मोक्ष भी, जो भी होने वाला है वह मुझ से पैदा होगा। और अगर मेरा आज अंधकारपूर्ण है तो कल मेरा प्रकाशित नहीं हो सकता। फिर क्या हम निराश हो जाएं और कल की सारी आशा छोड़ दें? मैं आपसे कहता हंू कि निश्चित ही कल के प्रति कोई आशा रखने का कारण नहीं है।
लेकिन इससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है। आज के प्रति आशा से भरा जा सकता है। आज को परिवर्तित किया जा सकता है। मैं जो हंू उस होने में क्रांति लाई जा सकती है। मैं कल क्या होऊंगा इसके द्वारा नहीं बल्कि जो मैं अभी हंू उसके ज्ञान, उसके बोध उसके प्रति जागरण से, उसे जान लेने से। आत्म स्मृति से क्रांति उत्पन्न हो सकती है। यदि मैं जान सकूं स्वयं को तो वह दीया उपलब्ध हो जाएगा जो मेरे जीवन से अंधकार को नष्ट कर देगा और स्वयं को जाने बिना और न कोई दीया है और न कोई प्रकाश है, न कोई आशा है। पहली बात हम स्वयं को नहीं जानते हैं। ये जान लेना स्वयं को जानने के प्रति पहला चरण है। कोई सोचता हो कि मैं स्वयं को जानता हंू तो स्वयं को जानने के प्रति द्वार बंद हो जायेंगे और धर्म की बहुत सी शिक्षाओं ने, संस्कृति ने इधर हजारों वर्ष से दोहराए गए सिद्धांतों ने, आत्मा और परमात्मा की बातों ने हम में से बहुतों को यह भ्रम पैदा कर दिया है कि हम अपने को जानते हैं। इस भ्रम ने हमारे आत्म-अज्ञान को गहरा किया है। स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा, इन शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा, आत्म-ज्ञान में, और कोई दूसरा अटकाव कोई दूसरी दीवाल, कोई दूसरा अवरोध नहीं है। छोटे से बच्चे भी जानते हैं कि हम आत्मा हैं और बूढ़े भी दोहराते हैं कि हम आत्मा हैं। यह सत्य है, यह सत्ता का अनुभव हो तो जीवन बिलकुल दूसरा हो जाएगा। ये सिद्धान्त हैं, ये स्वयं की प्रतीति और साक्षात हो तो जीवन नया हो जाए और जीवन आनंद से भर जाए।
लेकिन इन शब्दों को हमने सहारों की भांति पकड़ा हुआ है। अज्ञान में इन शब्दों से पैदा हुए झूठे ज्ञान को हमने बहुत तीव्रता से पकड़ा है उसे छोड़ने में भी भय मालूम होता है। इसलिए जैसे-जैसे आदमी मृत्यु के करीब पहुंचता है वैसे-वैसे इन शब्दों को और जोर से पकड़ लेता है। वैसे-वैसे गीता, कुरान और बाइबिल उसके मस्तिष्क पर और जोर से बैठते जाते हैं। वैसे-वैसे वह मंदिरों के द्वार खटखटाने लगता है। और साधु-संन्यासियों के सत्संग में बैठने लगता है ताकि इन शब्दों को जोर से पकड़ ले, ताकि आती हुई मौत के विरोध में कोई सुरक्षा का उपाय बना ले। इसलिए जितने लोग मृत्यु से भयभीत होते हैं वे सभी आत्मा की अमरता में विश्वास कर लेते हैं। उनका यह विश्वास उनका ज्ञान नहीं है। कोई विश्वास कभी ज्ञान नहीं होता। सब विश्वास अज्ञान होते हैं। जीवन के प्रति जो भी हम माने हुए बैठे हैं वह सब हमारा अज्ञान है और उस मानने के कारण ज्ञान तक जाने का सारा द्वार बंद है। स्वयं की स्मृति में, स्वयं के संबंध में प्रचलित सिद्धांत सबसे बड़ी बाधाएं हैं। सिद्धांत तो क्या बाधा हैं हम उन पर विश्वास कर लेते हैं ये बाधा है। हमारे विश्वास बाधा हैं। और जो व्यक्ति जितने ज्यादा विश्वासों से ग्रसित हो जाता है उसके जीवन में विवेक के अवतरण का, विवेक के आगमन का, विवेक के उठने और जगने की संभावना का, उतना ही उसी मात्रा में ह्रास हो जाता है। असंभव हो जाती है यह बात कि हम स्वयं को जान सकें। क्योंकि स्वयं को जानने के सिद्धांत हमें यह भ्रम पैदा कर देते हैं कि हम जानते हैं और ये भ्रम बहुत तलों पर हैं।
एक संन्यासी एक राजा के घर मेहमान था। उस राजा ने सुबह ही आकर उस संन्यासी को पूछा, मैं सुनता हंू कि आप परमात्मा की बातें करते हैं। क्या मुझे परमात्मा से मिला दे सकेंगे? यह बात उस राजा ने अपने जीवन में और भी न मालूम कितने संन्यासियों से पूछी थी। इस संन्यासी से भी पूछी। और जो अपेक्षा थी और जो संन्यासियों ने बातें कही थीं सोचा वही बातें यह संन्यासी भी कहेगा। करीब-करीब संन्यासी एक ही जैसी बातें दोहराते हैं। सोचा यह भी वही कहेगा, कुछ उपनिषद, कुछ वेदों की, कुछ ग्रंथों की, कुछ उद्धरण देगा, कुछ गीता की, कुछ ज्ञान की बातें समझाएगा। लेकिन उस संन्यासी ने क्या पूछा? उस संन्यासी ने कहाः आप ईश्वर से मिलना चाहते हैं तो थोड़ी देर रुक सकते हैं या बिलकुल अभी मिलने की इच्छा है?
वह राजा थोड़ा हैरान हुआ। कोई भी हैरान होता। यह खयाल न था कि बात इस भांति पूछी जाएगी। सोचा शायद समझने में भूल हो गई हैै। उसने कहा कि शायद आप समझे नहीं मैं परमात्मा से, ऊपर जो परमात्मा है उससे मिलने की बात कर रहा हंू। उस संन्यासी ने कहा कि समझने में भूल का कोई कारण नहीं। मैं तो उस परमात्मा के सिवाय और किसी की बात करता ही नहीं। अभी मिलना चाहते हैं या थोड़ी देर ठहर सकते हैं? उस राजा ने कहा कि जब आप कहते ही हैं तो मैं अभी ही मिलना चाहंूगा। ऐसे उसकी कोई तैयारी नहीं थी इतने जल्दी परमात्मा से मिलने की। और किसी की भी इतने जल्दी कोई तैयारी नहीं होती। ईश्वर के खोजियों से पूछा जाए अभी मिलना चाहेंगे। तो वे भी कहेंगे कि हम थोड़ा सोच कर आते हैं विचार करके आते हैं। हम थोड़ा मित्रों से पूछ लें पति हो तो पत्नी से पूछ ले, पत्नी हो तो पति से पूछ ले, हम जरा अपने घर के लोगों से पूछ लें फिर हम लौट कर आते हैं। इसी वक्त तो ईश्वर से मिलने को कौन तैयार होगा। वह राजा भी तैयार नहीं था लेकिन जब बात ही मुसीबत ही आ पड़ी थी सिर पर तो उसने कहा कि ठीक है आप कहते हैं तो मैं अभी मिल लूंगा। संन्यासी ने कहा लेकिन इसके पहले मैं आपको परमात्मा से मिलाऊं यह छोटा सा कागज है इस पर अपना परिचय लिख दें और लिखा उसने जो उसका परिचय था। बड़े राज्य का राजा था, महल का पता, वह सब लिखा।
संन्यासी ने पूछा कि क्या मैं मान लूं कि यही आपका परिचय है? क्या मैं मान लूं कि कल आप भिखारी हो जाएं और राज्य छिन जाए तो बदल जाएंगे?
उस राजा ने कहा कि नहीं, राज्य छिन जाए तो भी मैं तो मैं ही रहंूगा। तो संन्यासी ने कहा कि फिर राजा होना आपका परिचय नहीं हो सकता, क्योंकि राज्य छिन जाने पर भी आप रहेंगे और आप ही रहेंगे व भिखारी होने पर भी आप ही रहेंगे। तो फिर राजा होना आपका परिचय नहीं हो सकता। और यह जो नाम लिखा है, मां-बाप दूसरा नाम भी दे सकते थे और आप भी चाहें तो दूसरा नाम रख ले सकते हैं, उससे भी बदल नहीं जाएंगे। उस राजा ने कहाः नाम से क्या फर्क पड़ता है, मैं तो मैं ही रहंूगा, नाम कोई भी हो। तो संन्यासी ने कहा कि इसका अर्थ हुआ कि आपका कोई नाम नहीं है। नाम केवल कामचलाऊ बात है। कोई भी नाम काम दे सकता है। इसलिए नाम भी आपका परिचय नहीं है। तो फिर क्या मैं मानंू कि आपको अपना परिचय पता नहीं है? क्योंकि दो ही बातें आपने लिखी हैं राजा होना और अपना नाम। उस राजा ने वह कागज वापस ले लिया और कहाः मुझे क्षमा करें। अगर मेरा नाम, मेरा धन, मेरा पद और मेरी प्रतिष्ठा मेरा परिचय नहीं है तो फिर मुझे पता नहीं कि मैं कौन हंू? उस संन्यासी ने कहा फिर परमात्मा से मिलाना बहुत कठिन है क्योंकि मैं किसको मिलाऊं, मैं किसकी खबर भेजूं, कौन मिलना चाहता है?
जाओ और खोजो कि कौन हो और जिस दिन खोज लोगे उस दिन मेरे पास नहीं आओगे कि परमात्मा से मिला दो क्योंकि तुम जिस दिन स्वयं को पा लोगे उस दिन उसे भी पा लोगे जो सबके भीतर है। क्योंकि जो मेरे भीतर है और जो किसी और के भीतर है और जो सबके भीतर है, वह बहुत गहरे में संयुक्त है, और एक है और समग्र है। लेकिन इस ‘मैं’ का तो हमें कोई भी पता नही है। तो या तो हम अपने नाम को, अपने घर को, अपने परिवार को समझते हैं कि यह मेरा होना है, अगर किसी भांति इससे हमारा छुटकारा हो जाए और ये हम जान सकें कि मेरा नाम, मेरा घर, मेरा वंश, मेरा राष्ट्र, मेरी जाति, मेरा धर्म यह मेरा होना नहीं है अगर किसी भांति यह बोध भी आ जाए तो फिर हम तोतों कि भांति उन शब्दों को दोहराने लगते हैं जो ग्रंथों में लिखे हैं और शास्त्रों में कहे हैं। तब हम दोहराने लगते हैं कि मैं आत्मा हंू, मैं परमात्मा हंू। अहं-ब्रह्मास्मि और-और न मालूम क्या-क्या हम दोहराने लगते हैं। मैं आपसे कहंू कि जिस भांति नाम आपको सिखाया गया है उसी भांति ये बातें भी आपको सिखाई गईं हैं इनमें भेद नहीं है। जिस भांति यह कहा गया है कि आप का यह नाम है और आपने पकड़ लिया है, उसी भांति यह भी कहा गया है कि आपके भीतर परमात्मा है और आपने यह भी पकड़ लिया है। इन दोनों बातों में कोई फर्क नहीं है। जब तक हम बाहर से आए हुए शब्दों को पकड़ते हैं तब तक हम स्वयं से परिचित नहीं हो सकेंगे वे शब्द चाहे पिता ने दिए हो, चाहे समाज ने, चाहे ऋषियों ने, मुनियों ने, साधु ने, संतों ने किन्हीं ने भी वे शब्द दिए हों, जब तक बाहर से आए हुए परिचय को हम पकड़ेंगे तब तक उस परिचय का जन्म नहीं हो सकेगा जो हमारा परिचय है। तब तक हम उसे नहीं जान सकेंगे। तब तक उसे जानने का कोई मार्ग नहीं है।
तो या तो हम जिसे सांसारिक कहते हैं उस तरह के परिचय को पकड़ लेते हैं या जिसे आध्यात्मिक कहते हैं उस तरह के परिचय को पकड़ लेते हैं। लेकिन दोनों परिचय पकड़े गए होते हैं। दोनों परिचय बाहर से मिलते हैं। जो परिचय बाहर से मिलता है वह आत्म-परिचय नहीं है। इसलिए यह बात जितनी झूठी है कि मेरा नाम मैं हंू उतनी ही यह बात भी झूठी होगी अगर मैं बाहर से सीखंू कि मैं आत्मा हंू, परमात्मा हंू, मैं अविनाशी हंू, मैं कुछ हंू मैं कुछ हंू ये सारी बातें मैं बाहर से सीखंू तो ये बातें उतनी ही झूठी होंगी। पहली बात झूठी है यह तो हमें समझ में आ जाती है क्योंकि ये बात हजारों वर्ष से दोहराई गई है, लेकिन दूसरी बात भी झूठी है इसे समझने में थोड़ी कठिनाई होती है। क्योंकि तब हम एक अटल अंधकार में छूट जाते हैं और अज्ञान में छूट जाते हैं।
क्योंकि अगर सांसारिक परिचय भी हमारा परिचय नहीं है और तथाकथित आध्यात्मिक परिचय भी हमारा परिचय नहीं है तो फिर हमारा परिचय क्या है? तब हम एक अज्ञान में और अंधकार में छूट जाते हैं और अज्ञान से भय मालूम होता है। अज्ञान से डर मालूम होता है।
मैं अपने को नहीं जानता हंू इस बात के बोध से भयभीत होता है चित्त इसलिए हम कोई न कोई परिचय तो मान लेना चाहते हैं। गृहस्थ का एक परिचय है और संन्यासी का एक परिचय है ये दोनों परिचय झूठे हैं। इनमें से किसी एक को हम पकड़ कर तृप्ति कर लेना चाहते हैं तो गृहस्थी से कोई छूटता है तो संन्यासी हो जाता है और संन्यास में पकड़ जाता है। और एक तरह के वस्त्रों से छूटता है तो दूसरे तरह के वस्त्रों को स्वीकार कर लेता है और एक तरह के नाम से छूटता है तो दूसरा नाम ग्रहण कर लेता है।
संन्यासी का नाम बदल देते हैं हम दूसरा नाम दे देते हैं उसे। कपड़े बदल देते हैं, दूसरे वस्त्र दे देते हैं उसे। उसका ढंग बदल देते हैं दूसरा ढंग दे देते हैं उसे लेकिन उस रिक्त स्थान में छूटने को कोई राजी नहीं है जहां हमारा कोई परिचय नहीं है न सांसारिक और न आध्यात्मिक। उस खाली जगह में खड़े होने को कोई राजी नहीं है। जो उस खाली जगह में खड़े होने को राजी हो जाता है वही केवल स्वयं को जान पाता है। जो अपने सब परिचय छोड़ देता है और अपरिचय में खड़ा हो जाता है। जो अपने संबंध में सारे ज्ञान छोड़ देता है और अज्ञान में खड़ा हो जाता है उसी अज्ञान में, उसी नॉट नोइंग में, उसी न जानने में, जब मुझे कुछ भी पता नहीं अपने बावद। और जो भी पता है उसे मैं छोड़ देता हंू। उसी स्थिति में, उसी क्रांति के क्षण में, वह परिवर्तन घटित होता है जहां स्वयं के बोध का जन्म होता है। जब तक मैं किसी भी परिचय को पकड़ता हंू तब तक उस बोध के पैदा होने की भूमिका खड़ी नहीं होती। जब तक मैं कोई भी सहारा पकड़ता हंू तब तक उसके गिरने का कोई कारण पैदा नहीं होता जो मेरे भीतर सोया है। जब मैं सब सहारा छोड़ देता हंू।
एक छोटी सी घटना मुझे स्मरण आती है। बिलकुल काल्पनिक होगी। मैने सुना है कि कृष्ण एक दिन भोजन करते थे और बीच भोजन में उठे और द्वार की तरफ भागे। जो उन्हें भोजन कराते थे उन्होंने कहा क्या करते हैं? कहां भागते हैं बीच भोजन में उठते हैं। उन्होंने कहाः मेरा एक भक्त बहुत कष्ट में पड़ा हुआ है। दुष्ट उसे सता रहे हैं, उसे पत्थर मार रहे हैं। ये कहते वे भागे, द्वार के बाहर भी निकल गए लेकिन द्वार से फिर वापिस लौट आए, भोजन करने बैठ गए। तो जिन्होंने पहला प्रश्न पूछा था उन्होंने पूछा आप लौट आए बीच से। उन्होंने कहा उस भक्त ने खुद भी पत्थर अपने हाथ में उठा लिया है। अब मेरे जाने की वहां कोई जरूरत नहीं रही। अभी लोग उसे मार रहे थे वह निहत्था, असहाय खड़ा हुआ झेल रहा था, मेरी जरूरत थी। अब उसने पत्थर खुद भी उठा लिए हैं अब मेरी कोई भी जरूरत नहीं है। कहानी तो काल्पनिक ही होगी।
लेकिन मनुष्य के जीवन में जो भी सोया है चाहे उसे कोई नाम दें, सत्य कहें, आत्मा कहें, परमात्मा या कोई और नाम दें, कृष्ण कहें, क्राइस्ट कहें या कुछ और कहें। जो भी भीतर सोया है। जब तक आप बेसहारा नहीं हो जायेंगे तब तक उसके उठने और जगने का कोई कारण नहीं है। जब तक आप कुछ पकड़ लेंगे तब तक वह सोया रहेगा और जब आपकी कोई पकड़ नहीं होगी और हाथ खाली हो जाएंगे और आप बेसहारा खड़े हो जाएंगे। जब आपकी कोई सुरक्षा नहीं रह जाएगी, कोई सहारा नहीं रह जाएगा, कोई परिचय, कोई ज्ञान और आप निपट अज्ञान में और बेसहारा खड़े होने का साहस करेंगे, उसी क्षण, उसी क्षण केवल वह जागता है जो हमारे भीतर सोया है। उसी क्षण वहां स्फुरणा होती है। उसी क्षण वहां कोई बीज टूटता है और अंकुरित होता है। उसी क्षण वहां कोई अंधकार टूटता है कोई ज्योति जागती है उसके पहले नहीं। उसके पहले असंभव है। उसके पहले बिलकुल असंभव है क्योंकि उसके पहले हम कोई न कोई पूरक कोई न कोई सब्स्टीट्यूट खोज लेते हैं। हम खोज लेते हैं उसे जो सोया है उसे जागने का कोई कारण नहीं रह जाता। हम पत्थर उठा लेते हैं फिर कठिनाई हो जाएगी। और हम कोई न कोई परिचय पकड़ लेते हैं, कोई न कोई वस्त्र पकड़ लेते हैं, कोई न कोई रूप, कोई न कोई आकृति, कोई न कोई नाम, कोई न कोई शब्द, कोई न कोई सिद्धांत, पकड़ लेते हैं अज्ञान ढक जाता है और ज्ञान के जन्म का कोई कारण नहीं रह जाता। ज्ञान के आगमन के लिए पहला द्वार स्वयं के भीतर अपने समग्र अज्ञान की स्वीकृति है।
तो आज की सुबह मैं आपको कहना चाहंूगा, ज्ञानी न बनें अपने अज्ञानी होने को जानें। ज्ञानी बनना बहुत आसान है। अपने अज्ञान को जानना और स्वीकार कर लेना बहुत दुःसाहस की बात है। क्योंकि ज्ञानी बनने में अहंकार की सहज तृप्ति होती है अज्ञान को स्वीकार करने में अहंकार एकदम टूट कर दो टुकड़े हो जाता है, उसके खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती। ज्ञानी होने में अहंकार की खूब तृप्ति है। तो पंडित जितना अहंकारी हो जाता है उतना तो जगत में कोई अहंकारी नहीं होता। उपदेशक जितने अहंकार से भर जाते हैं उतना तो कोई अहंकारी नहीं होता। जितना ये ज्ञान की बातें करने वाले लोग अहंकार से पीड़ित हो जाते हैं उतना तो कोई और अहंकारी नहीं होता। यह जितना ज्यादा हमें यह खयाल पैदा होता है कि कुछ शब्दों को इकट्ठा करके कुछ विचारों को इकट्ठा करके हमने जान लिया, मैं जान गया हंू। जानते तो हम कुछ भी नहीं, हमारा ‘मैं’ जरूर मजबूत होता है और भर जाता है। और फिर जिस चीज से भरने लगता है उसको हम इकट्ठा करने लगते हैं। कोई धन इकट्ठा करने लगता है क्योंकि धन के इकट्ठे करने से अहंकार भरता हुआ मालूम पड़ता है। कोई बड़े महल बनाने लगता है, ताजमहल बनाने लगता है, कोई कुछ और करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है। कोई त्याग करने लगता है क्योंकि उससे अहंकार भरता है और हमारा अहंकार बड़ा सूक्ष्म है। वह निरंतर अपने को भरने की कोशिश करता है। अगर त्याग को प्रशंसा मिलती हो आदर मिलता हो तो हम त्याग कर सकते हैं, उपवास कर सकते हैं, धूप में खड़े रह सकते हैं, सिर के बल खड़े रह सकते हैं, शरीर को सुखा सकते हैं। अगर चारों तरफ जय जयकार होता हो तो हम मरने को राजी हो सकते हैं, नहीं तो कोई शहीद मरने को राजी होता। कोई मरने को राजी होता लेकिन अहंकार को अगर तृप्ति मिलती हो तो हम सूली पर भी लटकते वक्त मुस्कुरा सकते हैं और प्रसन्न हो सकते हैं।
एक फकीर था, नसरुद्दीन। फकीर हुआ उसके पहले एक राजा के घर वजीर था। राजा और नसरुद्दीन एक दफा शिकार करने गए एक जंगल में। रास्ता भटक गए और एक छोटे से गांव में सुबह-सुबह रास्ता खोजते हुए पहुंचे। भूख लगी थी। एक घर में गए और उन्होंने नाश्ते के लिए प्रार्थना की। उस गरीब आदमी के पास दो-चार अंडे थे। उसने कुछ बनाया अंडों से और उन्हें भेंट किया। चलते वक्त राजा ने कहा कि कितना पैसा हुआ? उस देश की मुद्रा में उस गरीब ने कहा पचास रुपया। राजा बहुत हैरान हुआ। दो-चार अंडों की कीमत तो दो-चार पैसे भी नहीं हैं, पचास रुपया। उसने वजीर नसरुद्दीन से पूछा, क्या बात है। आर ऐग्स सो रेयर इन दिस पार्ट ऑफ दि कंट्री? क्या इस हिस्से में अंडे इतने कम मिलते हैं? उस नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं। ऐग्स आर नॉट रेयर सर, बट किंग्स आर। अंडे नहीं, अंडे तो बहुत मिलते हैं, अंडे कम नहीं मिलते लेकिन इस हिस्से में राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं। वह राजा पचास रुपया देने की कल्पना भी नहीं करता था लेकिन जैसे ही उसे पता चला राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं उसने पचास रुपये दिया और पचास रुपया इनाम दिए नसरुद्दीन को कि तुमने बहुत अदभुत बात कही। पचास रुपये अंडे के भी चुकाए और पचास रुपये इनाम के भी, क्यों? बड़ी तृप्ति हुई। राजा बहुत मुश्किल से मिलते हैं।
यह जो हमारी अस्मिता है रोज-रोज इस बात की तृप्ति खोजती रहती है जिस चीज से आप न्यून होते जाते हैं वही चीज आपके अहंकार की तृप्ति करने लगती है। एक नगर में एक महल ऊपर उठने लगता है जब तक दूसरे मकानों के बराबर होता है तब तक कोई तृप्ति नहीं होती जब दूसरे मकानों से ऊपर उठने लगता है तब तृप्ति होनी शुरू हो जाती है। और जितना ऊपर उठने लगता है और जिस दिन अकेला रह जाता है उस गांव में एक ही रह जाता है ऊंचा मकान उस दिन खूब तृप्ति होने लगती है। तो अहंकार मांगता है न्यूनता। कोई त्याग करने लगता है, कोई धन इकट्ठा करने लगता है, कोई विचार का संग्रह करने लगता है ज्ञानी बनने लगता है और जिस दिन वह ज्ञानी बनता जाता है और अकेला और धीरे-धीरे लगता है वह अकेला ही रह गया मालिक उस ज्ञान का और कोई भी मालिक नहीं है उस दिन बड़ी गहन तृप्ति होने लगती है। लेकिन अहंकार जितना-जितना पुष्ट हो जाता है स्वयं को जानना उतना ही असंभव हो जाता है। जितनी अस्मिता गहरी हो जाती है। यह जो ईगो है, यह जो मैं हंू, यह जितना सख्त और ठोस हो जाता है उतना ही उसे जानना मुश्किल हो जाता है जो मैं हंू, जो मेरा वास्तविक होना है, क्यों? क्योंकि अस्मिता मेरे द्वारा निर्मित है। अहंकार मेरा निर्माण है और मैं, मैं मेरा निर्माण नहीं हंू। मेरा होना, मेरी आत्मा, मेरी वास्तविकता मेरा निर्माण नहीं है। अस्मिता, अहंकार मेरा निर्माण है, मेरा क्रिएशन है। एक ने बड़े मकान को बना कर अपने अहंकार को निर्मित किया है, एक ने धन इकट्ठा करके, एक ने राष्ट्रपति तक की यात्रा पूरी करके अपने अहंकार को इकट्ठा किया है, एक ने ज्ञान को इकट्ठा करके अपने अहंकार को इकट्ठा किया है। यह हमारा निर्माण है यह हमने बनाया है और ‘मैं’ मेरा निर्माण नहीं हंू। तो वह जो मेरे भीतर अनिर्मित है असृष्ट है जो मेरे भीतर, मेरे जानने, मेरे होने के पहले है, मेरे करने के पहले है, मेरे जन्म के पहले जो मेरे भीतर है उसे जानने के लिए जिस अहंकार को मैंने निर्मित किया है, यह बाधा बन जाएगा।
इसलिए न तो त्यागी जानता है और न ज्ञानी और न धनी, और न पदलोलुप और न महत्वाकांक्षी। कौन जानता है? जानने के द्वार पर पहली तो बात यही है कि वह जान पाता है जो सब भांति नहीं जानता हो, इसकी स्वीकृति को उपलब्ध होता है। इस स्वीकृति को जानते ही, पहचानते ही कि मैं नही जानता हंू और कोई पकड़ने का खयाल नहीं रह जाता, मैं खाली हाथ खड़ा रह जाता हंू। खाली हाथ खड़ा रहा जाता हंू। खाली मन... मैं आपसे पूछूं कि आपका नाम क्या है आप बहुत जल्दी उत्तर दे देते हैं कि मेरा नाम राम है, विष्णु है या कुछ और है, क्यों? इतने विश्वस्त हैं कि आपका यह नाम है। कभी सोचा कभी विचारा कि यह मैं क्या कह रहा हंू। एक जल्दी से नाम निकल आता है और हम उत्तर दे देते हैं। उत्तर दे देते हैं बात खत्म हो जाती है। कभी थो.ड़ी देर ठहर जाएं और सोचें,मेरा नाम है! कुछ तो शायद भीतर एक सन्नाटा हो जाए, एक साइलेंस हो जाए, एक मौन हो जाए,कोई नाम खोजे से न मिले तो एक मौन पैदा हो जाए।
हम किसी से कोई प्रश्न पूछते हैं, उसे मालूम होता है तो शीघ्र उत्तर दे देता है। मालूम होने का मतलब अगर उसकी स्मृति में कुछ होता है तो उत्तर दे देता है। मैं पूछूं-दो और दो कितने होते हैं आप कह देते हैं चार क्योंकि आपकी स्मृति ने सीख रखा है दो और दो चार होते हैं। पूछा, उत्तर दे दिया। मैं आपसे पूछूं: भीतर कौन है तो आप कह देगें -आत्मा। यह भी स्मृति ने सीख रखा है दो और दो चार वाला उत्तर है दे दिया गया। लेकिन स्मृति ज्ञान नहीं है। तो स्वयं की खोज में पूछते वक्त कि मैं कौन हंू उत्तर की अपेक्षा न करें क्योंकि जो भी उत्तर आएगा वह स्मृति से आएगा, झूठा होगा, सीखा हुआ होगा। सब सीखी हुई बातें झूठी होती हैं, ज्ञान नहीं बनती हैं। कुछ भी सीखा हुआ ज्ञान नहीं बनता है। जीवन में जो क्षुद्र है वह सीखा जा सकता है क्योंकि वह बाहर है। जीवन में जो विराट है वह सीखा नहीं जा सकता क्योंकि वह भीतर है। जो भीतर है उसे बाहर से नहीं सीखा जा सकता; उसे जाना जा सकता है; उसे उघाड़ा जा सकता है; उसे डिस्कवर किया जा सकता है; उसे पहचाना जा सकता है लेकिन सीखा नहीं जा सकता। उसे जाना जा सकता है लेकिन याद नहीं किया जा सकता। तो जब भी प्रश्न पूछें, पूछें कि मैं कौन हूं?
और वह मनुष्य कभी धार्मिक न हो पाएगा जिसने अपने से यह न पूछा हो कि मैं कौन हूं? और वह मनुष्य कभी सत्य को न जान पाएगा और कभी आनंद को भी उपलब्ध न हो पाएगा जिसने अपने प्राणों की सारी गहराई में न पूछा हो कि मैं कौन हूं? और अगर कोई भी उत्तर आता हो तो उत्तर को इनकार कर दें क्योंकि उत्तर सीखा हुआ होता है। स्मृति से आया हुआ होगा और स्मृति तो केवल वही जानती है जो सीख लिया गया है स्मृति उसे नहीं जानती जिसे हम नहीं जानते। जो अज्ञात है, अननोन है, जो अभी अपरिचित है उसे स्मृति नहीं जानती। स्मृति तो जो सीख लिया गया है उसका संग्रह है, स्मृति के उत्तर को इनकार करें। स्मृति कहे विष्णु हो, तो उसे जाने दें उसे पक.ड़ें न। स्मृति कहे कि आत्मा हो, तो उसे जाने दें उसे पक.ड़ें न। स्मृति कहे कि परमात्मा हो, स्मृति कहे कुछ भी नहीं केवल पदार्थ हो। अगर नास्तिक घर में पले तो स्मृति कहेगी की कुछ भी नही केवल शरीर हो। अगर धार्मिक घर में पले हैं तो स्मृति कहेगी आत्मा हो, अजर-अमर आत्मा हो। ये दोनों शिक्षाएं हैं इनको छोड़ दें। नास्तिक को, आस्तिक को जाने दें। ग्रंथों से आए हुए उत्तर को जाने दें। फिर क्या होगा जब कोई उत्तर न आएगा तो क्या होगा? जब किसी उत्तर की स्वीकृति न होगी तो क्या होगा? भीतर एक सन्नाटा हो जाएगा एक मौन खड़ा हो जाएगा, एक सायलेंस पैदा हो जाएगी। और उसी मौन से, उसी सन्नाटे से, उसी शून्य से उस चीज का अनुभव आना शुरू होता है जो स्वयं का होना है। पूछें, मैं कौन हूं? और कृपा करके किसी उत्तर को न पक.ड़ें। पूछें, मैं कौन हूं? और प्रश्न ही रह जाने दें, उत्तर नहीं। और प्रश्न को ही गूंजने दें। और प्रश्न को ही प्राणों में छाने दें, और प्रश्न को ही उतरने दें गहरा, और कोई उत्तर न पकड़े क्योंकि सभी उत्तर सीखे हुए होंगे। कोई उत्तर हिंदू का, मुसलमान का, जैन का न पकड़ें, सब उत्तर सीखे हुए होंगे। प्रश्न रह जाए मैं कौन हंू तीर की भांति प्राणों को छेदता हुआ। सिर्फ प्रश्न रह जाए मैं कौन हंू और कोई उत्तर न हो तो आप हैरान होंगेे उसी अंतराल में, उसी खाली जगह में, उसी मौन में, वह किरण उतरनी शुरू होगी स्वयं की, स्वयं को जानने का पहला साक्षात, स्वयं के अनुभव का पहला बोध, पहला प्रकाश उतरना शुरू होगा।
तो आज की सुबह निवेदन करना चाहता हूं पूछें अपने से मैं कौन हंू और किसी उत्तर को स्वीकार न करें जो बाहर से आया हुआ हो। किसी उत्तर को स्वीकार न करें। चाहे वह किसी भगवान के अवतार का उत्तर हो, चाहे किसी तीर्थंकर का, चाहे किसी ईश्वर पुत्र का, चाहे किसी पैगंबर का, चाहे किसी बुद्धपुरुष का, किसी का भी उत्तर हो उसे स्वीकार न करें। परमात्मा की खोज के मार्ग पर, सत्य की खोज के मार्ग पर जो भी बीच में आ जाए उसे विदा कर दें। उससे कहो कि हट जाओ, चाहे वे तीर्थंकर हों, चाहे वह ईश्वर पुत्र हो, चाहे भगवान स्वयं हों। उनसे कहें कि रास्ता छोड़ दो। मैं जानना चाहता हंू तो मुझे किसी के भी उत्तर को स्वीकार करने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं देखना चाहता हंू तो मैं किसी की उधार आंख से नहीं देख सकता और मेरे प्राण स्पंदित होना चाहते है तो मेरा हृदय धड़केगा तो ही यह हो सकता है किसी और के हृदय की धड़कन से यह नहीं हो सकता। यह जो हमारा सीखा हुआ ज्ञान है, यह हमारे ज्ञान के जन्म में बाधा है अज्ञान नहीं झूठा ज्ञान, सीखा हुआ ज्ञान बाधा है। अज्ञान नहीं, ज्ञान, सीखा हुआ ज्ञान अवरोध है। वही रोक रहा है, वही दीवाल बन कर खड़ा है। अज्ञान तो अत्यंत निर्दोष स्थिति में खड़ा कर देगा। बहुत इनोसेंस में खड़ा कर देगा। बहुत सरलता में,बहुत निर-अहंकार स्थिति में खड़ा कर देगा। और जो इस बात को पूरा न कर सके वह आगे खोज नहीं कर सकेगा। जो अपने अज्ञान को स्वीकार न कर सके वह आगे खोज नहीं कर सकेगा। साक्रेटीज के समय में एक व्यक्ति को देवी आती थी, पता नहीं, और उस व्यक्ति से किसी ने पूछा जब वह आविष्ट था, देवी से पूछा कि यूनान में सबसे बड़ा ज्ञानी कौन है। उसने कहाः साक्रेटीज, सुकरात।
वह सुकरात के पास गया और सुकरात से पूछा कि यह घोषणा हुई है, दैवीय घोषणा है कि तुम यूनान के सबसे बड़े ज्ञानी हो। तो उसने कहा कि जाओ और देवी को कहना कि कुछ भूल हो गई है क्योंकि मैं तो जैसे-जैसे खोजता हंू, पाता हंू कि मुझसे बड़ा और कोई अज्ञानी नहीं है। जाओ, कहना कोई भूल हो गई है क्योंकि मैं तो जैसे-जैसे खोजता हंू पाता हंू मुझसे बड़ा अज्ञानी कोई भी नहीं है। जब मैं बच्चा था तो मुझमें थोड़ा ज्ञान था। कई बातें मुझे लगती थीं कि मैं जानता हंू। जब मैं जवान हुआ तो मेरा ज्ञान और कम हो गया। मुझे कई बातें पता चलीं कि वह मेरा बचपना था मैं जानता नहीं था और अब जब मैं बूढ़ा हो गया हंू तो मैं पाता हंू कि जो भी मैं जानता था वह कुछ भी नहीं जानता था। अब तो एक अज्ञान मुझे घेर रहा है और मुझे लगता है कि मैं कुछ भी नहीं जानता हंू। वह व्यक्ति वापस गया और उसने जाकर कहा कि सुकरात तो कहता है कि मैं परम अज्ञानी हंू और मैं कुछ भी नहीं जानता हंू। वह व्यक्ति जो आविष्ट था वह हंसा और उसने कहा, जाओ-जाओ और उससे कहो कि इसीलिए उसे कहा वह महाज्ञानी है। कहो इसीलिए कहा कि वह महाज्ञानी है क्योंकि ज्ञान के अवतरण की भूमिका है अपने अज्ञान को पूरी तरह जान लेना, स्वीकार कर लेना, पहचान लेना। जैसे ही हम अज्ञान को स्वीकार करते हैं, जैसे ही हम जानते हैं, कि नहीं जानते हैं वैसे ही एक परिवर्तन, एक क्रांति घटित हो जाती है। वैसे ही एक पर्दा गिर जाता है, अहंकार का, जानने का, और एक मौन, और एक शांति अवतरित हो जाती है।
अंतिम रूप से आज तो सिर्फ प्रश्न उठाता हंू, वह आपके भीतर गूंजे, मैं कौन हंू? लेकिन अगर वह प्रश्न मेरा है तो बेकार है उसका कोई उपयोग नहीं होगा क्योंकि जब मैं कहता हंू कि किसी दूसरे के उत्तर को स्वीकार न करना तो क्या मैं यह कहंूगा कि किसी दूसरे के प्रश्न को स्वीकार कर लेना। अगर वह प्रश्न मेरा है और आप उसे जाकर दोहराएं कि मैं कौन हंू, तो वह प्रश्न झूठा होगा, उसमें कोई बल न होगा, कोई शक्ति न होगी। वह प्रश्न आपका हो तो ही आपके प्राणों में स्पंदन ला सकता है। वह प्रश्न आपका हो तो ही आपके प्राणों में आंदोलन ला सकता है। वह प्रश्न आपका हो तो ही तीर की भांति आपके गहरे से गहरे अंतःस्थल तक पहुंच सकता है। क्या आपके भीतर प्रश्न है? क्या आपके भीतर अपना प्रश्न है? क्या जीवन आपके मन में प्रश्न नहीं उठाता है? क्या जीवन आपको जिज्ञासा से नहीं भरता है? क्या जीवन आपके सामने यह सवाल खड़ा नहीं करता है कि मैं कौन हंू यह क्या है? क्या आप एकदम बहरे और अंधे हैं? क्या आपके हृदय में कोई जिज्ञासा ही पैदा नहीं होती। अगर होती हो कोई जिज्ञासा, अगर होता हो कोई प्रश्न खड़ा, अगर होती हो कोई प्यास मन में जानने की, पहचानने की, जीवन के सत्य को पाने की, तो उसे इकट्ठा कर लें और उसे एक प्रश्न बन जाने दें? क्योंकि जो और चीजों के संबंध में पूछने जाता है वह दूर निकल गया उसने बुनियादी प्रश्न छोड़ दिया। बुनियादी प्रश्न तो स्वयं से शुरू होता है कि मैं कौन हंू और अगर भाग्य से, सौभाग्य से आपका प्रश्न खड़ा हो जाए और दूसरों के उत्तर आप विदा कर सकें तो कोई बाधा नहीं है स्वयं को जान लेने में। कोई बाधा नहीं है। कोई बाधा नहीं है, कोई दीवाल नहीं है। लेकिन बहुतों के मन में प्रश्न ही नहीं है, बहुतों के मन में जिज्ञासा नहीं है। क्यों? यह तो असंभव है कि प्रश्न कहीं नहीं हो। यह तो असंभव है भीतर प्रश्न कहीं न कहीं न हो। फिर भी जिज्ञासा नहीं बनती मालूम पड़ती। क्या होगा कारण? कारण है साहस की कमी है। क्यों? हम केवल वे ही प्रश्न पूछते हैं जिनके उत्तर हमें मालूम हैं।
हम केवल वे ही प्रश्न पूछते हैं जिनके उत्तर हमें मालूम हैं। मजे से प्रश्न भी पूछ लेते हैं और उत्तर भी दे देते हैं और जीवन में समाधान हो जाता है। हम वे प्रश्न पूछते ही नहीं जिनके उत्तर हमें मालूम नहीं। क्योंकि उन प्रश्नों का पूछना हमारे अज्ञान का उदघाटक होगा। इसलिए डरते हैं, इसलिए भयभीत रहते हैं। उन प्रश्नों से दूर रहते हैं उन प्रश्नों से बचते हैं जिनसे हमारे अज्ञान का उदघाटन हो जाए। साहस चाहिए प्रश्न पूछने को, हिम्मत चाहिए और हमारा तो उलटा है हिसाब। जब साहस के और हिम्मत के दिन होते हैं तब तो हम कहते हैं कि यह धर्म की उम्र ही नहीं। जब बुढ़ापा आ जाए, मौत करीब आने लगे तब फिर धर्म के दिन आते हैं। जितना साहस कम होता जाए और बल कम होता जाए और जितनी खोज की आकांक्षा कम होती जाए तो हम समझते हैं कि तब धर्म के दिन आते हैं। मंदिरों में और चर्चों में बूढ़े लोग इकट्ठे हैं, जो या तो मर चुके हैं या मरने वाले हैं। वे लोग वहां इकट्ठे हैं और धीरे-धीरे यह खयाल पैदा हो गया है कि वह इन्हीं लोगों का काम है। मैं आप से निवेदन करता हंू कि बूढ़ा मन तो कभी भी धर्म के सत्य को जान ही नहीं सकता। बूढ़ा आदमी नहीं कह रहा हंू, बूढ़ा मन। बूढ़ा मन तो कभी जान ही नहीं सकता। चाहिए युवा मन, चाहिए यंग माइंड, चाहिए बल से भरा हुआ मन साहस से, दूर की यात्रा करने का, अज्ञात की यात्रा करने का साहस हो तो प्रश्न खड़े हो जाएंगे और तब वे ही प्रश्न खड़े होंगे जिनके उत्तर नहीं मालूम है।
और जिन प्रश्नों के उत्तर नहीं मालूम हैं अगर वे खड़े हो जाएं तो जीवन में एक नये प्रभात की शुरुआत होती है, एक नया मंगल प्रारंभ होता है। उसकी तरफ आंखें उठनी शुरू होती हैं जो सत्य है,सुंदर है, शिव है, उसकी तरफ, जो परमात्मा है। उसकी तरफ जो हमारा वास्तविक होना है। और उसे जान कर जीवन का सारा दुख वैसे ही विर्सजित हो जाता है जैसे किसी अंधकारपूर्ण गृह में कोई दीया जला दे। और सारा अंधकार विलीन हो जाए। कैसे यह दीया जल सकता है उसकी चर्चा आने वाली चर्चाओं में मैं करूंगा। जो प्रश्न आपके हों और प्रश्न होने चाहिएं, उनको संध्या उत्तर दूंगा-आने वाले दो दिनों में। लेकिन तभी आएं जब आपको यह खयाल स्पष्ट होने लगे कि आपका कोई प्रश्न भीतर जग रहा है। अन्यथा, अन्यथा आने की कोई जरूरत नहीं है, कोई कारण नहीं है।
अगर आपको लगे कि आपको यह एहसास होता है कि आप नहीं जानते हैं, तो आएं, तो कुछ खोज हो सकती है, तो हम मिल कर कुछ यात्रा तय कर करते हैं। तो कुछ मैं अपने हृदय की आपसे बातें कहंू। इसलिए नहीं कि आप उनको स्वीकार कर लें, इसलिए नहीं कि आप उन पर विश्वास कर लें, इसलिए नहीं कि आप उनको अपनी मान्यता बना लें, इसलिए नहीं कि मेरी बातें आपका ज्ञान बन जाएं। नहीं बन सकती हैं, और न उन्हें बनाने की जरूरत है। लेकिन इसलिए कि शायद यहां हम इकट्ठे हों और विचार करें और आपकी जिज्ञासा तीव्र हो जाए और आपकी प्यास गहरी हो जाए। और जिस प्यास से आप अपरिचित थे उसका बोध हो जाए। शायद एक खोज का प्रारंभ हो जाए। शायद एक बीज आपके भीतर टूट जाए और एक अंकुर बनने लगे। शायद एक नया जीवन और एक नई गति और एक नये मनुष्य होने की शुरुआत हो जाए। इसलिए तीन दिन थोड़ी सी बातें मैं आपसे करूंगा।
आज तो प्रश्न खड़ा करता हंू उस प्रश्न को साथ लिए जाएं। रात उसे साथ लिए सो जाएं और थोड़ा प्रयोग करके देखें। उत्तर जो भी आता हो उसे बाहर रख कर हटा दें, उत्तर जो भी आता हो उसे इनकार कर दें और प्रश्न को गहरा होने दें। जहां आपने उत्तर पकड़ा प्रश्न वहीं मर जाएगा। जहां आपने उत्तर पकड़ा प्रश्न वहीं समाप्त हो जाएगा। तो अगर प्रश्न को गहरे जाने देना है तो उत्तर मत पकड़ना। जब प्रश्न ही प्रश्न रह जाए और कोई उत्तर मन में न हो तब, तब कोई चीज जगनी शुरू होगी। तब कोई हमारे भीतर से दौड़ेगा हमारी सहायता को। तब कोई हमारे भीतर से उठेगा हमारी सहायता को। तब हमारे भीतर कोई जगेगा जो सोया है। और वही आत्म परिचय बन जाता है, वही आत्म-ज्ञान बन जाता है। मैं कौन हूं?
शॉपनहार एक सुबह कोई तीन बजे रात जल्दी उठ गया और एक बगीचे में गया। बगीचे में था अंधेरा और शॉपनहार था विचारक, एकांत पाकर जोर-जोर से खुद से बातें करने लगा। कोई था नहीं इसलिए कोई डर भी नहीं था। कोई होता है तो हम दूसरे से बातें करते हैं कोई नहीं होता है तो हम अपने से बातें करते हैं। वह भी अपने से बात करने लगा कोई भी नहीं था। माली की नींद खुली उसने सोचा रात तीन बजे कौन आ गया है यहां। और फिर बातें करते हुए घूम रहा है, और अकेला ही मालूम होता है। माली डरा, सोचा शायद कोई पागल है। उसने लालटेन उठाई, अपना भाला उठाया और गया और दूर से ही चिल्ला कर पूछा, डर के मारे, कौन हो? शॉपनहार हंसने लगा। हंसने से माली और घबड़ा गया। निश्चित ही पागल है सुबह-सुबह आ गया, अपने से बातें करता घूमता है। पूछा कौन हो उत्तर क्यों नहीं देते? शापनहार ने कहा: मेरे मित्र, काश उत्तर दे सकता। इधर तीस वर्षों से अपने से यही पूछ रहा हूं कौन हूं? खुद को ही पता नही चलता तुम्हें क्या उत्तर दूं। लेकिन मैं आपसे कहूं कि शॉपनहार को इसीलिए पता नहीं चला कि वह पूछता तो था कि मैं कौन हंू? लेकिन बहुत से उत्तर खोजता था, उपनिषद में, यहां-वहां,कांट में, हीगल में और न मालूम कहां-कहां उत्तर खोजता था इसलिए तीस साल खराब गए। और पता नहीं शॉपनहार को मरते वक्त भी पता चला कि नहीं चला। मैं नहीं समझता कि पता चला होगा, क्योंकि तब भी वह उत्तर खोज रहा था। उत्तर खोज रहा है, भीतर प्रश्न है, उत्तर बाहर खोजे जा रहे हैं। उत्तर नहीं मिलेंगे।
मैं आपसे कहता हूंः प्रश्न में ही उत्तर छिपा है। बाहर मत खोजें। और बाहर के किसी उत्तर को स्वीकार न करें। और प्रश्न को आने दें पूरे-पूरे वेग से कि वह सारे प्राणों के रंध्र-रंध्र को भर दे, श्वास-श्वास भर दे। हृदय की धड़कन-धड़कन उससे भर जाए। प्रश्न ही रह जाए और कुछ न हो। तब वहीं, बिलकुल वहीं प्रश्न के साथ ही उत्तर है। वह उत्तर बाहर से नहीं आता, वह उत्तर भीतर से उपलब्ध होता है।
परमात्मा करे कि वह उत्तर उपलब्ध हो लेकिन प्रश्न आपको पूछना पड़ेगा। मेरा प्रश्न नहीं हो सकता है। किसी और का प्रश्न नहीं हो सकता, तो कल अगर आपके मन में अपना प्रश्न हो तो आएं, यहां कोई व्याख्यान नहीं है, कोई उपदेश नहीं है। यहां कोई आपको कुछ समझाने का कोई रस नहीं है कोई आनंद नहीं है। वह प्रश्न उठता हो तो आएं तो फिर कुछ बात हो सकेगी तो फिर दो हृदय किसी तल पर मिल सकते हैं। और कोई बात हो सकती है।

मेरी बातों को इतने प्रेम से सुना है। और ऐसी बातों को जो आपको ज्ञान नहीं देतीं बल्कि आपके अज्ञान के लिए आग्रह करती हैं। बड़ी कृपा है और दया है, इतने प्रेम से सुना, उससे बहुत अनुगृहीत हूं। परमात्मा करे आज जो अज्ञान है वह कल ज्ञान बन जाए, आज जो अंधकार है वह कल प्रकाश बन जाए, इस कामना के साथ आज की बात पूरी करता हूं। सबके भीतर बैठे परमात्मा को मेरेे प्रणाम स्वीकार करें।

Saturday, 13 September 2025

निवडक ओशो वचने

भज गोंविंदम मुढ़मते (आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--04


१. सिर्फ ज्ञानी ही मानते हैं कि वे ज्ञानी नहीं हैं, अज्ञानी तो सभी मानते हैं कि वे ज्ञानी हैं। अज्ञानी तो बड़ी अकड़ से संघर्ष करता है अपने ज्ञान का। वह तो मानने को राजी नहीं होता है कि मैं नहीं जानता हूं।

२. सुबह ध्यान जब करोगे तो क्रोध को बाहर निकाल दोगे और दिन भर बाजार में क्रोध को फिर इकट्ठा कर लोगे। यह तो ऐसा हुआ कि किसी आदमी ने दिन भर कुआं खोदा और रात भर मजदूर लगा कर उसे वापस पुरवा दिया; फिर दूसरे दिन सुबह कुएं को खोदना शुरू कर दिया।

३. तुम जाते हो मंदिर में परमात्मा का स्मरण करने और मंदिर में भी बैठ कर बाजार का स्मरण करते हो। जरूरत ही न थी जाने की; बाजार में ही बैठ सकते थे। लेकिन तुम्हारी तकलीफ यह है कि जब तुम दुकान पर बैठते हो, तब मंदिर की याद भी आती है; पर जब तुम मंदिर में होते हो, तब दुकान की याद आती है।

४. अंधेरे को हटाने से थोड़े ही प्रकाश पैदा होता है, प्रकाश आ जाए तो अंधेरा हटता है।

५. संन्यास वही है, जो पीछे लौट कर न देखे; पीछे लौट कर देखा तो संन्यास अधकचरा है।

६. तुम्हारे भीतर उतना ही शुद्ध जल है, जितना महावीर, बुद्ध, शंकर के भीतर है। 

७. न तो कोई औषधि औषधि है, न कोई जहर जहर है। जो जहर तालमेल खा जाए, औषधि बन जाता है; जो औषधि तालमेल न खाए, जहर हो जाती है। 

८. धर्म बपौती नहीं है और किसी को वंशक्रम से नहीं मिलता। धर्म प्रत्येक व्यक्ति की निजी उपलब्धि है और अपनी साधना से मिलता है। - महावीर या महाविनास--(प्रवचन-01) 

९. कोई व्यक्ति ईसाई घर में पैदा हो जाने से क्राइस्ट से संबंधित नहीं होता। और कोई व्यक्ति जैन घर में पैदा हो जाने से महावीर से संबंधित नहीं होता। कोई व्यक्ति हिंदू घर में पैदा हो जाने से कृष्ण से संबंधित नहीं होता। यह बात इतनी सस्ती नहीं है। धर्म से संबंधित होना जीवन का सबसे मंहगा सौदा है। - महावीर या महाविनास--(प्रवचन-01) 

१०. आपके जन्म से नहीं, आपके मर जाने से आप धर्म से संबंधित होंगे। आपके किसी घर में पैदा हो जाने से नहीं, आपकी संपूर्ण अहंता को लेकर अगर आप मर सकेंगे, तो आप धर्म से संबंधित हो जाएंगे। - महावीर या महाविनास--(प्रवचन-01) 

११. ज्ञानी कभी हिंदू, मुसलमान, ईसाई नहीं हुआ। और भीड़ सदा हिंदू, मुसलमान ईसाई की है। - बिन घन परत फुहार—प्रवचन-08

१२. प्रेमी अकेले में मिलना चाहते हैं, बाजार में नहीं। और अगर प्रेमी बाजार में भी मिलें, तो बाजार को भूल जाते हैं, अकेले हो जाते हैं। - बिन घन परत फुहार—प्रवचन-07

 

 

 

 

Wednesday, 20 August 2025

निवडक ओशो

संन्यासी और गृहस्थ में फर्क


इतना ही फर्क है संन्यासी में और गृहस्थ में। गृहस्थ दुख से छूटना चाहता है और सुख को पकड़ना चाहता है; संन्यासी समझ लिया कि हर सुख के पीछे दुख है। वह अब दुख से ही नहीं छूटना चाहता, सुख से भी छूटना चाहता है।
और जो दोनों से छूटना चाहता है, वह छूट सकता है; जो एक से छूटना चाहता है, वह नहीं छूट सकता। यह तो ऐसे ही है जैसे कि तुम्हारे हाथ में एक सिक्का है और तुम उसके एक पहलू से छूटना चाहते हो और दूसरे पहलू को बचाना चाहते हो। तुम जो बचाओगे, उसमें पूरा सिक्का बच जाएगा। या तो पूरा बचेगा या पूरा छोड़ना पड़ेगा। या तो सुख-दुख दोनों जाएंगे या सुख-दुख दोनों रहेंगे। ऐसी स्पष्टता जब तुम्हारे जीवन में फलित हो जाएगी--तो वैराग्य; तो संन्यास।

मंदिर कौन पहुंच सकता हैं?


मंदिर कोई स्थान थोड़े ही है, भाव-दशा है। जब तक मांग है, तब तक कैसा मंदिर! जब तक क्षुद्र वस्तुएं जो बाजार में बिक रही हैं, उन्हीं को मांगने तुम परमात्मा के पास जाते हो, तो तुम शायद समझते हो कि परमात्मा कोई सुपर मार्केट है; छोटी-मोटी दुकानों में चीजें नहीं मिलीं, चलो मंदिर में मिल जाएंगी! संसार में नहीं मिलीं तो मोक्ष में मिल जाएंगी! लेकिन तुम मांगते क्या हो?
मंदिर वही पहुंचता है, जिसने समझ लिया कि मांगना व्यर्थ है; जिसने समझ लिया कि मांगने से मिलता ही नहीं कुछ सिवाय दुख के; जिसने समझ लिया कि कितनी ही चेष्टा करो, भिखमंगे का पात्र खाली ही रह जाता है, भरता नहीं।
मंदिर वही पहुंचता है जो धन्यवाद देने जाता है, मांगने नहीं। जिस दिन तुम्हारे भीतर से अहर्निश धन्यवाद उठने लगे--फूल खिलें और तुम्हारे भीतर से धन्यवाद उठे, आकाश से बादल बरसें और तुम्हारे भीतर धन्यवाद उठे, एक बच्चा किलकारी मारे और तुम्हारे भीतर धन्यवाद उठे, तुम श्वास लो और तुम्हारा होना ही इतना शांति का हो कि धन्यवाद उठे।

कच्चा फल और पका फल


मैं संसार से तुम्हें तोड़ना नहीं चाहता; मैं संसार से तुम्हें मुक्त करना चाहता हूं, तोड़ना नहीं चाहता। और तोड़ना और मुक्त होना, बड़ी अलग बातें हैं।
तोड़ना ऐसा है जैसे कच्चे फल को तोड़ो; और मुक्त होना ऐसा है जैसे पका फल गिर जाए। ..... दोनों में बड़ा मौलिक अंतर है। कच्चे फल को तोड़ते हो--फल में भी टीस रह जाती है और वृक्ष में भी घाव छूट जाता है। पका फल तोड़ने की जरूरत ही नहीं होती--पका फल अपने से गिरता है, सहजता से गिरता है; न तो टीस रहती कोई, न पीछे वृक्ष की याद आती कि थोड़ी देर और रह जाते वृक्ष के साथ। पक ही गया, बात ही समाप्त हो गई; वृक्ष का काम पूरा हो गया। और न वृक्ष में कोई पीड़ा रह जाती। पका फल वृक्ष को पूरी तरह भूल जाता है, पीछे लौट कर नहीं देखता। और वृक्ष भी पके फल के गिरने पर निर्भार हो जाता है, घाव नहीं छूटता।

तेन त्यक्तेन भुंजीथाः


उपनिषदों का महावचन है: तेन त्यक्तेन भुंजीथाः।
इससे ज्यादा क्रांतिकारी वचन मुझे दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं मिला। यह वचन बड़ा अनूठा है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। जिन्होंने त्यागा, उन्होंने ही केवल भोगा। एक अर्थ।
दूसरा अर्थ: तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। जिन्होंने भोगा, उन्होंने ही त्यागा।
और दोनों ही अर्थ बड़े बहुमूल्य और कीमती हैं। और दोनों अर्थ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते


आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते। पीछे का दरवाजा या बाहर का दरवाजा, आप यह नहीं कह सकते कि मैं नहीं हूं। कोई तुम्हारे द्वार पर दस्तक दे, तुम यह नहीं कह सकते कि मैं घर पर नहीं हूं। इसका क्या मतलब होगा? इसका सिर्फ इतना मतलब होगा कि तुम हो; क्योंकि इनकार करने के लिए भी तुम्हारी जरूरत पड़ जाएगी।

Wednesday, 13 August 2025

“Our scientists and engineers, propelling India toward a future defined by technological strength and national security”: Dr. V. Narayanan, ISRO Chairman, at SRMIST’s 21st Convocation 2025

Kattankulathur, August 10, 2025:
‘No matter the heights you achieve, let honesty be the cornerstone of your success,’ emphasised Dr. Narayanan, Chairman, ISRO, during the prestigious 21st Convocation Ceremony held at SRM Institute of Science and Technology (SRMIST), Kattankulathur, Chennai.
Dr. V. Narayanan, Chairman of ISRO and Secretary, Department of Space, Government of India, along with Dr. M. Ravichandran, Secretary, Ministry of Earth Sciences, Government of India, were conferred the prestigious Degree of Doctor of Science (Honoris Causa) in recognition of their outstanding contributions to science and technology.
Presiding over the ceremony was Dr. T.R. Paarivendhar, Founder Chancellor of SRMIST, who highlighted the institute’s commitment to academic excellence and societal impact.
This year, a total of 9,769 degrees were awarded, comprising 7,586 males and 2,183 females. The distribution includes 8,994 undergraduate degrees (7,071 males and 1,923 females), 564 postgraduate degrees (423 males and 141 females), and 211 doctoral degrees (92 males and 119 females). Additionally, 157 rank medallists were honoured, including 93 first-rank holders, 39 second-rank holders, and 25 third-rank holders, celebrating academic excellence across disciplines.

The event was graced by Shri C.P. Radhakrishnan, Governor of Maharashtra, the Chief Guest for the occasion and he delivered an inspiring Convocation address to a full house of graduates, faculty, and dignitaries.
In his address, he stated, “Sincerity, hard work, and patience are the true keys to success. Challenges come to all, but it is overcoming them with determination that shapes your future. Embrace lifelong learning, remain humble, and always remember the sacrifices of your parents. With this spirit, the youth will lead India to become the world’s foremost economic power by 2047.”

Dr. V. Narayanan, Chairman, Indian Space Research Organisation, Government of India said, "In the early days, with crucial support such as the small rocket donated by the USA, India’s space program took its first steps. Since then, India has made a giant leap in aerospace technology and a giant stride in defence technology, evolving into one of the world’s leading nations. This remarkable progress reflects the unwavering vision and dedication of our scientists and engineers, propelling India toward a future defined by technological strength and national security."
The Annual Report of the Institution was presented by the Vice Chancellor, who said, “Women represent 56.4% of our Ph.D. scholars and 44.5% of rank holders, reflecting our commitment to gender equity and inclusive excellence.”
He also emphasised, “Uplift others and lead with empathy. Carry forward the values of integrity, curiosity, resilience, and compassion. You are not just graduates, but torchbearers of inclusion, builders of equity, and catalysts of global change.”
In recognition of their extraordinary contributions to science and national development, SRMIST conferred the prestigious Honorary Degree of Doctor of Science (D.Sc) upon Dr. V. Narayanan, Chairman, ISRO, Government of India, and Dr. M. Ravichandran, Secretary, Ministry of Earth Sciences, Government of India.
Dr. M. Ravichandran said, “At this milestone, as you become professionals, remember success is about who you become over time. Embrace discipline, challenge yourself, build connections, and stay resilient. Cultivate passion and purpose with hard work. Join our nation’s vision for 2047 with your skills, stay sincere, and your future will be rewarding.”
Thousands of students received their degrees across disciplines, marking the culmination of years of rigorous academic pursuit. The ceremony was a vibrant blend of tradition, pride, and forward-looking optimism, reinforcing SRMIST’s role as a premier institution shaping the future of India.
ABOUT SRMIST:
SRM Institute of Science and Technology (SRMIST-KTR) is a multi-disciplinary university recognised with an A++ accreditation by NAAC and classified as a Category I university with 12B status by UGC/MoE. In the 2024 NIRF rankings, SRMIST secured the 12th position nationally and holds a global ‘4 Star’ rating from QS, along with the India-centric QS IGAUGE Diamond rating.
Driven by a commitment to academic excellence, research innovation, and global outlook, SRMIST-KTR has emerged as one of India’s most vibrant knowledge ecosystems. With over 500 active labs, ₹270+ crore in external funding, 600+ funded projects, and more than 53,000 research publications, SRMIST is a research-intensive institution.
SRMIST operates six campuses located at Kattankulathur (Chengalpattu district, Tamil Nadu), Ramapuram and Ramapuram Part (Vadapalani) in Chennai, Tiruchirapalli (in Tamil Nadu), Modi Nagar in NCR New Delhi, Sonepat (in Haryana), Amaravati (in AP), and Gangtok (in Sikkim). More details are available at www.srmist.edu.in.

For more information, please write to:
Devadeep Konwar, Director - Communications
Email: director.communications@srmist.edu.in

Few glimpses:


Caption for image 1 (main)- Dr. V. Narayanan, Chairman, Indian Space Research Organisation, Government of India - receiving the Honoris causa in the presence of Shri C.P. Radhakrishnan Hon'ble Governor of Maharashtra, Chancellor Dr. T. R. Paarivendhar and Vice Chancellor Prof. C. Muthamizhchelvan, SRMIST.

(from left to right) for reference:
Dr. K. Gunasekaran, Professor & COE, SRMIST
Dr. S. Ponnusamy, Registrar, SRMIST
Mr. S. Niranjan, Co-Chairman, SRMIST
Dr. V. Narayanan, Chairman, Indian Space Research Organisation, Government of India
Shri C. P. Radhakrishnan, Hon'ble Governor of Maharashtra
Dr. T. R. Paarivendhar, Founder Chancellor, SRMIST
Dr. P. Sathyanarayanan, Pro-Chancellor (Academics), SRMIST
Prof. C. Muthamizhchelvan, Vice Chancellor, SRMIST


Picture 2:

Caption- Shri C. P. Radhakrishnan, Hon'ble Governor of Maharashtra - addresses the gathering.

Monday, 11 August 2025

मोहम्मद कहा करते थे : तुम एक कदम चलो उसकी तरफ, वह हजार कदम चलता है।

कृष्ण भोजन को बैठे, रुक्मिणी ने थाली लगाई। एक कौर लिया होगा मुश्किल से कि हड़बड़ा कर भागे। रुक्मिणी समझ न पाई। लेकिन द्वार तक गए, वापस लौट आए; फिर बैठ गए थाली पर। रुक्मिणी ने कहा, बेबूझ हो गई बात। किसलिए भागे? और फिर क्यों द्वार से वापस लौट आए? भागे तो ऐसे जैसे कहीं आग लग गई हो--कि अब भोजन कैसे किया जा सकता है, आग पहले बुझानी होगी। और लौट आए ऐसे जैसे कुछ भी न हुआ था। यह क्या किया?
कृष्ण ने कहा, जरूर आग लग गई थी; भागा। लेकिन द्वार तक पहुंचा कि आग बुझ गई, लौट आया। मेरा एक भक्त एक राजधानी की सड़क से गुजर रहा है, लोग उस पर पत्थर फेंक रहे हैं, लहू बह रहा है उसके माथे से और वह गोविन्द-गोविन्द किए जा रहा है। वह न तो उत्तर दे रहा है, न बचाव कर रहा है; उसने अपने को बिलकुल मेरे हाथों में छोड़ दिया। भागना एकदम अनिवार्य था।
जो इस भांति असहाय हो जाए, भगवान को उसकी तरफ भागना ही पड़ता है। जो इतना शून्य हो जाए कि पत्थर पड़ रहे हैं, उनसे बचाव भी न करे, भागे भी न, उत्तर भी न दे, तो सारा अस्तित्व उसकी रक्षा के लिए आ जाता है। गङ्ढा हो गया; चारों तरफ से जलधार बहने लगती है--उसे भरने को, उसे झील बनाने को।
फिर, रुक्मिणी ने पूछा, लौट क्यों आए?
कृष्ण ने कहा, लेकिन जब तक मैं द्वार पर पहुंचा, उसने अपना चित्त ही बदल लिया; उसने खुद ही पत्थर हाथ में उठा लिया; अब वह खुद ही जवाब दे रहा है, मेरी कोई जरूरत न रही।
परमात्मा की जरूरत वहीं है, जहां तुम असहाय हो। और तुम्हारी असहाय अवस्था से गोविन्द-गोविन्द का नाम निकल जाए, भजन हो गया। कोई शब्द कहने की जरूरत नहीं कि तुम गोविन्द-गोविन्द चिल्लाओ। भीतर भाव--कि वे भाव भरी आंखें आकाश की तरफ उठ जाएं, कि तुम्हारा हृदय आकाश की तरफ खुल जाए--और तुम अपने तईं कुछ भी न करो; उसी क्षण परमात्मा तुम्हारी तरफ दौड़ पड़ता है। तुम गङ्ढे बनो, परमात्मा भरने को सदा राजी है।
 

मोहम्मद कहा करते थे: तुम एक कदम चलो उसकी तरफ, वह हजार कदम चलता है।
पर तुम एक कदम ही नहीं चलते। और वह एक कदम अत्यंत जरूरी है। क्योंकि जब तक तुम्हारी तरफ से संकेत न मिले कि निमंत्रण है, तब तक परमात्मा कैसे आए? आना भी चाहे तो कैसे आए? जिसे तुमने निमंत्रण ही नहीं दिया है, जिसे तुमने बुलावा ही नहीं भेजा है, वह आ भी जाए तुम्हारे द्वार पर, तो तुम्हारे द्वार खुले न पाएगा। वह दस्तक भी दे, तो तुम समझोगे हवा का झोंका है। वह चिल्लाए, पुकारे भी, तो तुम अपने भीतर के शोरगुल के कारण उसकी आवाज न सुन पाओगे।

भज गोविंद मूढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--01 


 

Thursday, 17 July 2025

ओशों की कहानिया एवं चुटकुले

नेपोलियन और घसियारिन


नेपोलियन जब हार गया तो सेंट हेलेना के द्वीप में उसे कैदी किया गया। पहले ही दिन सुबह नेपोलियन अपने डाक्टर को लेकर घूमने निकला है, और एक घसियारिन औरत अपना बड़ा घास का गट्ठर लिए पगडंडी पर चली आ रही है। डाक्टर ने चिल्लाकर कहा कि ऐ स्त्री, हट जा रास्ते से! देखती नहीं, कौन आ रहा है! सम्राट नेपोलियन आ रहे।नेपोलियन ने डाक्टर का हाथ खींच कर रास्ते से नीचे उतर गया। और कहा : तुम भूलते हो। तुम चूकते। अब वे दिन गए, जब नेपोलियन पहाड़ से कहता कि हट जा रास्ते पहाड़ हटता। अब तो घसियारिन भी हम से कह सकती है——हट जाओ रास्ते से!... ही जाता है।


जितने जल्दी हो सके, मर जाओ!


एक बहुत अनूठा संन्यासी, बोधिधर्म, जब चीन गया बुद्ध का संदेश लेकर, तो सम्राट वू ने उससे पूछा कि संक्षिप्त में मुझे बता दें, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है--तुम देख ही रहे हो कि साम्राज्य बड़ा है और मैं ज्यादा सत्संग नहीं कर सकता--मुझे संक्षिप्त में बता दो कि जीवन की सबसे बहुमूल्य बात क्या है? सबसे बड़ा सौभाग्य क्या है?बोधिधर्म ने कहा, तुम समझ न पाओगे। सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते।
वू थोड़ा चौंका--यह कोई सौभाग्य की बात कर रहा है आदमी कि तुम पैदा ही न होते! पर निश्चित ही बोधिधर्म सौभाग्य की ही बात कर रहा है। बुद्धों की यही तो आकांक्षा है कि पैदा न होते।
पर, बोधिधर्म ने कहा, वह बात तो हो नहीं सकती--खतम। तुम हो ही गए पैदा। वह तो नंबर एक का सौभाग्य है। इसलिए नंबर दो की कहता हूं कि जितने जल्दी मर जाओ।

कहते हैं, वू फिर कभी मिलने नहीं आया बोधिधर्म को--कि यह भी कोई ज्ञानी है!


लेकिन मैं भी तुमसे कहता हूं, नंबर एक का सौभाग्य कि तुम पैदा न हुए होते। लेकिन उस पर तो अब कोई बस नहीं, हो ही गए। तो अब दूसरा सौभाग्य है कि तुम जीते जी मर जाओ; जीवन से तुम्हारा राग-रंग छूट जाए। यह जीते जी मरने का अर्थ है: तुम ऐसे जीने लगो, जैसे तुम हो ही नहीं। बैठो बाजार में, क्योंकि कहीं तो बैठोगे ही; लेकिन ऐसे जैसे हो ही नहीं। पालो पत्नी-बच्चों को, पालना ही पड़ेगा; लेकिन ऐसे जैसे तुम हो ही नहीं। तुम अनुपस्थित हो जाओ। और जल्दी ही तुम पाओगे कि तुम्हारी अनुपस्थिति रिक्त नहीं रही, परमात्मा उसमें धीरे-धीरे उतर आया है।


इतना पागल नहीं कि फिर शादी कर लूं

मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मरने के करीब थी। वह बिस्तर पर पड़ी है। आंख उसने खोली और उसने कहा, सुनो जी, क्या तुम सच कहते हो कि मैं मर जाऊंगी तो तुम पागल हो जाओगे?
नसरुद्दीन ने कहा, सौ फीसदी; तू मरेगी तो मैं निश्चित पागल हो जाऊंगा।
पत्नी हंसने लगी। कहा, झूठ बोलते हो। जहां तक मैं जानती हूं, मैं मरूंगी और तुम दूसरी शादी कर लोगे।
नसरुद्दीन ने कहा कि पागल हो जाऊंगा, यह सच है, लेकिन इतना पागल नहीं कि फिर शादी कर लूं।
अगर जीवन को तुम गौर से देखो, तो तुम दुबारा जन्म न लेना चाहोगे, तुम फिर शादी न करना चाहोगे। क्योंकि सिवाय दुख के और तुमने पाया क्या?


मेरे पिता का दिवाला निकल गया

मुल्ला नसरुद्दीन एक लखपति बाप की बेटी के प्रेम में था और कहता था: चाहे जीवन रहे कि जाए, तुझे नहीं छोड़ सकता। मरने को तैयार हूं, अगर उसकी भी जरूरत हो; शहीद हो सकता हूं, लेकिन तुझे नहीं छोड़ सकता। बड़ी बातें करता था।
एक दिन लड़की बड़ी उदास थी और उसने नसरुद्दीन से कहा कि सुनो, मेरे पिता का दिवाला निकल गया!
नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पहले से ही पता था कि तेरा बाप जरूर कोई न कोई गड़बड़ खड़ी करेगा और हमारा विवाह न होने देगा।
विवाह ही जिस कारण से कर रहे थे, वही खतम हो गया!
तुम्हारे संबंध, तुम कहते कुछ और हो, कारण उनका कुछ और ही होता है। तुम बताते कुछ और हो...और मजा ऐसा है कि तुम जो बताते हो, हो सकता है तुम ऐसा मानते भी होओ कि यही सच है। तुम अपने को भी धोखा दे लेते हो; दूसरे को ही देते हो, ऐसा नहीं है। आदमी बड़ा कुशल है, अपने को भी धोखा दे लेता है।


साईबाबा को भोजन का निमंत्रण

साईंबाबा के जीवन में एक उल्लेख है। एक हिंदू संन्यासी, जिस मस्जिद में साईंबाबा रहते थे, उससे कोई तीन मील दूर रहता था। वह रोज आता साईं के दर्शन को। और जब तक उनके दर्शन न हो जाते, तब तक वापस जाकर भोजन न करता। कभी-कभी बड़ी भीड़ होती, वह मस्जिद में भीतर ही न घुस पाता। कभी-कभी पूरा दिन बीत जाता, तब दर्शन होते। लेकिन जब तक वह पैर न छू ले, तब तक वह भोजन न करता। कभी-कभी रात हो जाती तो फिर भोजन करना मुश्किल हो जाता, उपवासा ही रह जाता; क्योंकि दिन में ही भोजन करने का नियम था।
साईंबाबा ने उससे कहा, नासमझ, तुझे यहां आने की जरूरत भी नहीं, मैं वहीं आ जाऊंगा। मगर पहचानना! ऐसा न हो कि मैं आऊं और तू पहचाने न। ठीक जब तेरा भोजन तैयार होगा, मैं आ जाऊंगा; तू वहीं दर्शन कर लेना और भोजन कर लेना। तीन मील आना-जाना, फिर कभी-कभी उपवासे रह जाना, मुझे भी पीड़ा होती है।
उसने कहा, यह तो बड़े सौभाग्य की बात है। तो कल मैं राह देखूंगा।
कल उसने खाना जल्दी बना लिया; बड़ी खुशी से राह देखने लगा। कोई नहीं आया, एक कुत्ता आया। कुत्ते को भोजन की गंध मिल गई होगी। उसने उठाया डंडा और कहा, भाग यहां से! हम साईं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, आए तुम! दो डंडे मारे, कुत्ते को भगा दिया। फिर कोई नहीं आया। दोपहर हो गई, तो भागा हुआ मस्जिद पहुंचा। वहां भीड़ लगी है। जाकर कहा कि यह क्या मामला है? बोल कर, वचन देकर, आए नहीं? तुम तो यहां जमे हो, भीड़-भाड़ में बैठे हो। आओगे कैसे?
साईं ने कहा, मैं आया, दो डंडे भी खाए, तुम पहचाने नहीं।
घबड़ाया संन्यासी--दो डंडे! उसने कहा, कुत्ता आया था महाराज!
साईं ने कहा, वह मैंने पहले ही कह दिया था--पहचानना, आऊंगा जरूर। किस रूप में आऊंगा, उस समय कौन सा रूप सुलभ-सरल होगा आने के लिए, यह तो समय-समय की बात है। उस समय यही मौजूं था कि कुत्ते की शक्ल में आऊं। कोई दूसरा रूप उस वक्त भर दोपहरी में उपलब्ध भी न था। वह कुत्ता ही वहां था, सो हम उसी पर सवार हुए।
रोने लगा संन्यासी। उसने कहा, अब एक दफा भूल हो गई, एक मौका और! कल, चाहे कुछ भी हो, पहचान लूंगा।
कुत्ता अगर आता दूसरे दिन तो पहचान लेता, लेकिन कुत्ता आया ही नहीं। अब उसको पता था। वह दो की प्रतीक्षा कर रहा था--साईंबाबा सीधे आ जाएं तो ठीक, नहीं तो कुत्ते की राह देख रहा था। कुत्ता आया ही नहीं! अब कुत्ते भी कोई भरोसे के थोड़े ही हैं! मौज की बात--आ गए, आ गए--नहीं आया। आया एक भिखमंगा, कोढ़ी। चूक हो गई फिर। उसकी बास आ रही थी। भयंकर दुर्गंध थी। यह तो भोजन को भी खराब कर देगा, इसकी बास आ रही है। यह तो खाने का भी मन नहीं रह जाएगा। वमन की इच्छा होने लगी उसको देख कर। कहा कि भाई, जा! यहां आने की कोई जरूरत नहीं है; यहां अंदर प्रवेश भी मत करना। थोड़ा शक भी हुआ कि कहीं भूल तो नहीं हो रही। लेकिन यह कोढ़ी और साईंबाबा--कोई तालमेल नहीं दिखता; कुत्ता कम से कम स्वस्थ तो था।
सांझ फिर गया, कहा कि आप आए नहीं; आपकी भी राह देखी, कुत्ते की भी राह देखी।
साईंबाबा ने कहा, आया था, लेकिन दुर्गंध तुझे जंची ही नहीं; तूने दूर-दूर दुतकार दिया।
रोने लगा संन्यासी। कहा, एक बार और!
साईंबाबा ने कहा, हजार बार भी आऊं, तू न पहचानेगा।
पहचान तब संभव हो पाती है जब तुम जागते हो, जागे हुए होते हो।
गोविन्द को भजने का यही अर्थ है कि जो भी तुम्हें दिखाई पड़े, गोविन्द का भजन बन जाए; जहां से भी खबर आए, उसकी ही खबर आए। हवा बहे, तो उसकी याद; जल में कलकल नाद हो, तो उसकी याद; पक्षी गीत गाएं, तो उसकी याद; सन्नाटा हो, तो उसका; शोरगुल हो, तो उसका; बाजार हो, तो उसका; शून्य हिमालय हो, तो उसका। लेकिन उसकी याद हर जगह से आए--पत्ती, फूल, पत्थर--सब तरफ से उसकी याद आए। उसकी याद ही चारों तरफ बरसने लगे और तुम्हें घेर ले; जब भी तुम किसी की आंखों में झांको, उसी में झांको।


तत्वमसि, मारनेवाला भी तू ही हैं

एक संन्यासी को गलती से, भ्रांतिवश, एक सिपाही ने मार डाला। अठारह सौ सत्तावन की बात, क्रांति के दिन, एक मौन संन्यासी, नग्न संन्यासी गुजर रहा है अंग्रेजों की छावनी के पास से। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया, उससे पूछा, कौन हो? लेकिन वह मौन है, इसलिए वह उत्तर नहीं दिया। उत्तर नहीं दिया तो शक बढ़ा, संदेह हुआ। तो एक अंग्रेज सिपाही ने भाला उठा कर उसकी छाती में भोंक दिया। उस संन्यासी ने व्रत लिया था कि सिर्फ मरते वक्त एक बार बोलेगा, उसके पहले नहीं। ऐसा तीस साल से वह मौन था। जब भाला उसकी छाती में छिदा, खून का फव्वारा फूट पड़ा, तब उसने सिर्फ एक वचन उपनिषद का कहा: तत्वमसि श्वेतकेतु! तू भी वही है श्वेतकेतु!
भीड़ इकट्ठी हो गई, लोगों ने पूछा, तुम्हारा क्या मतलब है?
उसने कहा कि मेरा मतलब इतना ही है कि परमात्मा किसी भी रूप में आए, मुझे धोखा न दे पाएगा। आज वह भाला मारने के लिए आया है; भाला हाथ में लेकर आया है; भाला छाती में चुभ गया है; लेकिन मैं देख रहा हूं कि भीतर तू वही है। तत्वमसि श्वेतकेतु! तू मुझे धोखा न दे पाएगा।
छाती से खून बहते हुए वह संन्यासी नाचने लगा, क्योंकि वह अपने हत्यारे में भी परमात्मा को देख सका।


तुम्हारा असली चेहरा क्या है?

एक झेन आश्रम के द्वार पर एक संध्या एक भिक्षु ने दस्तक दी। जापान में झेन आश्रमों का यह नियम है कि अगर कोई भिक्षु, यात्री-भिक्षु, विश्राम करना चाहे, तो उसे कम से कम एक प्रश्न का उत्तर देना चाहिए। जब तक वह एक प्रश्न का ठीक उत्तर न दे दे, तब तक वह अर्जित नहीं करता विश्राम के लिए। वह आश्रम में रुक नहीं सकता, उसे आगे जाना पड़ेगा। आश्रम का प्रमुख द्वार पर आया, द्वार खोला और उसने झेन फकीरों की एक बहुत पुरानी पहेली इस अतिथि के सामने रखी। पहेली है कि तुम्हारा असली चेहरा क्या है? मूल चेहरा कौन सा है? वैसा मूल चेहरा, जो तुम्हारे मां और बाप के पैदा होने के पहले भी तुम्हारा ही था।
यह आत्मा के संबंध में एक प्रश्न है; क्योंकि मां और बाप से जो मिला, वह शरीर है; शरीर का चेहरा भी उनसे मिला। तुम्हारी ओरिजिनल, मौलिक मुखाकृति क्या है? तुम्हारा स्वभाव क्या है? और झेन फकीर कहते हैं, इसका उत्तर शब्दों से नहीं दिया जा सकता; इसका उत्तर तो जीवंत अभिव्यक्ति होनी चाहिए।
जैसे ही यह सवाल पूछा गया, उस अतिथि फकीर ने अपने पैर से जूता निकाला और पूछने वाले के चेहरे पर जूता मारा। पूछने वाला पीछे हट गया, झुक कर उसने सलाम की, नमस्कार किया, और कहा: स्वागत है; भीतर आओ।
दोनों ने भोजन किया, फिर जलती हुई अंगीठी के पास बैठ कर दोनों रात बात करने लगे। मेजबान ने मेहमान से कहा, तुम्हारा उत्तर अदभुत था।
मेहमान ने पूछा, तुम्हें स्वयं इस उत्तर का अनुभव है?
मेजबान ने कहा, नहीं, मुझे तो अनुभव नहीं है, लेकिन बहुत मैंने शास्त्र पढ़े हैं। और शास्त्रों से यह पाया है कि ठीक उत्तर देने वाला डगमगाता नहीं, झिझकता नहीं। तुम बिना झिझके उत्तर दिए। और तुम्हारे उत्तर में बात छिपी थी। शास्त्रों के आधार से मैं जानता हूं, मैं पहचान गया कि तुम्हें उत्तर मिल गया है। क्योंकि तुमने जो उत्तर दिया, वह उत्तर यह था कि नासमझ, शब्द में प्रश्न पूछता है, निःशब्द में उत्तर चाहता है! नासमझ, मूल चेहरे की बात पूछता है, और मूल चेहरा तो तेरे पास भी है! इसलिए मैं जूते मार कर तेरे चेहरे को उत्तर दे रहा हूं कि यह चेहरा मूल नहीं है, जूता मारने योग्य है।
मेजबान ने कहा कि मैं समझ गया तेरा उत्तर, शास्त्र मैंने पढ़े हैं और उसमें ऐसे उत्तर लिखे हैं।
मेहमान कुछ बोला न, चुपचाप चाय की चुस्की लेता रहा। तब जरा मेजबान को शक हुआ, उसने गौर से इसके चेहरे को देखा, इसके चेहरे में उसे कुछ प्रतीत हुआ जो बड़ा असंतोषदायी था। उसने फिर से पूछा कि मित्र, मैं एक बार फिर पूछता हूं, तुझे भी वस्तुतः उत्तर मिल चुका है या नहीं?
मेहमान ने कहा, मैंने भी बहुत शास्त्र पढ़े हैं। और जहां से तुमने मुझे पहचाना कि उत्तर मिल गया, वहीं से मैंने यह उत्तर पढ़ा है; उत्तर तो मुझे भी नहीं मिला है।
शास्त्र भयंकर धोखा हो सकता है, क्योंकि शास्त्र में उत्तर लिखे हैं। लेकिन शास्त्र के उत्तर को दोहराना वैसे ही है, जैसे गणित की किताब के पीछे उत्तर दिए होते हैं। तुम गणित पढ़ो, उलटा कर किताब के पीछे उत्तर देख लो। तो उत्तर तो तुम सही दे दोगे, लेकिन उस प्रश्न से उत्तर तक पहुंचने का जो मार्ग है, जो विधि है, वह तुम्हारे पास न होगी। उत्तर कितना ही सही हो, तुम गलत ही रहोगे; क्योंकि तुम तो विधि से गुजरते, तभी निखरते।


तुम्हारी सोलह आना जिंदगी बेकार गई

एक सूफी फकीर अपनी रोटी कमाने के लिए एक नदी पर लोगों को नाव से पार करवाता था। एक दिन गांव का पंडित उस पार जाना चाहता था। तो उस सूफी फकीर ने कहा, आपसे क्या पैसे लेने! पैसे भी वह एक-दो पैसे लेता था। आपको ऐसे ही पार करा देंगे। पंडित नाव में बैठा; वे दोनों चले। दोनों ही थे नाव में, पंडित ने पूछा--कुछ पढ़ना-लिखना आता है?
पंडित और पूछ भी क्या सकता है! जो वह जानता है, वही सोचता है, दूसरों को भी जना दे। हम वही दूसरों को दे सकते हैं, जो हमारे पास है।
सूफी फकीर का तेज उसे दिखाई न पड़ा। पंडित अपने ज्ञान में अंधा होता है। उसने तो समझा एक साधारण मांझी है। वह एक असाधारण पुरुष था। पंडित जिस परमात्मा की बात सोचता रहा है, सुनता रहा है, वह परमात्मा उस असाधारण पुरुष में मौजूद था; जिसकी पंडित ने अब तक चर्चा की थी, वह उस फकीर में से झांक रहा था। अगर आंख होती तो फकीर में वह सब मिल जाता, जिसके सपने देखे हैं, जिसके शास्त्र पढ़े हैं। प्रत्यक्ष था वहां कोई।
लेकिन पंडित ने पूछा, पढ़ना-लिखना आता है?
पंडित को अगर परमात्मा भी मिल जाए तो वह पूछेगा--सर्टिफिकेट? कहां तक पढ़े-लिखे हो? उसकी अपनी दुनिया है; वह अपने ही शब्दों में, अपने ही शास्त्र में जीता है।
उस फकीर ने कहा कि नहीं, पढ़ना-लिखना तो बिलकुल नहीं आता; मैं बिलकुल गंवार हूं, नासमझ हूं।
उसने जब ये शब्द कहे, तब अगर पंडित के पास जरा भी होश होता तो देख लेता कि कितनी गहरी विनम्रता है। अपने अज्ञान को स्वीकार कर लेना, ज्ञान की तरफ पहला कदम है। और अगर कोई समग्रता से अपने अज्ञान को स्वीकार कर ले, तो वही अंतिम कदम भी हो सकता है। क्योंकि जब तुम पूरे भाव से जानते हो कि कुछ भी नहीं जानता हूं, तब तुम्हारा अहंकार कहां टिकेगा? कहां खड़ा रहेगा? भूमि खो जाएगी पैर के तले से, गिर जाएगा भवन अहंकार का, तुम निरहंकार में उतर जाओगे। वही द्वार है; वहीं से कोई परमात्मा से जुड़ता है।
फकीर ने कहा, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं, बिलकुल बेपढ़ा-लिखा हूं।
पंडित ने कहा, तो फिर तुम्हारी चार आना जिंदगी बेकार गई।
नाव थोड़ी आगे बढ़ी। पंडित ने पूछा, और गणित तो आता ही होगा कम से कम? हिसाब-किताब के लिए जरूरी है।
फकीर ने कहा, अपने पास कुछ है ही नहीं, हिसाब-किताब क्या करना! खाली हाथ हैं; जो दिन में मिल जाता है, वह सांझ तक समाप्त हो जाता है, क्योंकि रोटी से ज्यादा कमाना नहीं है कुछ। रात तो हम फिर फकीर हो जाते हैं, सुबह उठ कर फिर कमा लेते हैं। और परमात्मा अब तक देता रहा है तो कल का हिसाब क्या रखना! और किसी ने दे दिया तो ठीक है और किसी ने न दिया तो भी ठीक है; क्योंकि अब तक जी लिए हैं, आगे भी जी लेंगे। न तो देने वाले से कुछ ऐसा मिल जाता है कि सदा काम आ जाए, और न न देने वाला कुछ छीन लेता है कि सदा के लिए कोई नुकसान हो जाए--सब खेल है।
पंडित ने कहा, तुम्हारी आठ आना जिंदगी बेकार गई।
और तभी अचानक तूफान आ गया; और नाव डगमगाने लगी; और नाव अब डूबी, तब डूबी होने लगी। फकीर हंसा, क्योंकि पंडित बहुत घबड़ा गया। मौत सामने देख कर कौन न घबड़ा जाएगा! ऐसे पंडित अमृत की बातें करते था--आत्मा अमर है--लेकिन जब मौत सामने आती है तब पांडित्य की आत्मा काम नहीं आती, न पांडित्य की अमरता काम आती है। घबड़ा गया; हाथ-पैर कंपने लगे।
फकीर ने पूछा, तैरना नहीं आता?
उसने कहा कि बिलकुल नहीं आता।
फकीर ने कहा, तुम्हारी सोलह आना जिंदगी बेकार गई। अब मैं तो कूदता हूं; हम तो चले; ये नाव तो डूबेगी।
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर...'
संभवतः, शंकर उस कहानी को जानते रहे हों जो मैंने तुमसे कही।
'क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'
जब डूबना आएगा सामने, जब मौत घेरेगी, तब अगर तैरना आता हो तो ही काम आ सकेगा। मौत में तैरना आता हो! और अगर मौत में तैरना नहीं आता तो मौत डुबा लेगी। बहुत बार पहले भी उसने डुबाया--तुम अभी तक भी सजग नहीं हुए हो; तुमने अब तक भी तैरना नहीं सीखा।
अंतकाल के आने पर, मृत्यु के आने पर, कितनी तुम भाषा जानते हो या कितनी भाषाएं जानते हो, कितना व्याकरण जानते हो--कुछ भी तो काम न पड़ेगा।


पहले संस्कृत सीखो, फिर सिखाने आना

राम भारत वापस लौटे, तो उन्होंने सोचा कि अमरीका जैसे देश में, जहां धर्म की कोई परंपरा नहीं है, जहां लोग बिलकुल ही भौतिकवादी हैं--जब वहां मेरे वचनों का ऐसा प्रभाव हुआ और मेरे व्यक्तित्व ने ऐसी लहर पैदा की, तो भारत में तो न मालूम क्या हो जाएगा! लौटता हूं अपने घर, जहां की परंपरा हजारों साल पुरानी है। कब प्रारंभ हुआ जहां का इतिहास--सब अंधकार में खो गया है--इतना लंबा है। जहां वेद लिखे गए, उपनिषद रचे गए, गीता निर्मित हुई; जहां बुद्ध, महावीर और शंकर जैसे लोग पैदा हुए, वहां मेरी बात तो ऐसी पकड़ी जाएगी जैसे मैं हीरे बांटता होऊं। जब अमरीका में--जहां लोग पदार्थवादी हैं, जो ईश्वर को समझ ही नहीं पाते, जिनके ईश्वर से सारे संबंध टूट गए हैं--जब वहां ऐसा चमत्कार हुआ, तो भारत में क्या न होगा!
लेकिन भारत में जो हुआ, वह राम ने सोचा भी न था। यह सोच कर कि उचित होगा कि भारत में प्रवेश मैं काशी से करूं--क्योंकि वही नगरी है; भारत के सारे सौभाग्य का इतिहास काशी के कण-कण में छिपा है; बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन वहां दिया; शंकर ने अपनी विश्वविजय की घोषणा वहां की; वहां जैन तीर्थंकर हुए। काशी से पुराना कोई नगर सारे संसार में नहीं है। जेरुसलम भी नया है। मक्का और मदीना भी बहुत नये हैं। काशी प्राचीनतम तीर्थ है--पृथ्वी पर सबसे पहला सभ्य हुआ नगर है। तो राम पहले काशी पहुंचे। और उन्होंने पहला प्रवचन काशी में दिया।
लेकिन बीच प्रवचन में एक पंडित खड़ा हो गया और उसने कहा कि रुकें! संस्कृत आती है?
राम कुछ समझ न पाए। वे एक मस्त आदमी थे। उन्हें संस्कृत आती भी नहीं थी; उर्दू-फारसी जानते थे। यह उन्होंने सोचा भी न था कि संस्कृत का और वेद से, और ब्रह्म से, और ज्ञान से कोई संबंध है।
कोई भी भाषा न आती हो तो भी आदमी परमात्मा को जान सकता है। कबीर भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; मोहम्मद भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; बढ़ई के बेटे जीसस के जीवन में भी वे फूल खिल जाते हैं। कुछ पंडित होना शर्त तो नहीं है।
राम चौंके! कहा, नहीं, संस्कृत तो नहीं आती।
वह पंडित हंसने लगा। और लोग भी उठ गए। उन्होंने कहा, जब संस्कृत ही नहीं आती, तो वेदांत कैसे आएगा! पहले संस्कृत सीखो, फिर सिखाने आना।
राम उसके बाद हिमालय चले गए। और एक बड़ी उदास घटना है कि राम ने संन्यासी का वेश छोड़ दिया। जब वे मरे तो गैरिक वस्त्रों में नहीं थे। क्योंकि उन्होंने कहा, जो धर्म शब्दों में अटक गया हो, और जिसका संन्यास केवल पांडित्य हो गया हो, और संस्कृत जानने से जहां वेदांत जाना जाता हो, उस समूह का क्या अपने को अंग मानना! जब वे मरे, तब वे गैरिक वस्त्रों में न थे। उन्होंने संन्यास का भी त्याग कर दिया।
परंपरा ने संन्यास तक को दूषित कर दिया है।
अमेरिका समझ सका, भारत न समझ पाया। अमेरिका नासमझ है इसलिए समझ सका। भारत बहुत समझदार है--जरूरत से ज्यादा समझदार है--बिना जाने बहुत कुछ जान लेने की भ्रांति भारत को पैदा हो गई है; पंडित तो हो गया है मन, प्रज्ञावान नहीं हो पाया है; शब्द तो भर गए हैं, निःशब्द के लिए जगह नहीं बची है। और धर्म का कोई संबंध शब्दों से नहीं है।
इसलिए मैं जो तुमसे कहूं, उससे भी ज्यादा ध्यान उस पर देना जो मैं तुमसे न कहूं। बोलूं--शब्द पर बहुत ध्यान मत देना; दो शब्दों के बीच में जो खाली जगह होती है, उस पर ध्यान देना। जो बोलूं, वह छूट जाए, हर्जा नहीं है; लेकिन जो अनबोला है, वह न छूट पाए।

फायदा न होने पर दाम वापस


मुल्ला नसरुद्दीन दवाएं बनाता है और बेचता है। एक पैकेट पर उसने लिख रखा था: फायदा न होने पर दाम वापस। मैं उसकी दुकान पर बैठा था। एक आदमी आया, वह बड़ा नाराज था। उसने कहा, महीना भर हो गया दवा फांकते-फांकते, कोई फायदा नहीं हुआ। दाम वापस चाहिए!
नसरुद्दीन ने कहा कि पैकेट पर लिखा है: फायदा न होने पर दाम वापस। तुम्हें न हुआ हो, हमें तो फायदा हुआ है।
अपनी-अपनी व्याख्या है। जीवन को तुम वैसा ही करके देखते हो, जैसा तुम देखना चाहते हो। शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं; सत्यों के अर्थ बदल जाते हैं। तुम अपने आस-पास अपनी ही मान्यताओं का एक संसार खड़ा कर लेते हो, फिर तुम उसी संसार में जीते हो। और आदमी अपने ही कारण खोजता चला जाता है, और कारणों के थेगड़े लगाए चला जाता है, ताकि मान्यताएं टूट न जाएं, फूट न जाएं; जोड़त्तोड़ बिठाता रहता है।

मैंने झापड़ा मारा तो चौंसठों दांत नीचे गिर जाएंगे...


मुल्ला नसरुद्दीन का बाजार में किसी से झगड़ा हो गया। वह आदमी बहुत नाराज था और उसने कहा, एक ऐसा झापड़ा मारूंगा--नसरुद्दीन को कहा--कि बत्तीसों दांत जमीन पर गिर जाएंगे, बत्तीसी नीचे गिर जाएगी।
मुल्ला नसरुद्दीन और जोश में आ गया, उसने कहा कि तूने समझा क्या है! अगर मैंने झापड़ा मारा तो चौंसठों दांत नीचे गिर जाएंगे।
एक तीसरा आदमी पास में खड़ा था, उसने कहा, भई बड़े मियां, इतना तो खयाल रखो कि चौंसठ दांत आदमी के होते ही नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पता था कि तू भी बीच में कूद पड़ेगा, इसलिए चौंसठ। एक ही झापड़े में दोनों के गिरा दूंगा।
आदमी अपनी...तुमसे भूल भी हो जाए, तो भी तुम भूल स्वीकार नहीं करते। तुम अपनी भूल के लिए भी कारण खोज लेते हो, तर्क खोज लेते हो।
भूल को स्वीकार करना बड़ा साहस है। और जिसने भूल को स्वीकार कर लिया, धीरे-धीरे भूलें तिरोहित हो जाती हैं।

सब था, फिर भी आदमी भूखा ही मर गया!

सूफी कहते हैं, एक आदमी भूखा मर रहा था। आटा था घर में, जल भी था, चूल्हा भी था, ईंधन भी था; लेकिन उस आदमी को पता नहीं कि कैसे आटा गूंथे, कैसे आग जलाए, कैसे आग पर रोटी सेंके। सब था--भूख भी थी, भोजन भी था--संयोग न बन सका। वह आदमी भूखा ही मर गया!
यह सभी आदमियों की कथा है। तुम्हारे पास सब संयोग है और तुम भूखे हो! ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम्हारे पास मौजूद नहीं है। परमात्मा किसी को इस तरह भेजता ही नहीं; सब साधन देकर भेजता है। लेकिन साधनों को बिठाना पड़ेगा। उनका ठीक अनुपात, ठीक समन्वय, ठीक संगीत बन जाए, तो तुम्हारे भीतर परमात्मा का प्रकाश हो जाएगा। न तो बुद्धि से घिरना, न हृदय से; दोनों तटों के बीच तुम्हारी चेतना बह सके नदी की धार की भांति; तुम गंगा बन जाना; फिर सागर दूर नहीं है। 


मुल्ला का निमंत्रण

मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्रों को लेकर एक दिन सांझ घर आया। होटल में बैठे-बैठे जोश चढ़ गया। ऐसे ही कुछ बात चल रही थी, किसी ने कह दिया कि तुम बड़े कंजूस हो। उसने कहा, कौन कहता है? मेरा जैसा दानी नहीं! लोगों ने जोश पर चढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है, तो आज हम सबको निमंत्रण करवा दो तुम्हारे घर। उसने कहा, आओ, जितने लोग यहां मौजूद हैं। कोई तीस-पैंतीस का जत्था आ गया। घर पहुंचते-पहुंचते होश आया कि यह क्या कर लिया! क्योंकि अब तक तो भूल ही गए थे जोश में कि पत्नी घर बैठी है। अब वह मुश्किल हो जाएगी। तीस-पैंतीस! एक आदमी ले आओ घर में तो मुसीबत खड़ी होती है। तो उसने कहा कि देखो भई, तुम भी सब घर-द्वार वाले हो, तुम भी जानते हो आदमी की असलियत। मैं भी एक साधारण पति हूं, पत्नी घर में बैठी है। तुम जरा बाहर रुको, पहले मैं उसे राजी कर लूं, समझा-बुझा लूं, फिर तुम्हें भीतर बुला लूंगा।

वह सबको बाहर छोड़ कर दरवाजा बंद करके भीतर गया। पत्नी तो एकदम पागल हो गई, गुस्से में आ गई कि हद्द हो गई, पूरा गांव लिवा लाए! और घर में खाना भी नहीं, सब्जी भी नहीं। दिन भर से कहां थे? आटा पिसा ही नहीं है। सब्जी तुम लाए नहीं--आ कहां से जाएगी? कोई आकाश से टपकती है?
तो मुल्ला ने कहा, अब तू ही बता, क्या करें? अब तो रात भी हो गई, बाजार भी बंद हो गया। इनसे किस तरह निपटारा हो?
उसने कहा, अब तुम ही समझो; जो निपटारा करना हो, करो! मैंने मुसीबत बुलाई भी नहीं, तुम्हीं लेकर आए हो।
तो उसने कहा, एक काम कर, तू जाकर उनसे कह दे कि मुल्ला घर पर नहीं है।
वह बाहर आई पत्नी, उसने उनसे कहा कि किसकी राह देख रहे हो? वे घर पर नहीं हैं।
यह कैसे हो सकता है--उन लोगों ने कहा--वे हमारे साथ ही आए थे, और हमने उनको बाहर जाते भी नहीं देखा, भीतर ही गए हैं।
वे पत्नी से जिरह करने लगे, दलीलबाजी करने लगे। आखिर मुल्ला को भी जोश आ गया। भीतर सुन रहा है दलील, वह भूल ही गया जोश में फिर, खिड़की से झांक कर बोला कि सुनो जी, पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया हो, यह भी तो हो सकता है।
आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते। 

बुद्ध जन्म : एक के विपरित सात
(मानियेले नाही बहुमता)


बुद्ध का जन्म हुआ। पांचवें दिन रिवाज के अनुसार श्रेष्ठतम पंडित इकट्ठे हुए। उन्होंने बुद्ध को नाम दिया--सिद्धार्थ। सिद्धार्थ का अर्थ होता है: कामना की पूर्ति; आशा की पूर्ति; अर्थ की उपलब्धि; मंजिल का मिल जाना। बूढ़े शुद्धोधन के घर में बेटा पैदा हुआ था। जीवन भर प्रतीक्षा की थी, आशा की थी, सपने देखे थे; बहुत बार निराश हुआ था; और अब बुढ़ापे में बेटा पैदा हुआ था; निश्चित ही सिद्धार्थ था। पंडितों ने नाम ठीक ही दिया था। आठ बड़े पंडित थे। सम्राट पूछने लगा, इस नवजात शिशु का भविष्य भी कहोगे? सात पंडितों ने अपने हाथ उठाए और दो अंगुलियों का इशारा किया। सम्राट कुछ समझा नहीं। उसने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। इशारे में नहीं, स्पष्ट कहो। तो उन सात पंडितों ने कहा कि दो विकल्प हैं--या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सब छोड़ कर सर्वत्यागी, वीतरागी, संन्यस्त हो जाएगा; या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सर्व वीतरागी संन्यासी होगा।सिर्फ एक पंडित चुप रहा। वह सबसे युवा था। कोदन्ना उसका नाम था। लेकिन वह सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली भी था। सम्राट ने पूछा, तुम चुप हो, तुमने दो अंगुलियां न उठाईं!
कोदन्ना ने कहा, दो अंगुलियां तो सभी के जन्म के साथ उठाई जा सकती हैं, क्योंकि दोनों विकल्प सभी के सामने होते हैं--या तो संसार की दौड़ का, या संन्यास का। संन्यास या संसार--ये तो दो विकल्प सभी के सामने होते हैं। इन पंडितों ने कुछ विशेष नहीं किया अगर बुद्ध के लिए दो अंगुलियां उठाईं; मैं एक अंगुली उठाता हूं: यह संन्यासी होगा।

लेकिन आदमी का अभागा मन, शुद्धोधन रोने लगा। यह कोदन्ना सर्वज्ञात ज्योतिषी है; युवा है, पर महातेजस्वी है; और उसके वचन कभी खाली नहीं गए। दूसरे पंडितों के साथ तो सुविधा थी थोड़ी कि चक्रवर्ती भी बन सकता है, कोदन्ना ने तो विकल्प ही तोड़ दिया। उसने तो कहा, यह निश्चित बुद्ध बनेगा। उन पंडितों के साथ तो सम्राट रोया न था, प्रसन्न हुआ था--चक्रवर्ती सम्राट होगा बेटा। और दूसरे विकल्प को उसने कोई मूल्य न दिया था, क्योंकि जब चक्रवर्ती सम्राट होने का विकल्प हो तो कौन संन्यासी होना चाहता है! लेकिन कोदन्ना ने तो मार्ग तोड़ दिया, उसने तो एक ही अंगुली उठाई है। लेकिन सम्राट ने अपने मन को समझाया, कोदन्ना अकेला है, विपरीत सात ज्योतिषी हैं। ऐसे ही तो आदमी अपने मन को सांत्वना देता है। सात ही ठीक होंगे, एक ठीक न होगा। लेकिन वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ।


लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है?



एक अति प्राचीन कथा है। घने वन में एक तपस्वी साधनारत था--आंख बंद किए सतत प्रभु-स्मरण में लीन। स्वर्ग को पाने की उसकी आकांक्षा थी; न भूख की चिंता थी, न प्यास की चिंता थी। एक दीन-दरिद्र युवती लकड़ियां बीनने आती थी वन में। वही दया खाकर कुछ फल तोड़ लाती, पत्तों के दोने बना कर सरोवर से जल भर लाती, और तपस्वी के पास छोड़ जाती। उसी सहारे तपस्वी जीता था। फिर धीरे-धीरे उसकी तपश्चर्या और भी सघन हो गई--फल बिना खाए ही पड़े रहने लगे; जल दोनों में पड़ा-पड़ा ही गंदा हो जाता--न उसे याद रही भूख की और न प्यास की। लकड़ियां बीनने वाली युवती बड़ी दुखी और उदास होती, पर कोई उपाय भी न था।
इंद्रासन डोला; इंद्र चिंतित हुआ; तपस्या भंग करनी जरूरी है; सीमा के बाहर जा रहा है यह व्यक्ति--क्या स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा करने का इरादा है?
लेकिन कठिनाई ज्यादा न थी, क्योंकि इंद्र मनुष्य के मन को जानता है। स्वर्ग से जैसे एक श्वास उतरी--सूखी, दीन-दरिद्र, काली-कलूटी वह युवती अचानक अप्रतिम सौंदर्य से भर गई; जैसे एक किरण उतरी स्वर्ग से और उसकी साधारण सी देह स्वर्णमंडित हो गई। पानी भर रही थी सरोवर से तपस्वी के लिए, अपने ही प्रतिबिंब को देखा, भरोसा न कर पाई--साधारण स्त्री न रही, अप्सरा हो गई; खुद के ही बिंब को देख कर मोहित हो गई! तपस्वी की सेवा उसने करनी जारी रखी।
फिर एक दिन तपस्वी ने आंख खोलीं। इस वनस्थली से जाने का समय आ गया--तपश्चर्या को और गहन करना है, पर्वत-शिखरों की यात्रा पर जाना है। उसने युवती से कहा कि मैं अब जाऊंगा, यहां मेरा कार्य पूरा हुआ। अब और भी कठिन मार्ग चुनना है, स्वर्ग को जीत कर ही रहना है।
युवती रोने लगी। उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। उसने कहा, मैंने कौन सा दुष्कर्म किया कि मुझे अपनी सेवा से वंचित करते हो? और तो कुछ मैंने कभी मांगा नहीं!
तपस्वी ने सोचा, उस युवती के चेहरे की तरफ देखा। ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। स्वप्न में भी ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। युवती पहचानी भी लगती थी और अपरिचित भी लगती थी। रूप-रेखा तो वही थी, लेकिन कुछ महिमा उतर आई थी। अंग-प्रत्यंग वही थे, लेकिन कोई स्वर्ण-आभा से घिर गए थे। जैसे कोई गीत की कड़ी, भूली-बिसरी, फिर किसी संगीतज्ञ ने बांसुरी में भर कर बजाई हो।
तपस्वी बैठ गया। उसने पुनः आंख बंद कर लीं। वह रुक गया।
उस रात युवती सो न सकी--विजय का उल्लास भी था और साधु को पतित करने का पश्चात्ताप भी। आनंदित थी कि जीत गई और दुखी थी कि किसी को भ्रष्ट किया, किसी के मार्ग में बाधा बन गई, और कोई जो ऊर्ध्वगमन के लिए निकला था, उसकी यात्रा को भ्रष्ट कर दिया। रात भर सो न सकी--रोई भी, हंसी भी। सुबह निर्णय लिया, आकर तपस्वी के चरणों में झुकी और कहा, मुझे जाना पड़ेगा, मेरा परिवार दूसरे गांव जा रहा है।
तपस्वी ने आशीर्वाद दिया कि जाओ, जहां भी रहो, खुश रहो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।
युवती चली गई। वर्ष बीते, तपस्या पूरी हुई। इंद्र उतरा, तपस्वी के चरणों में झुका और कहा, स्वर्ग के द्वार स्वागत के लिए खुले हैं।
तपस्वी ने आंखें खोलीं और कहा, स्वर्ग की अब मुझे कोई जरूरत नहीं!
इंद्र तो भरोसा भी न कर पाया कि कोई मनुष्य और कहेगा कि स्वर्ग की मुझे अब कोई जरूरत नहीं। इंद्र ने सोचा, तब क्या मोक्ष की आकांक्षा इस तपस्वी को पैदा हुई है। पूछा, क्या मोक्ष चाहिए?
तपस्वी ने कहा, नहीं, मोक्ष का भी मैं क्या करूंगा।
तब तो इंद्र चरणों में सिर रखने को ही था कि यह तो आत्यंतिक बात हो गई, तपश्चर्या का अंतिम चरण हो गया, जहां मोक्ष की आकांक्षा भी खो जाती है। पर झुकने के पहले उसने पूछा, मोक्ष के पार तो कुछ भी नहीं है, फिर तुम क्या चाहते हो?
उस तपस्वी ने कहा, कुछ भी नहीं, वह लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है, वही चाहिए।
हंसना मत; आदमी की ऐसी कमजोरी है। सोचना, हंसना मत; क्योंकि पृथ्वी का ऐसा प्रबल आकर्षण है। कहानी को कहानी समझ कर टाल मत देना, मनुष्य के मन की पूरी व्यथा है। और ऐसा मत सोचना कि ऐसा विकल्प उस तपस्वी के सामने ही था कि युवती थी, स्वर्ग था, दोनों के बीच चुनना था। तुम्हारे सामने भी विकल्प वही है; सभी के सामने विकल्प वही है--या तो उन सुखों को चुनो जो क्षणभंगुर हैं, या उसे चुनो जो शाश्वत है; या तो शाश्वत को गंवा दो क्षणभंगुर के लिए, या क्षणभंगुर को समर्पित कर दो शाश्वत के लिए।

संन्यासी और वेश्या


मैंने सुना है, एक संन्यासी मरा। जिस दिन मरा, उसी दिन एक वेश्या भी मरी; दोनों आमने-सामने रहते थे। देवदूत लेने आए, तो संन्यासी को नरक की तरफ ले जाने लगे और वेश्या को स्वर्ग की तरफ। संन्यासी ने कहा, रुको, कुछ भूल हो गई मालूम होती है! यह क्या उलटा हो रहा है? मुझ संन्यासी को नरक की तरफ, वेश्या को स्वर्ग की तरफ! जरूर संदेश में कहीं कोई भूल-चूक हो गई है। संसार का इतना बड़ा काम है, भूल-चूक हो सकती है। छोटी-मोटी सरकारें भूल करती हैं, तो पूरे विश्व की व्यवस्था में भूल हो जाना कुछ आश्चर्यजनक नहीं। तुम फिर से पता लगा कर आओ।
शक तो देवदूतों को भी हुआ। उन्होंने कहा, भूल कभी हुई तो नहीं; लेकिन मामला तो साफ दिखता है कि यह वेश्या है और तुम संन्यासी हो। वे गए। लेकिन ऊपर से खबर आई कि कोई भूल-चूक नहीं है; जो होना था, वही हुआ है। वेश्या को स्वर्ग ले आओ, संन्यासी को नरक में डाल दो। अगर ज्यादा जिद करे, तो उसे समझा देना कि कारण यह है।
जिद संन्यासी ने की, तो देवदूतों को कारण बताना पड़ा। कारण यह था कि संन्यासी रहता तो मंदिर में था, लेकिन सोचता सदा वेश्या की था; पूजा तो करता था, आरती तो उतारता था भगवान की, लेकिन मन में प्रतिमा वेश्या की होती थी। और जब वेश्या के घर में रात राग-रंग होता, बाजे बजते, नाच होता, कहकहे उठते, नशे में डूब कर लोग उन्मत्त होते, तो उसको ऐसा लगता कि मैंने अपना जीवन व्यर्थ ही गंवाया। आनंद वहां है, मैं यहां क्या कर रहा हूं--इस निर्जन में बैठा, इस खाली मंदिर में, यह पत्थर की मूर्ति के सामने! पता नहीं, भगवान है भी! शक पैदा होता। और रात जाग कर वह करवटें बदलता; और वेश्या को भोगने के सपने देखता।
और वेश्या की हालत ऐसी थी कि वह वेश्या थी--लोगों को रिझाती भी, नाचती भी--पर मन उसका मंदिर में लगा था। वह सदा यह सोचती--जब मंदिर की घंटियां बजतीं--तो वह सोचती कि कब मेरे इस भाग्य का उदय होगा कि मैं भी मंदिर में प्रवेश कर सकूंगी। मैं अभागी, मैंने अपना जीवन गंदगी में बिता दिया। अगले जन्म में, हे परमात्मा, मुझे मंदिर की पुजारिन बना देना! मुझे मंदिर की सीढ़ियों की धूल भी बना देगा तो भी चलेगा--उनके पैरों के नीचे पड़ी रहूं जो पूजा को आते हैं, उतना भी बहुत है। जब मंदिर में सुगंध उठती धूप की, तो वह आनंदमग्न हो जाती। वह कहती, यह भी क्या कम सौभाग्य है कि मैं मंदिर के निकट हूं! बहुत हैं, जो मंदिर से दूर हैं। माना कि पापिनी हूं; लेकिन जब भी पुजारी पूजा करता, तब भी वह आंख बंद करके बैठ जाती।
पुजारी वेश्या की सोचता, वेश्या पूजा की सोचती। पुजारी नरक चला गया, वेश्या स्वर्ग चली गई। 

जलालुद्दीन रूमी और कुआ खोदनेवाला किसान


बहुत बड़ा सूफी फकीर हुआ, जलालुद्दीन रूमी। वह अपने विद्यार्थियों को एक दिन पास के खेत में ले गया। उसने वहां जाकर उनको बताया--सारा खेत खराब हो गया था। वह जो खेत का मालिक था, उसने पहले कुआं खोदना शुरू किया एक। कोई पंद्रह-बीस फीट खोदा, फिर पाया कि जल नहीं मिलता, तो दूसरी जगह खोदना शुरू किया। पागल रहा होगा। दूसरी जगह भी खोदा, वहां भी नहीं मिला, तो उसने तीसरी जगह खोदना शुरू कर दिया। उसने आठ गङ्ढे खोद डाले, सारा खेत खराब हो गया। अब वह नौवां खोद रहा था।
जलालुद्दीन ने कहा, इस आदमी को देखो! अगर इसने यह सारा श्रम एक ही जगह लगाया होता, तो जल कितना ही दूर होता तो भी मिल गया होता। लेकिन यह दस-बीस फीट खोदता है और सोचता है कि जब इतने दूर तक नहीं मिला तो आगे कैसे मिलेगा! तो कहीं और खोदो, इस जगह जल नहीं है। फिर दस-बीस फीट खोदता है। ऐसे यह आठ गङ्ढे खोद चुका है। सब मिल कर एक सौ साठ फीट की खुदाई हो चुकी है और जल नहीं मिला! अगर एक सौ साठ फीट यह एक ही जगह खोद लेता, तो जल मिलना सुनिश्चित है।
तुम जीवन में बहुत बार खुदाई शुरू करोगे। कभी ध्यान शुरू कर देते हो, जोश आ जाता है; पंद्रह दिन, महीना चला, फिर शांत हो गए! फिर दो-चार साल बाद खयाल आया, फिर थोड़ी सी खुदाई की, फिर शांत हो गए! ऐसे तुम कई गङ्ढे खोद लोगे, लेकिन जल तक न पहुंचोगे; तुम्हारा खेत खराब हो जाएगा। 

छतावर हरवला उंट


इब्राहीम नावाचा एक राजा होता.
भयंकर घाबरट वृत्तीचा. अतिशय दु:खी असायचा. त्याला सतत भीती वाटायची. आपलं राज्य जाईल. आपल्याला कोणीतरी मारेल. त्याने राजवाड्यावर कडक पहारे लावले होते.
एके रात्री त्याला छपरावर खुडबुडीच्या आवाजाने जाग आली. त्याच्या शयनकक्षाच्या वरच खुडबुड होत होती. तो उठून पलंगाखाली लपला. तिथून त्याने चाचरत विचारलं, कोण आहे तिथे? काय करतोयस तिथे? शिपायांना बोलावू का?
वरून एक जरबदार आवाज उत्तरला, माझा ऊंट हरवलाय तो शोधतोय.
ऊंट? छपरावर?
राजाने बोंब ठोकली, अरे धावा धावा, छपरावर कोणीतरी वेडा चढलाय.
शिपाई धावले, छपरावर दडदड आवाज आला. शिपायांनी खूप प्रयत्न केला, पण, छपरावर ऊंट शोधायला चढलेला माणूस काही त्यांच्या हाती लागला नाही.
राजा भयंकर बेचैन झाला. हे नक्कीच आपल्याला मारायचं कारस्थान असणार. यात नक्कीच काहीतरी अपशकुन दडलेला असणार, असं त्याच्या मनाने घेतलं आणि तो आणखी चिंतित झाला.
दुसऱ्या दिवशी दुपारी महालाच्या मुख्य प्रवेशद्वारावर बरीच गडबड उसळल्याचं त्याच्या लक्षात आलं. त्याने शिपायाला बोलावून विचारलं.
शिपाई म्हणाला, बाहेर एक वेडा माणूस आलाय. तो म्हणतोय की या धर्मशाळेत मलाही राहायचंय. आम्ही त्याला सांगितलं, ही धर्मशाळा नाही, राजवाडा आहे, पण तो ऐकतच नाही. तुम्ही चिंता करू नका. आम्ही त्याला आता आमच्या पद्धतीने धर्मशाळा दाखवतो.
तेवढ्यात राजाच्या कानावरही तो ओरडा आला आणि त्यातला तो आवाज… ती जरब… काल रात्रीच ऐकलेली.
भूल पडल्यासारखा राजा शिपायाला म्हणाला, त्याला हुसकावू नका. इकडे घेऊन या.
शिपायांनी मुसक्या बांधून आणलेला माणूस एक फकीर होता. राजा त्याला म्हणाला, महाराज, तुम्ही तर चांगले परमज्ञानी फकीर दिसताय. तुम्हाला राजवाडा आणि धर्मशाळा यांच्यातला फरक समजू नये?
फकीर म्हणाला, तू कोण?
राजा म्हणाला, मी इब्राहीम. मी राजा आहे आणि या राजवाड्याचा मालक.
फकीर म्हणाला, मी याआधीही इथे आलो होतो. तेव्हाही तुझ्यासारखाच दिसणारा एक माणूस इथे मला भेटला होता. तो तर म्हणत होता की तो राजा आहे, हे त्याचं सिंहासन आहे आणि हा राजवाडा त्याच्या मालकीचा आहे!
राजा म्हणाला, म्हणजे तुम्ही माझ्या वडिलांना भेटला होतात. ते आधीचे राजे होते ना!
फकीर म्हणाला, पण, त्याआधीही मी आलो होतो. तेव्हा एक पार पिकलेला म्हातारा या राज्यावर आणि राजवाड्यावर मालकी सांगत होता.
राजा म्हणाला, तुम्ही माझ्या आजोबांना भेटले असणार.
फकीर म्हणाला, आता तूच मला सांग. इथे कोणी चार वर्षं राहतो आणि कोणी चाळीस वर्षं राहतो. पण, इथून प्रत्येकाला जावं तर लागतंच ना कधी ना कधी? मग ही धर्मशाळा नाही का?
इब्राहीमच्या डोक्यात लख्ख प्रकाश पडला आणि तो साधूच्या पायावर लोळण घेत म्हणाला, तुम्ही माझे गुरू. मला शिष्य म्हणून स्वीकारा. या धर्मशाळेत हवा तेवढा काळ राहा. नंतर एकत्रच निघू. फक्त मला एकच विचारायचंय. तुम्ही छपरावर ऊंट शोधत होतात, ते का?
फकीर म्हणाला, छपरावर कधी ऊंट हरवू शकत नाही, ते अशक्य आहे, हे तुला कळतं. पण, मग सिंहासनात, संपत्तीत, स्त्रीसहवासात सुख कसा काय शोधत फिरतोस तू? तेही सगळे छपरावरचे ऊंटच ना? सगळा आनंद, सगळं सुख हे तुझ्या आत आहे, तिथे शोध.
ओशो

फिर दूकान पर कौन है?


एक आदमी मर रहा था। उसने पूछा आंख खोल के कि मेरा बड़ा बेटा कहां है? पत्नी ने कहा वह तुम्हारे पास ही खड़ा है। तुम्हारे पैरों के पास। उससे छोटा कहां है? वह भी पास बैठा था। आदमी की आंखें धुंधली हो गयी हैं। सांझ हो रही है और मरने के वह करीब है। उसने टेक लगाकर उठने की कोशिश की, और कहा कि तीसरा बेटा कहां है? पत्नी ने कहा आप उठने की कोशिश मत करें, वह तुम्हारे बाएं बैठा है। हम सब यही मौजूद हैं। कोई कहीं नहीं है, सब यहीं मौजूद हैं।
वह बहुत घबड़ा गया। वह उठ कर बैठ गया, और उसने कहा कि इसका मतलब? फिर दूकान पर कौन है? वह मर रहा है! वह पूछ भी नहीं रहा है कि बेटे यहां मेरे पास हैं? वह असल में यह पूछ रहा है कि दूकान चल रही है? सब बंद करके तो नहीं आ गए हैं यहीं?
मरते क्षण भी दुकान ही ओंठ पर होगी। अगर सारे जीवन दूकान ओंठ पर रही, स्वाभाविक है

 नेताजींचे भाषण आणि शेतकऱ्यांच्या गायी...!

एक नेता भाषण द्यायला गेला, तर सभास्थळी एकच शेतकरी श्रोता उपस्थित होता. नेता म्हणाला, भाषण देऊ की नको.
श्रोता म्हणाला,  “मी एक शेतकरी आहे. मी जेव्हा २० गायींना चारा टाकण्यासाठी जातो. पण, तिथे फक्त एकच गाय असते, तेव्हा मी तिला चारा न टाकता परत येत नाही. एक असली तरी तिला चारा टाकतोच.”
श्रोत्याच्या उत्तराने प्रभावित झालेला नेता तासभर धुव्वाधार भाषण देतो. भाषण संपल्यानंतर श्रोत्याला विचारतो, “कसे झाले भाषण?”
श्रोता म्हणतो, “छान. पण मला जेव्हा २० गायींच्या ऐवजी एकच गाय मिळते, तेव्हा त्या एकाच गायीला सर्व २० गायींचा चारा खाऊ घालत नसतात, हे मी जाणतो. २० गायींचा चारा तुम्ही मला एकट्यालाच खाऊ घातला.”

 शिकारी नसिरुद्दीन


मुल्ला नसिरुद्दीन आपल्या मुलाला शिकारीला घेऊन गेला. आपण किती पक्के निशाणेबाज आहोत, याच्या बढाया मारत असतो. आकाशात जाणाऱ्या बगळ्यांच्या एका थव्यावर तो निशाणा साधतो आणि गोळी झाडतो. पण, नेम चुकतो आणि बगळे पूर्वीसारखेच सुखेनैव उडत राहतात.
मुलगा हसायला लागतो.
मुल्ला म्हणतो, काय कमालीचे बगळे आहेत. गोळी लागल्यानंतरही उडतच आहेत.

 

 

 


 

बोलावें तें आम्ही आतां अबोलणें । एकाचि वचनें सकळासि ॥

एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए ...