जिनसूत्र--(भाग--1) प्रवचन--07
जीवन एक सुअवसर है—प्रवचन—सातवां
सूत्र:
सच्चाम्म” विसदि तवो, सच्चाम्मि संजमो तह वसे तेसा वि गुणा।
सच्चं णिबंधणं हि य, गुणाणमदधीव मच्छाणं।। 17।।
"सच्चाम्मि वसदि तवो'--सत्य में तप का वास है। "सच्चामि संजमो तह वसे तेसा वि गुणा।' "सत्य में संयम और समस्त शेष गुणों का भी वास है। जैसे समुद्र मछलियों का आश्रय है, वैसे ही समस्त गुणों का सत्य आश्रय है।'
सत्य का अर्थ समझ लेना अत्यंत अनिवार्य है।
साधारणतः हम सोचते हैं, सत्य कोई वस्तु है, जिसे खोजना है; जैसे सत्य कहीं रखा है, तैयार है; किसी दूर के मंदिर में सुरक्षित है प्रतिमा की भांति--हमें यात्रा करनी है, मंदिर के द्वार खोलने हैं, और सत्य को उपलब्ध कर लेना है। ऐसा सोचा तो भूल हो गई शुरू से ही।
सत्य कोई वस्तु नहीं है। सत्य तो एक प्रतीति है, अनुभूति है। कहीं तैयार रखा नहीं है। जीयोगे तो तैयार होगा। कहीं मौजूद नहीं है कि उघाड़ लेना है। ऐसा नहीं है कि चाबी मिल जायेगी, ताला खोल लोगे, तिजोड़ी तक पहुंच जाओगे--और धन तो तिजोड़ी में रखा ही था; जब चाभी न मिली थी तब भी रखा था; जब ताला न खोला था तब भी रखा था; न खोलते सदा के लिए तो भी रखा रहता--ऐसा नहीं है। सत्य तो जीवंत अनुभूति है। संज्ञा नहीं, क्रिया है।
सत्य का अर्थ है: ऐसे जीना, जिस जीवन में कोई वंचना न हो; ऐसे जीना कि बाहर और भीतर का तालमेल हो। सत्य एक संगीत है--बाहर और भीतर का तालमेल है। तो कदम-कदम सम्हालना होगा, क्योंकि सत्य आचरण है।
इसलिए महावीर कहते हैं: "सत्य में तप है, संयम है, समस्त गुणों का वास है।' क्योंकि सत्य आचरण है।
जिसने सत्य को साध लिया, सब सध जायेगा। फिर अलग से कुछ साधने को बचता नहीं। क्योंकि जिसने बाहर और भीतर का एक ही जीवन शुरू कर दिया, उसके जीवन में हिंसा नहीं हो सकती; उसके जीवन में झूठ नहीं हो सकता; उसके जीवन में क्रोध नहीं हो सकता; उसके जीवन में प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकती। असंभव है। सत्य आया तो जैसे प्रकाश आया; अब अंधेरा नहीं हो सकता।
लेकिन सत्य न तो कोई वस्तु है--वस्तु होती तो उधार भी मिल जाती। सत्य उधार नहीं मिलता। मेरे पास हो तो भी तुम्हें देने का कोई उपाय नहीं। सत्य कोई सिद्धांत भी नहीं है; नहीं तो एक बार कोई खोज लेता, सबके लिए, सदा के लिए मिल जाता। सत्य कोई तर्क की निष्पत्ति भी नहीं है, कि केवल विचार करने से मिल जायेगा, कि ठीक से सोचा तो मिल जायेगा। नहीं, जो ठीक से जीएगा, उसे मिलेगा। सोचना काफी नहीं है--जीना पड़ेगा।
दो ढंग से जीने के उपाय हैं। एक, जिसे हम असत्य का जीवन कहें। तुम कुछ हो, कुछ होना चाहते हो--बस असत्य शुरू हो गया। तुम कुछ हो, कुछ और दिखाना चाहते हो--असत्य हो गया। तुम कुछ हो, और तुमने कुछ मुखौटे ओढ़ लिए; होना तो कुछ था, प्रदर्शन कुछ और हो गया--असत्य हो गया।
इसे समझोगे तो पाओगे कि तुम्हारे तथाकथित धर्मों ने तुम्हें सत्य की तरफ ले जाने में सहायता नहीं दी बाधा डाल दी। क्योंकि उन सबने तुम्हें पाखंड सिखाया। उन सबने कहा, कुछ हो जाओ।
महावीर कहते हैं, तुम जो हो उसमें ही रह जाओ; कुछ और होने की कोशिश मत करना, अन्यथा असत्य शुरू हो जाएगा। कमल कमल हो, गुलाब गुलाब हो; कमल गुलाब होने की कोशिश न करे, अन्यथा असत्य शुरू हो जाएगा। तुम तुम हो। तुम महावीर होने की कोशिश भी करोगे तो असत्य हो जाएगा। तुम बुद्ध होने की कोशिश करोगे तो असत्य हो जायेगा। कभी कोई दूसरा महावीर हो पाया? कितने लोगों ने तो कोशिश की है! कितने लोगों ने कोशिश नहीं की है! पच्चीस सौ वर्षों में हजारों लोग महावीर होने की चेष्टा में रत रहे हैं--कोई दूसरा महावीर हो पाया?
इतिहास के ज्वलंत तथ्यों को भी हम देखते नहीं, आंखें चुराते हैं। कोई दूसरा कभी बुद्ध हो पाया? कभी कोई दूसरा राम मिला इस जीवन के पथ पर? कभी फिर कृष्ण की बांसुरी दुबारा सुनी गई? पुनरुक्ति यहां होती नहीं। अनुकरण यहां संभव नहीं। यहां प्रत्येक बस स्वयं होने को पैदा हुआ है। और जिसने भी दूसरे होने की कोशिश की वह पाखंडी हो जाता है।
आदर्शों ने तुम्हें असत्य कर दिया। यह बात बड़ी कठिन मालूम होगी; क्योंकि तुम तो सोचते हो, आदर्शवादी जीवन बड़ा महान जीवन है। आदर्शवादी जीवन असत्य का जीवन है। आदर्शवादी का अर्थ है कि मैं कुछ हूं, कुछ होने में लगा हूं। सत्यवादी के जीवन का अर्थ है: जो है, मैंने उसे स्वीकार किया; अब मैं उसको सरलता से जी रहा हूं; जो है--बुरा भला, शुभ-अशुभ; जैसा हूं, जैसा इस अनंत ने मुझे चाहा है, जैसा इस अनंत ने मुझे सरजा है, जैसा इस अनंत ने मुझे गढ़ा है--मैं उससे राजी हूं।
सत्य है परम स्वीकार स्वयं का, और तब शेष गुण अपने-आप चले आते हैं, छाया की तरह चले आते हैं। शेष गुणों को खोजना भी नहीं पड़ता। आदर्शवादी खोजता है; सत्यवादी के पास अपने से चले आते हैं। आदर्शवादी खोजता रहता है और कभी नहीं पाता। सत्यवादी खोजता नहीं, और पा लेता है।
लेकिन सत्य, समझ में आ जाए तो पहला तो सत्य का अर्थ है: तुम जैसे हो, निंदा मत करना। तुम जैसे हो, दूसरे से तुलना मत करना। क्योंकि तुलना में ही स्पर्धा शुरू हो गई। तुम जैसे हो, वैसे को परिपूर्णता से स्वीकार कर लेना। रत्तीभर भी ना-नुच न करना, यहां-वहां न डोलना। तुम जो हो सकते हो, तुम हो। तुम्हें जैसा अस्तित्व ने चाहा है, वैसे तुम हो। इसमें कुछ सुधार की जरूरत नहीं है। दौड़-धूप बंद करनी है। और इस होने में थिर हो जाना है। नहीं तो तुम डोलते रहोगे--कभी राम होना चाहोगे, धनुष उठा लोगे; कभी कृष्ण होना चाहोगे, बांसुरी बजाने लगोगे, न बांसुरी बजेगी न धनुष उठेगा। कभी महावीर होना चाहोगे, नग्न खड़े हो जाओगे--प्रदर्शन हो जाएगा। नग्न खड़े हो जाओगे लेकिन महावीर का निर्दोष भाव कहां से लाओगे? तुम्हारी नग्नता तो आरोपित होगी। जो भी आरोपित है, वह निर्दोष नहीं होता। तुम्हारी नग्नता तो चेष्टित होगी, प्रयास से होगी। जो भी प्रयास से होता है, वह निर्दोष नहीं होता। जो भी चेष्टा से होता है, वह तो जबर्दस्ती होता है।
महावीर नग्न कभी हुए नहीं--उन्होंने पाया। नग्न होने का कोई अभ्यास नहीं किया, जैसा जैन मुनि करते हैं। नग्न होने के लिए कोई आयोजन, व्यवस्था नहीं जुटाई--अचानक पाया कि नग्न हो गए हैं।
कथा है: महावीर घर से निकले तो एक चादर लेकर निकले थे। सोचा जितना कम होगा परिग्रह, उतनी कम असुविधा होगी। सोचा था, जितना कम होगा पास में, उतनी चिंता कम होगी। एक चादर लेकर निकले थे। वही ओढ़नी थी, वही बिछौना था। वही दिन में वस्त्र का काम दे देगी। वर्षा होगी तो सिर पर ढांककर छाता बना लेंगे। राह पर चल रहे थे कि एक नंगे भिखारी ने, भिखमंगे ने कहा, कुछ दे जाएं। सब लुटा चुके थे। यह एक चादर बची थी, तो आधी फाड़कर उसे दे दी। सोचा एक से चलता है, आधे से भी चल जाएगा।
जिनको समझ आ जाए तो कम से कम में भी चल जाता है और जिनको समझ न हो तो ज्यादा से ज्यादा में भी नहीं चलता। सवाल वस्तुओं का नहीं है, सवाल समझ का है।
महावीर ने कहा, इतनी लंबी की जरूरत भी क्या है, थोड़े पैर सिकोड़कर सो जाएंगे। तन पूरा न ढंकेगा, थोड़ा कम ढंकेगा, हर्ज क्या है! हवा आती-जाती रहेगी, थोड़ी सूरज की किरणें शरीर को मिलेंगी।
लेकिन आगे बढ़े, भागे जा रहे हैं जंगल की तरफ, एक गुलाब की झाड़ी से आधी चादर उलझ गई कांटों में। हंसने लगे। तो कहा, मर्जी नहीं है अस्तित्व की, कि चादर को ले जाऊं। राह में कोई मिल गया, आधा बोझ उसने ले लिया। अब यह झाड़ी मिल गई; अब यह मांगती है, आधी मुझे दे दो। तो आधी चादर झाड़ी को दे दी। सोचा कि आधी से चल जाएगा, बिना भी चल जाएगा। आखिर सारे पशु-पक्षी बिना चादर के चला रहे हैं। तो मैं आदमी हूं; जो पशु-पक्षी कर लेते हैं वह मुझसे न हो सकेगा? और अब झाड़ी से छुड़ाना शोभा नहीं देता।
जिसने देना ही जाना हो, छुड़ाने का उसका मन नहीं करता। जिसने देने का ही रस पाया हो, वह झाड़ी से भी न छीनना चाहेगा। वह चादर झाड़ी को भेंट कर दी, वे नग्न हो गए। ऐसे महावीर नग्न हुए।
यह कोई चेष्टा न थी--यह घटना थी। इसके पीछे कोई आयोजन न था; न कोई शास्त्र थे, न कोई सिद्धांत था। नग्न होने के लिए कोई विचार न था। यह कोई अनुशासन नहीं था, जो उन्होंने थोपा अपने ऊपर। ऐसा जीवन के सहज प्रवाह में पाया कि जो लेकर आए थे वह भी जा चुका। फिर वे नग्न हो गए। फिर नग्न होने में जो मस्ती पायी तो फिर उन्होंने दुबारा चादर पाने का कोई आग्रह न रखा।
क्योंकि जो नग्न होकर मिला...क्या मिला नग्न होकर? अपने जीवन का सत्य।
हम नग्न होने से डरते क्यों हैं? शरीर को भी हम छिपा-छिपाकर दिखाते हैं। उतना ही दिखाते हैं जितना हमें लगता है, दिखाने योग्य है। उतना ही दिखाते हैं जितना लगता है कि दूसरों को भी रुचेगा, भाएगा। उसको छिपाते हैं जो हमें लगता है कहीं दूसरों को न रुचे, न भाए। कपड़े तुम अपने लिए थोड़े ही पहनते हो, दूसरों के लिए पहनते हो। इसलिए तो जिस दिन घर में बैठे हो, छुट्टी के दिन बैठे हो तो कैसे ही कपड़े पहने बैठे रहते हो। बाजार चले कि सजे, कि तैयार हुए। विवाह में जा रहे हैं, महोत्सव में जा रहे हैं, तो और सजे, और भी तैयार हुए।
दूसरे के लिए कपड़े पहनते हैं हम। शरीर के उन हिस्सों को छिपाते हैं जो हम चाहते हैं कोई दूसरा जान न ले। ये कपड़े हम कोई धूप, सर्दी, वर्षा से बचाने को थोड़े ही पहने हुए हैं; इनके पीछे बड़ा मन जुड़ा है, बड़ा आयोजन जुड़ा है।
जिस दिन किसी स्त्री को तुम चाहते हो लुभाना, उस दिन तुम ज्यादा देर रुक जाते हो दर्पण के सामने। उस दिन ज्यादा ढंग से दाढ़ी बनाते हो, कपड़े सजाते हो, इत्र छिड़क लेते हो। दूसरे के लिए है यह आयोजन।
हम दिखाते हैं केवल अपने हाथ, अपना चेहरा; शेष शरीर को हम ढांके हैं। ढांकने के दो अर्थ हैं। एक तो हम सोचते हैं, दिखाने योग्य नहीं। दूसरा: ढांकने से जो ढंका है उसमें आकर्षण बढ़ता है। दूसरे उसे उघाड़ना चाहते हैं। स्त्रियां अगर नग्न हों तो कोई गौर से देखे भी न। आदि समाजों में, आदिवासियों में स्त्रियां नग्न हैं, कोई चिंता नहीं करता।
स्त्री खूब ढांककर शरीर को चलती है। जो-जो ढंका है, उसे-उसे उघाड़ने का सहज मन होता है।
तो एक तो हम छिपाते भी हैं; हम आकर्षित भी करते हैं, लुभाते भी हैं। इसके पीछे आयोजन है। हमारे वस्त्रों के पीछे भी आयोजन है। किसी दिन हम थक जाते हैं इन वस्त्रों से, इस प्रदर्शन से, इस दिखावे से, इस नाटक से, तो फिर हम दूसरा आयोजन करते हैं--नग्न कैसे हो जाएं! लेकिन वह भी आयोजन है। सरलता से तुम कुछ भी न होने दोगे? सहजता से तुम कुछ भी न होने दोगे? तुम्हारे जीवन में क्या कोई भी निर्दोष ज्योति न जगेगी? सभी प्रयोजन से होगा? सोच-सोचकर होगा? हिसाब लगाकर होगा?
अब जैन मुनि हैं, नग्न खड़े हैं। मगर नग्न खड़ा होना उनका वैसे ही है, जैसे तुमने दांव लगाया हो जुए पर। वे कहते हैं, नग्न हुए बिना मोक्ष न मिलेगा। इसलिए दिगंबर जैन कहते हैं कि स्त्रियों का मोक्ष नहीं है; क्योंकि स्त्रियों को नग्न करना कठिन होगा, समाज डांवांडोल होगा, अड़चन खड़ी होगी। तो स्त्री को पहले पुरुषऱ्योनि में जन्म लेना पड़ेगा। क्योंकि बिना पुरुषऱ्योनि में जन्म लिये वह नग्न न हो सकेगी। नग्न न हो सकेगी, तो मोक्ष कैसे?
अब तुम थोड़ा सोचो! नग्न होने में भी दांव है, हिसाब है, गणित है। यह नग्न होना भी शुद्ध सरल नहीं है। महावीर नग्न हुए थे, मोक्ष का कोई सवाल न था--एक भिखारी ने चादर मांग ली थी। महावीर नग्न हुए थे, मोक्ष का कोई सवाल न था--एक फूलों की झाड़ी ने चादर छीन ली थी। महावीर नग्न हुए थे, इसके पीछे कभी सोचा भी न था।
लेकिन तुम जब नग्न होओगे, तो मोक्ष...। तुम्हारी नग्नता भी सौदा है।
कपड़ों में ढांका है हमने अपने शरीर को। और ऐसे ही हमने बहुत-बहुत पर्तें अपने मन में ढांकी हैं। हम वही कहते हैं, जो हम सोचते हैं रुचिकर लगेगा। हम वही कहते हैं, चुन-चुनकर, छांट-छांटकर, जो दूसरे को मोहित करेगा और हमारी एक सुंदर प्रतिमा निर्मित होगी। हम वही नहीं कहते जो हमारे भीतर उठता है। भीतर गालियां भी उठती हों तो भी हम बाहर स्वागत के गीत गाए चले जाते हैं। भीतर क्रोध भी उठता है तो भी ओंठों पर मुस्कुराहट को फैलाए चले जाते हैं। मुस्कुराहट झूठी होती है। जो भी थोड़ा आंखवाला है, वह देख लेगा, झूठी है; जबर्दस्ती ओंठों को ताना गया है, खींचा गया है--बही नहीं है। मुस्कुराहट भीतर से उठी नहीं है। मुस्कुराहट कहीं से आयी नहीं है, बस ऊपर से लीपी-पोती गयी है। लेकिन हमारी मुस्कुराहट झूठी है। हमारे आंसू झूठे हैं। हमारी सहानुभूति झूठी है, उदासी झूठी है। हमारा सारा जीवन एक झूठ का व्यापार है।
जब महावीर कहते हैं सत्य, तो उनका अर्थ यह नहीं है, जैसा गणित में होता है--दो और दो चार, यह सत्य हुआ गणित का--ऐसे सत्य की बात महावीर नहीं कर रहे हैं। जब महावीर कहते हैं सत्य, तो वे यह कह रहे हैं कि तुम जो हो, जैसे हो, निपट और नग्न, खोल दो अपने को वैसा ही। तुम चिंता न करो कि कौन क्या सोचेगा। तुम अपने में कोई भी आयोजन न करो। जैसे वृक्ष खड़े हैं नग्न और सहज, ऐसे ही तुम भी नग्न और सहज हो जाओ।
महावीर का सत्य बड़ा कठिन है। पर महावीर का सत्य बड़ा गहरा भी है। और महावीर का सत्य ही सत्य है, दार्शनिकों के सत्य में कुछ भी नहीं रखा है। वह तो बातचीत है, शब्दों का जाल है। वह भी शायद कुछ छिपाने की चेष्टा है।
तुम अपने को पकड़ो। तुम अपना पीछा करो और जगह-जगह देखो, चौबीस घंटे में कितना असत्य कर रहे हो! अनजाने ही! ऐसा भी नहीं कि तुम सभी असत्य जान-जानकर बोलते हो, सोच-सोचकर बोलते हो--आदत इतनी प्रगाढ़ हो गई है, ऐसे रग-रोएं में समा गई है, ऐसे खून-खून की बूंद में बैठ गई है, कि अब तो तुम किए चले जाते हो, कोई हिसाब भी नहीं रखना पड़ता। तुमसे असत्य ऐसे ही निकलता है जैसे वृक्षों से पत्ते निकलते हैं। अब कुछ करना भी नहीं पड़ता, कुशलता इतनी गहन हो गई है। कभी तो तुम चौंकोगे कि जहां जरूरत भी नहीं होती, वहां भी असत्य निकलता है। जहां उससे कुछ लाभ भी होने को नहीं है वहां भी असत्य निकलता है। वहां भी सत्य नहीं निकलता, वहां भी असत्य निकलता है।
कभी तुमने पकड़ा अपने को? ऐसे मौकों पर भी, जब कि कोई लाभ भी नहीं दिखाई पड़ता झूठ बोलने में, लेकिन झूठ बोलने की आदत हो गई है! इस आदत को तोड़ना पड़े! कितनी ही मजबूत हो, कितने ही हथौड़े मारने पड़ें, पर तोड़ना पड़े! और धीरे-धीरे तुम जो हो उसके लिए राजी होना पड़े! हो सकता है, प्रतिष्ठा खो जाए; क्योंकि हो सकता है, प्रतिष्ठा तुम्हारे असत्य पर ही खड़ी हो। हो सकता है, तुम्हारा सम्मान खो जाए; क्योंकि अकसर इस बात की संभावना है कि तुम्हारा सम्मान तुम्हारे उन्हीं झूठों पर खड़ा हो, जो तुमने समाज के सामने बोले हैं। तुम्हारा दिखावा, तुम्हारे प्रदर्शन, तुम्हारे नाटक ही बुनियाद में हों, तो सम्मान भी गिर जाएगा। गिर जाने दो! इसे ही मैं संन्यास कहता हूं, जिसको महावीर सत्य कह रहे हैं।
तुम जैसे हो, तुम बेशर्त उसे स्वीकार कर लो। कठिन होगा। आग से गुजरना होगा। मगर आग निखारेगी। कचरा जल जाएगा, कुंदन बाहर आएगा। साफ शुद्ध सोना होकर तुम निकलोगे। जो सोना आग से निकलने से डर गया वह कभी शुद्ध नहीं हो पाता। जो मनुष्य सत्य की आग से निकलने से डरता है, वह कभी मनुष्य नहीं हो पाता।
"सत्य में तप, संयम, शेष समस्त गुणों का वास है।'
तो पहला सत्य तो जो मैं हूं, वैसा ही अपने को स्वीकार कर लूं। जो मैं हूं, उससे अन्यथा होने की चेष्टा भी न करूं; क्योंकि उस सब चेष्टा में ही झूठ प्रवेश करता है।
तुम क्रोधी हो, तो तुम क्या करते हो? तुम अक्रोध की साधना करते हो। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं, "मन बड़ा अशांत है, शांति की कोई तरकीब बता दें।' क्या करोगे शांति की तरकीब का? ऊपर-ऊपर लीपा-पोती कर लोगे, भीतर अशांति उबलती रहेगी ज्वालामुखी की तरह। ऊपर-ऊपर तुम शांति के भवन बना लोगे, ज्वालामुखियों पर बैठे होंगे भवन। भूकंप आते ही रहेंगे। शांत तुम हो न पाओगे।
शांत होने की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी अशांति को समझने की जरूरत है। पहले तो अशांति को स्वीकार करने की जरूरत है कि मैं अशांत हूं। फिर अशांति को पहचानने की जरूरत है कि यह अशांति क्या है--बिना किसी निंदा के। पहले से ही अगर तुमने तय कर लिया कि अशांति बुरी है तो तुम जान कैसे पाओगे, देख कैसे पाओगे? जो आंखें पहले ही पक्षपात से भर गईं और जिन्होंने तय कर लिया कि अशांति बुरी है और अशांति से छूटना है, वे आंखें अशांति का अवलोकन न कर पाएंगी। अवलोकन शुद्ध न होगा, अवलोकन प्रामाणिक न होगा। तुम पहले से ही तैयार हो। तुम जूझने को तैयार हो, लड़ने को तैयार हो। दुश्मन को कभी कोई भर आंख देख पाता है! दुश्मन से तो हम आंखें बचा लेते हैं। मित्र को देख पाते हैं। प्रेमी को देख पाते हैं। जिससे हमारा प्रेम हो, उसकी आंखों में आंखें डाल पाते हैं।
तो अपने को प्रेम करो, अगर सत्य होना है। और जैसे भी हो बुरे-भले, यही हो, इसके अतिरिक्त कुछ और हो नहीं सकता था। जो तुम हुए हो, इसको पहचानो, परखो, जांचो, खोलो एक-एक गांठ। अशांति है तो अशांति सही, क्या करोगे? अशांति तुम्हारा तथ्य है। जैसे आग जलाती है, वह उसका गुणधर्म है। अशांति तुम्हारे आज का तथ्य है। आज तुम जैसे हो उसमें अशांति के फूल लगते हैं, अशांति के कांटे लगते हैं। लेकिन देखो, पहचानो, समझो, स्वीकार करो। भागो मत। डरो मत। विपरीत की चेष्टा मत करो। अशांति है तो शांति को लाने के प्रयास में संलग्न मत हो जाओ। वह प्रयास अशांति से बचने का प्रयास है। बचकर कोई कभी बच नहीं पाया। अगर कामवासना है तो उतरो। उस गहरे कुएं में उतरो जिसका नाम कामवासना है। उसकी सीढ़ी दर सीढ़ी नीचे जाओ। उसकी आखिरी तलहटी को खोजो। वहीं से उठेगा ब्रह्मचर्य। जागरण से उठेगा ब्रह्मचर्य। कामवासना की पहचान में से ही ब्रह्मचर्य पैदा होता है। कामवासना में ही छिपा है ब्रह्मचर्य; जैसे कामवासना बीज का खोल है और उसके भीतर छिपा है कोमल तंतु, कोमल पौधा ब्रह्मचर्य का। तुम समझो, बीज को कैसे जमीन में बोएं, फिर कैसे सम्हालें--उसी से निकलेगा। कीचड़ से जैसे कमल निकलता है, ऐसे ही कामवासना से ब्रह्मचर्य निकलता है।
अशांति का ही सार है शांति। उसी के भीतर से निचोड़ना है। जैसे फूलों से इत्र निचोड़ते हैं, ऐसे ही क्रोध से निचुड़कर करुणा आती है।
तो जो तुम्हारे पास है उसके विपरीत होने में मत लग जाओ। जो तुम्हारे पास है उसको ही कैसे रूपांतरित करें, कैसे उसमें से ही सार को खोजें, असार को त्यागें, कैसे उसको निचोड़ें, इत्र बनाएं--तो तुम सत्य हो सकोगे।
महंगा है यह सौदा। इसलिए महावीर कहते हैं, तप है यह सत्य। इसमें तपना पड़ेगा। यह तपना सस्ता तपना नहीं है कि धूप में खड़े हो गए और तप लिए। वह तो बच्चे भी कर लेते हैं। वह तो बुद्धू भी कर लेते हैं। उसके लिए तो कोई बुद्धिमत्ता की जरूरत नहीं है। जड़ भी कर लेते हैं। वस्तुतः जो जड़बुद्धि हैं, वे ज्यादा आसानी से कर लेते हैं। क्योंकि जितनी जड़बुद्धि होती है उतनी जिद्दी होती है। और जितनी जड़बुद्धि होती है, उतनी संवेदनहीन होती है। धूप में भी खड़े हो जाते हैं, थोड़े दिन में उसका भी अभ्यास हो जाता है। उपवास भी कर लेते हैं, उसका भी अभ्यास हो जाता है। कुछ लोग हैं जो खड़े हैं वर्षों से, बैठे नहीं, लेटे नहीं--उसका भी अभ्यास हो गया। लेकिन तुमने कभी इन लोगों की आंखों में गौर से देखा! वहां तुम्हें प्रतिभा की दमक न मिलेगी। वहां तुम्हें आनंद और शांति के स्वर सुनाई न पड़ेंगे। इनकी छाती के पास, हृदय के पास कान लगाकर सुनना; वहां कोई अनाहत का नाद न मिलेगा। वहां तुम पाओगे: जड़ता, राख, मरे हुए लोग।
अकसर हठी जड़ होता है। और जिसको तुम तप कहते हो, वह हठ से ज्यादा नहीं है, जिद्द है, क्रोध है, अहंकार है--लेकिन सत्य नहीं।
सत्य का तप क्या है? सत्य का तप है: अपने को जैसा है वैसा स्वीकार किया, वैसा ही प्रगट किया; अपने और अपनी अभिव्यक्ति में कोई भेद न किया। फिर जो हो, समाज अच्छा कहे बुरा कहे, लोग चाहें न चाहें, सम्मान दें अपमान दें, फिर जो हो--यह है असली तप। लोग निंदा करें, वह भी स्वीकार है। लोग प्रशंसा करें, वह भी स्वीकार है। लोग भूल जाएं, उपेक्षा करें, वह भी स्वीकार है। यह है तप। सत्य होने को महावीर कहते हैं तप।
"सच्चामि वसदि तवो'--सत्य में बसता है तप। संयम भी वहीं है।
इन दो शब्दों को समझ लेना चाहिए, क्योंकि महावीर ने इन दो शब्दों का साथ-साथ उपयोग किया।
तप का अर्थ है: तुम्हारे भीतर ऐसी बहुत-सी सचाइयां हैं जिनके कारण तुम्हें अड़चन होगी। उस अड़चन को झेलने के लिए तैयार होना तप है। तुम्हारे भीतर ऐसी बहुत-सी सचाइयां हैं; जिनके कारण बहुत-से काम तुम जो अभी कर रहे हो, कल न कर पाओगे। वह जो न करने की अवस्था है, वही संयम है।
समझो! अब तक तुम दान दे रहे थे। लेकिन सच्चा आदमी सोचेगा: "दान का भाव उठा है या नहीं?' दान के लिए ही तो सभी दान नहीं देते, और दूसरे कारणों से देते हैं। राह पर भिखमंगा पकड़ लेता है, इज्जत दांव पर लगा देता है। भिखमंगा भी अकेले में तुमसे भीख नहीं मांगता, क्योंकि अकेले में जानता है कि तुम धुतकारोगे। बीच बाजार में पकड़ लेता है। वहां इज्जत सवाल है: "लोग क्या कहेंगे, दो पैसे भी न देते बने! लोग हंसेंगे!' वहां तुम दो पैसा देकर दानी बन जाना चाहते हो। क्योंकि उस दो पैसे में इज्जत मिल रही है, वह इज्जत तुम दुकान पर काम में ले आओगे। दो पैसे से तुम दो रुपये निकालोगे। जिसने आज तुम्हें दानी की तरह देख लिया है, कल वही ग्राहक की तरह दुकान पर होगा, तो तुम जो भी दाम बताओगे, मान लेगा--आदमी दानी है! बाजार में अगर भिखमंगे ने पकड़ लिया तो तुम्हें देना ही पड़ता है।
एक मारवाड़ी को एक भिखमंगे ने पकड़ लिया बाजार में। तख्ती लगाए था भिखमंगा कि मैं अंधा हूं। और उसने कहा, "सेठ कुछ मिल जाए! बड़े दिन से सिनेमा नहीं गया हूं।' मारवाड़ी तो तैयार ही था कि कैसे छूटे! उसने देखा, "सिनेमा--और तख्ती लगाए हो कि मैं अंधा हूं! सिनेमा जाकर करोगे क्या? धोखा देने की कोशिश कर रहे हो?' उस अंधे ने कहा, "दाता! गाने ही सुन लूंगा! अब देने से न बचो।'
भीड़ लग गई थी। सेठ ने देखा, बचने का उपाय नहीं है, तो पांच पैसे का सिक्का निकालकर उसको देने लगा। अंधे ने कहा कि सेठ, बैंक में जमा करवा देना। मेरा मार्केट तो मत बिगाड़ बाबा! पांच पैसे?
भिखमंगा भी बाजार में है; उसका भी मार्केट है। सेठ भी बाजार में है; उसका भी मार्केट है। न दे तो उसका मार्केट बिगड़ता है। ये लोग देख रहे हैं चारों तरफ, वे कहेंगे, अरे कृपण! अरे कंजूस!
उस सेठ ने कहा कि "तू पहचाना कैसे कि पांच पैसे का सिक्का है, अगर तू अंधा है? अभी मैंने दिया भी नहीं, हाथ में ही लिया है।' उस अंधे ने कहा, "मालिक! अब और क्या प्रमाण चाहिए! मारवाड़ी से भीख मांग रहा हूं, इससे बड़ा प्रमाण अंधे होने का और क्या होगा?'
भिखमंगा भी सोच-समझकर पकड़ता है। भिखमंगा भी जानता है, दान तो कोई देना नहीं चाहता। लेकिन लोग इतने ईमानदार भी नहीं हैं कि कह दें कि हम दान नहीं देना चाहते। लोग दिखाना चाहते हैं कि हम हैं तो दानी। उसी का भिखमंगा शोषण कर रहा है। तुम भी लज्जा से भर जाते हो कि अब कैसे निकलें! चलो, छुटकारा पाने के लिए देते हो। लेकिन अगर तुम ईमानदार हुए तो तुम कहोगे कि बाबा, मेरे मन में देने की कोई इच्छा नहीं है। चाहे बाजार में सारी इज्जत प्रतिष्ठा पर लग जाए, चाहे कल दुकान बंद क्यों न हो जाए, चाहे लोग तुम्हें कृपण समझें, बेईमान समझें, धोखेबाज समझें, धन का आग्रही समझें--लेकिन तुम कहोगे कि क्या करूं, मेरे मन में देने का कोई स्वर नहीं है।
तप पैदा होगा। संयम भी पैदा होगा। क्योंकि बहुत-से काम तुम कर रहे हो इसलिए, क्योंकि करने चाहिए। अगर सब खरीद रहे हैं कोई सामान, नया फर्नीचर, नई कार, तो तुम भी खरीद रहे हो--बिना इसकी फिक्र किए कि तुम्हें जरूरत है। तुमने कभी सोचा कि तुम जो चीजें खरीद लाते हो, उनकी जरूरत थी? लेकिन अगर पड़ोसी खरीद लाए थे तो तुम भी खरीद लाते हो।
तुमने कभी सोचा है कि तुम जो कर रहे हो, जो दिखावा कर रहे हो, उसकी कोई जरूरत है? लेकिन और दिखावा कर रहे हैं तो तुम कैसे रह सकते हो! अगर व्यक्ति सचाई से अपने भीतर देखने लगे, तो पाएगा: अचानक बहुत-से काम तो बंद हो गए, क्योंकि निष्प्रयोजन थे; दूसरे कर रहे थे, दूसरों के दिखावे के लिए तुम भी कर रहे थे।
लड़की की शादी करनी है, लोग हजारों रुपये लुटाते हैं--उनके पास नहीं हैं, कर्ज लेकर लुटाते हैं। क्यों? और दूसरों ने, दुश्मनों ने, पड़ोसियों ने--पड?ोसी यानी दुश्मन--उन्होंने अपनी लड़की की शादी में इतना लगाया...। अब तुम्हारी इज्जत दांव पर लगी है। तुम्हारे अहंकार का सवाल है। तुम्हें भी लगाना होगा। तुम्हें लड़की से कोई मतलब नहीं है। न तुमने जो दिया है, वह प्रेम से दिया है। न तुमने लड़की को दिया है। तुमने अहंकार को दिया है। तुम अपने झंडे को ऊंचा करके दिखाना चाहते थे कि देख लो! तुम अगर गौर से अपनी सचाई को पहचानने लगो तो तुम पाओगे: तप भी आता, संयम भी आता।
सौ में निन्यान्नबे आकांक्षाएं तुम्हारी बिलकुल व्यर्थ हैं। वे तुमने न मालूम कैसे उधार ले ली हैं। संक्रामक रोग की तरह तुम्हें लग गई हैं। दुख आएगा तो तुम स्वीकार करोगे। और बहुत-से सुख जो सुख नहीं हैं, तुम दूसरों के कारण ही भोगे चले जाते हो।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दिन जा रहा था। पूछा, "कहां जा रहे हो?' उसने कहा, "शास्त्रीय संगीत सुनने जा रहा हूं।' मैंने कहा, "लेकिन तुम जानते नहीं।' उसने कहा, "अब क्या करें! सभी जा रहे हैं, न जाओ तो ऐसा लगता है कि शास्त्रीय संगीत नहीं आता। हालांकि कुछ समझ में नहीं आता मेरे। अभी से डरा हुआ हूं कि वहां करूंगा क्या। मुझे तो उलटी घबड़ाहट होती है। जब आऽऽऽऽ करने लगते हैं, मुझे ऐसा लगता है कि अब पता नहीं कब यहां से निकलना हो पाएगा।' उसने बताया मुझे कि पहले भी एक दफा ऐसा हो चुका है: मैं गया था शास्त्रीय संगीत सुनने और जब संगीतज्ञ बहुत आऽऽऽऽ करने लगा तो मैं रोने लगा। तो मेरे पड़ोस के लोगों ने पूछा कि अरे मुल्ला! हमने तो कभी सोचा भी न था कि तुम इतने संगीत के पारखी हो!
उसने कहा, "पारखी-वारखी कुछ नहीं; यही हालत मेरे बकरे की हुई थी। उसी रात मर गया था। यह आदमी बचेगा नहीं। यह बिलकुल मरने के करीब है। इसलिए मुझे याद आ रही है बकरे की, कि बेचारा बकरा, इसी तरह शास्त्रीय संगीत करते-करते..!'
मगर जाना पड़ रहा है, क्योंकि सारा मोहल्ला-पड़ोस जा रहा है। इज्जत का सवाल है।
तुमने कभी गौर किया अपने को! तुम बहुत-सी चीजों में सम्मिलित हुए हो, जहां तुम कभी जाना न चाहते थे, लेकिन क्या करते! तुम भीड़ के हिस्से हो! तुमने कभी-कभी अपनी जरूरतों को भी कुर्बान किया है--उन बातों के लिए जो तुम्हारी जरूरतें न थीं। तुमने गहने खरीद लिए हैं, पेट को भूखा रखा है। तुमने बड़ा मकान बना लिया है, बच्चों के लिए औषधि नहीं जुटा पाए। तुमने कार खरीद ली, बच्चों को शिक्षा नहीं दे पाए।
तुमने कभी गौर किया है कि तुम वे चीजें कर गुजरे, जो न करते तो चल जाता; और उन चीजों को न कर पाए जो कि करनी बिलकुल जरूरी थीं।
संयम पैदा होता है, जो व्यक्ति सच्चा होने लगता है। उसे दिखाई पड़ता है, जो मेरे लिए जरूरी है वह करूंगा; जो नहीं जरूरी है वह नहीं करूंगा। और ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे भीड़ के बाहर हो जाता है। इस अकेले हो जाने का नाम ही संन्यास है। भीड़ में ही होता है, लेकिन अकेला हो जाता है। अपने ढंग से जीता है। और अपने ढंग को किसी हालत में भी समझौता नहीं करता। कुछ भी हो जाए, सत्य की आकांक्षा करनेवाला समझौतावादी नहीं होता। वह आगे-पीछे नहीं देखता, वह यह हिसाब नहीं लगाता कि इसके क्या परिणाम होंगे। वह कहता है, जो भी परिणाम होंगे उसका तप झेल लूंगा; जो भी खोना पड़ेगा, उसका संयम हो जाएगा। लेकिन जो मैं हूं, उससे अन्यथा मैं नहीं होना चाहता।
एक बड़ी क्रांति घटती है, जब तुम अपने से राजी होते हो। जब तुम अपने से राजी होते हो तो तुम अपने भीतर उतरने लगते हो। जब तुम अपने से राजी होते हो और यहां-वहां नहीं दौड़ते और दूसरों का अनुगमन नहीं करते तो तुम अपने में डूबने लगते हो, एक डुबकी लगती है। उस डुबकी के माध्यम से तुम अपनी सतह से ही परिचित नहीं होते, अपने भीतर की गहराइयों से परिचित होने लगते हो।
और एक दिन ऐसी भी घड़ी आती है कि तुम अपने केंद्र पर आरोपित हो जाते हो। वही है धर्म, आत्मज्ञान कहो।
"सत्य में तप, संयम और शेष समस्त गुणों का वास होता है। जैसे समुद्र मछलियों का आश्रय है, वैसे ही सत्य समस्त गुणों का आश्रय है।'
सत्य जैसे सागर है, सभी नदियां उसी में गिर जाती हैं, ऐसे ही सत्य जीवन का परम आचरण है; धर्म का पर्यायवाची है; और सभी गुण उसी में गिर जाते हैं।
लेकिन लोग उलटा कर रहे हैं। लोग कहते हैं, तप साध रहे हैं, संयम साध रहे हैं--क्योंकि सत्य पाना है। महावीर कहते हैं, सत्य साधो, तो संयम और तप अपने से आ जाते हैं। अब इतनी सीधी-सी बात भी कैसे चूक जाती है! ऐसा लगता है, लोग चूकना ही चाहते हैं। अब इतना साफ-सा वचन है। "सच्चाम्मि वसदि तवो'...लेकिन किसी जैन मुनि से पूछो, तो वह कहेगा, "तप करोगे तो ही सत्य मिलेगा। तपश्चर्या के बिना कहीं सत्य मिला है!' महावीर ठीक उलटी बात कह रहे हैं कि सत्य के बिना कहीं तपश्चर्या हुई है! दोनों दुश्मन मालूम पड़ते हैं। यह जैन मुनि महावीर के पीछे चलता हुआ मालूम नहीं पड़ता। यह तो उलटा ही काम कर रहा है। यह तो कारण को पकड़कर कार्य को लाना चाहता है, जो कि संभव नहीं है। कार्य से कारण आता है। तुम चलते हो, तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे चलती है। महावीर कहते हैं, तुम चलोगे, तुम्हारी छाया तुम्हारे पीछे चलेगी। जैन मुनि कहता है, छाया का पीछा करो, कहीं ऐसा न हो कि छाया यहां-वहां चली जाए!
अब तुम अड़चन में पड़ जाओगे, अगर तुमने छाया का पीछा किया तो तुम तो उलटी यात्रा पर लग गए। यह तो छाया तुम्हारी आत्मा हो गई, तुम छाया हो गए।
महावीर कहते हैं, सत्य में तप, संयम और शेष समस्त गुणों का वास हो जाता है। वे नाम भी नहीं गिनाते। गिनाने की कोई जरूरत नहीं है। कह दिया सागर, तो सभी नदियां आ गईं। आ ही जाती हैं देर-अबेर। नदी-नदी का कहां-कहां पीछा करोगे? सागर को ही पकड़ लो। जब सागर ही मिलता हो तो नदियों के पीछे क्यों भटकते हो?
लेकिन अगर जैन मुनि ऐसी बात कहे, तो उसका खुद का क्या हो! क्योंकि वह भी नदियों के पीछे भटक रहा है।
इसे समझो।
जैनों का शब्द है: "उपवास'। बड़ा प्यारा शब्द है! उपवास शब्द का अर्थ होता है: अपने अंतर्तम में वास। उप+वास: अपने पास होना; अपने निकट होना। इसका खाने न खाने से कुछ भी संबंध नहीं। तुम जिसे उपवास कहते हो, वह अनशन है, उपवास नहीं। फर्क क्या है? महावीर कहते हैं, जब तुम अपने पास हो जाओगे तो उन घड़ियों में भोजन भूल जाता है, क्योंकि शरीर भूल जाता है। जब कोई अपने पास होता है, आत्मा के पास होता है। जब आत्मा का सत्संग चलता है, जब उस रस में कोई डूबता है--कहां याद रहती है भूख-प्यास की!
तुमने कभी खयाल नहीं किया! कोई मित्र घर आ जाए वर्षों का बिछड़ा हुआ, भूख याद पड़ती है? प्यास पता चलती है? घंटों बीत जाते हैं, बैठे हैं, चर्चा कर रहे हैं, न भूख है न प्यास है।
तुम्हारा प्रेमी मिल जाए, तुम्हारी प्रेयसी मिल जाए--भूख, प्यास भूल जाती है। घड़ियां ऐसे बीतने लगती हैं जैसे पल भागे। दिन-रातें ऐसे गुजर जाती हैं जैसे आईं और गईं, पता ही न चला।
तो जरा सोचो, जिस दिन भीतर का प्यारा, भीतर का प्रियतम मिल जाए, जब उसके पास सरकने लगोगे तो कहां याद आएगी भूख की, कहां याद आएगी प्यास की!
महावीर कहते हैं, उपवास के कारण अनशन हो जाता है। जैन मुनि कहता है, अनशन करो तो आत्मा के पास जाओगे।
अब बड़ा मुश्किल है मामला। अनशन करनेवाला और भी शरीर के पास हो जाता है। भूखे मरोगे तो शरीर की ही याद आएगी। नहीं तो करके देख लो। उपवास करके देख लो। जिसको जैन मुनि उपवास कहते हैं, मैं तो अनशन कहता हूं। अनशन करके देख लो। जिस दिन खाना न खाओगे, उस दिन खाने ही खाने की याद आएगी। उस दिन रास्ते पर गुजरोगे तो न तो कपड़े की दुकानें दिखाई पड़ेंगी, न जूतों की दुकानें; बस रेस्तरां, होटल, उन्हीं-उन्हीं के बोर्ड एकदम पढ़ोगे और दिल में बड़ी तरंगें उठेंगी। रसगुल्ले उठेंगे! रसमलाई फैलेगी! संदेशों के संदेश आएंगे।
भूखा आदमी भोजन का ही सोच सकता है।
इसलिए जैन जब उपवास करते हैं पर्यूषण के दिनों में, तो मंदिर में गुजारते हैं ज्यादा समय, क्योंकि घर तो बहुत ज्यादा याद आती है। मंदिर में किसी तरह भुलाए रखते हैं; शोरगुल मचाए रखते हैं! और फिर वहां और भी उन्हीं जैसे भूखे बैठे हैं, उनको देखकर भी ऐसा लगता है: "कोई अकेले ही थोड़े ही हैं! अपन ही थोड़े ही परेशान हो रहे हैं, और भी सब हो रहे हैं!'
और एक-दूसरे की हिम्मत बंधाए रखते हैं। बैंड-बाजा बजाए रखते हैं। घर आए तो भोजन की याद आती है। वहां भी भोजन की ही याद आती है। तुम जिस चीज के साथ जबर्दस्ती करोगे, उसका कांटा चुभेगा।
महावीर कहते हैं, उपवास हो जाए--अनशन अपने से हो जाता है।
जैन मुनि कहते हैं, अनशन करो तो उपवास होगा। यही पूरी की पूरी उलट-बांसी चल रही है, उलटी धारा बह रही है।
Friday, 28 March 2025
सत्य असत्याशी मन केले ग्वाही । मानियले नाही बहुमता
Friday, 21 March 2025
च्वांग्त्जु का सपना
वे सब उसके पास गए और पूछा, "गुरुदेव, मामला क्या है?" उसने कहा, "मामला बड़ा जटिल है, मैं इसे सुलझा नहीं पा रहा; हो सकता है तुम लोग मेरी कुछ मदद कर सको। मैं तुम्हे बताता हूं कि मामला क्या है। रात मैंने सपने में देखा कि मैं एक तितली बन गया हूं, एक फूल से दुसरे फूल पर मंडरा रहा हूं।"
शिष्य बोले, "इसमें उदास होने जैसी तो कोई बात नहीं है। सपने में तो हम सभी अजीब हरकतें करते हैं; और यह तो फिर भी कुछ बुरा नहीं है, तितलि बन जाना--रंग-बिरंगी, खूबसूरत, एक रसदार फूल से दुसरे रसदार फूल पर मंडराती हुई। आप क्यों इतने चिंतित हैं?"
उसने कहा, "पूरी बात तो तुमने सुनी नहीं। समस्या यह है, कि अब मैं जाग गया हूं और यह सोच रहा हूं कि क्या च्वांग्त्जु ने सपना देखा कि वह तितली है या फिर अब तितली सोने चली गई है और सपना देख रही है कि वह च्वांग्त्जु है।"
दोनों बाते हो सकती हैं। यदि च्वांग्त्जु सपना देख सकता है कि वह एक तितली है, तब तितली क्यों सपना नहीं देख सकती कि वह च्वांग्त्जु है? शिष्य चुप रह गए; इसका कोई जवाब नहीं था। च्वांग्त्जु उस खास बात की तरफ इशारा कर रहा था जो कि सभी धर्म आज तक सिखाते आएं हैं-- कि सब कुछ सपना है। तितली एक सपना है, च्वांग्त्ज़ु एक सपना है। तब यथार्थ क्या है? यथार्थ बहुत दूर है। और इस सपने में विचलित ना हों। चाहें तुम ऊंट हो या गधे या बन्दर--इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। जो बात अर्थ रखती है वो ये है कि तुम इसे बिना किसी नाराज़गी के स्वीकार करो ताकि तुम एक दिन परमात्मा के वास्तविक संसार में पहुंच सको।
Thursday, 13 March 2025
नेपोलियनो, हिटलरों के अहंकार भर जाते
नेपोलियन की कहानियाँ
नेपोलियन और घसियारिन
मरते वक्त नेपोलियन हार चुका था युद्ध में और एक छोटे से द्वीप सेंट हैलेना में उसको बंद कर दिया गया था। अब नेपोलियन उन थोड़े से लोगों में से था, जिन्होंने सारी जमीन को हिला दिया। जिन्होंने पहाड़ों से कहा–हट जाओ! तो पहाड़ों को हट जाना पड़ा। जिन्होंने कौमों से कहा–मिट जाओ! तो कौमों को मिट जाना पड़ा। उन थोड़े से लोगों में एक था। आखिरी वक्त हार गया और हैलेना में बंद कर दिया गया। पहले ही दिन सुबह उठ कर वह घूमने निकला, एक छोटी सी पगडंडी पर। उसका मित्र, उसका डाक्टर उसके साथ था। छोटी थी, संकरी थी पगडंडी। उस तरफ से एक घास लेने वाली औरत घास का गट्ठा सिर पर लिए हुए आती थी। नेपोलियन के डाक्टर मित्र ने चिल्ला कर कहाः घसियारिन, रास्ता छोड़ दे! देखती नहीं कौन रास्ते पर आ रहा है?
लेकिन नेपोलियन ने कहाः मेरे मित्र, तुम भूल करते हो। रास्ता हमें छोड़ देना चाहिए। अब नेपोलियन कहां है! अब मैं कौन हूं! एक कैदी से ज्यादा नहीं।
और नेपोलियन छोड़ कर रास्ता खड़ा हो गया और उसने कहाः घासवाली को निकल जाने दो, वह कुछ है, मैं तो अब कुछ भी नहीं हूं। मैं नेपोलियन था कल तक और मैंने पहाड़ों से कहा होता–रास्ते से हट जाओ, तो पहाड़ हट गए होते। लेकिन आज, आज मैं क्या हूं! एक घासवाली फिर भी कुछ है, मैं तो कुछ भी नहीं, ना-कुछ, नोबडी। मुझे हट जाने दो।
वह नेपोलियन हट गया। यह नेपोलियन कल तक सब कुछ था, आज ना-कुछ कैसे हो गया? क्या छिन गया इसके पास से? इसके वस्त्र छिन गए, इसके कपड़े छिन गए, इसकी कुर्सी छिन गई, अब यह ना-कुछ है।
नेपोलियन ने कैद मे रहते कपडे नही बदले
नेपोलियन जब हार गया तो उसे सेंट हेलेना के द्वीप में बंद कर दिया गया। हारे नेपोलियन की बड़ी दुर्दशा होती है। जीत थी तो वह संसार का मालिक था, हार गया तो दो कौड़ी का हो गया। लेकिन फिर भी, जैसे रस्सी जल जाती है और अकड़ रह जाती है; रस्सी तो जल गई, लेकिन मरते दम तक नेपोलियन ने कपड़े न बदले। सड़ गए, गंदे हो गए; फट गए। बहुत बार कहा गया कि नये कपड़े आपके लिए उपलब्ध हैं, आप पहन लें। उसने कहा कि नहीं। मरते वक्त उसने अपनी डायरी में लिखा है कि ये कपड़ों की बात ही और, ये सम्राट के कपड़े हैं। और तुम कितने ही ताजे और नये कपड़े ले आओ, वे एक कैदी के कपड़े होंगे।
राख हो गई सब, लेकिन अकड़ बाकी है। अभी भी वह चलता है तो उसी अकड़ से। फटे हैं कपड़े, पुराने हैं कपड़े, जराजीर्ण हो गए, लेकिन वह अब भी अपने को सोच रहा है कि सम्राट है। मरते समय उसने लिखा है कि मान लिया कि मैं अब सम्राट नहीं हूं, लेकिन इसे तो कोई भी इनकार न करेगा कि मैं एक हारा हुआ सम्राट हूं। हारा हुआ हूं माना, मगर हूं तो सम्राट ही। मगर हारे हुए सम्राट का क्या मतलब होता है?
आदमी जितना भीतर अभाव अनुभव करता है हीनता का, हीनता का कीड़ा जितना भीतर काटता है, उतने ही बाहर उपाय करता है कि कैसे उसे ढांक ले। बाहर रोशनियां जलाता है ताकि भीतर का अंधेरा न दिखाई पड़े। भीतर तो हर कोई जानता है कि मैं ना-कुछ हूं, इसलिए दूसरों पर अकड़ जताता है। और ध्यान रखना, जितना ही कोई अकड़ जताए दूसरों पर उतना ही छोटा आदमी भीतर छिपा है। बड़े आदमी की तो अकड़ होती ही नहीं। बड़ा आदमी तो ऐसा होता है जैसे हो ही न। महानता शून्यता है। और जब तुम कहीं भी उस शून्यता को देखते हो तब अचानक तुम्हारा सिर झुक जाता है। तब तुम किसी को सिर पर रख लेना चाहते हो।
आत्मा अमर हैं, ये हम कहते है, मगर हमे इस पर भरोसा नही
‘शंकारहित और युक्त मनवाला पुरुष यम-नियमादि मुक्तिकारी योग को आग्रह के साथ नहीं ग्रहण करता है, लेकिन वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ सुखपूर्वक रहता है।’
इस सूत्र को खूब ध्यान करना।
न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशंको युक्तमानसः।
पश्यन्श्रृण्वन्स्पृशन्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम्।।
जिसको अपने सिंह होने में शंका न रही, जिसको अपने आत्मा होने में शंका न रही, जिसने जरा-सा इस भीतर के अंतर्जगत का स्वाद लिया, जो थोड़ा-सा भी जागा--विवेक में, ध्यान में, समाधि में। शंकारहित--जो निःशंक हुआ।
निःशंको युक्तमानसः।
और जिसका मन युक्त हुआ।
ये दो बातें समझना। एक तो हमें अपने होने पर ही शंका है। भला हम कितना ही कहते हों कि मैं आत्मा हूं, कि मेरी कोई मृत्यु नहीं, मगर हमें इस पर भरोसा नहीं। हम कहते जरूर हैं; कहते भी हैं, मान भी लेना चाहते हैं। भरोसा करना चाहते हैं, भरोसा है नहीं। भरोसा करना चाहते हैं क्योंकि मौत से डर लगता है। मृत्यु से घबड़ाहट होती है। तो हम मान लेते हैं, आत्मा अमर है। जहां हम पढ़ते हैं किसी शास्त्र में, आत्मा अमर है--हिम्मत आती है कि ठीक; होनी चाहिए आत्मा अमर। मगर निःशंक नहीं है यह बात।
मैं एक पड़ोस में बहुत दिनों तक रहा। एक घर में कोई मर गया तो मैं गया। वहां मैंने देखा कि एक दूसरे पड़ोसी समझा रहे हैं लोगों को कि क्या रोते हो, क्या घबड़ाते हो? किसी की पत्नी मर गई है, वे समझा रहे हैं कि आत्मा तो अमर है। मैं बड़ा प्रभावित हुआ कि यह आदमी जानकार होना चाहिए। संयोग की बात, तीन-चार महीने बाद उनकी पत्नी चल बसी। पत्नियों का क्या भरोसा, कब चल बसें! तो मैं बड़ी उत्सुकता से उनके घर गया कि अब तो यह आदमी प्रसन्नता से बैठा होगा, या खंजड़ी बजा रहा होगा। पत्नी को विदा दे रहा होगा। लेकिन वे रो रहे थे सज्जन। मैंने कहा, भई बात क्या है? दूसरे की पत्नी मर गई तब तुम समझा रहे थे, आत्मा अमर है। वे कहने लगे अपने आंसू पोंछकर, अरे ये समझाने की बातें हैं। जब अपनी मर जाये तब पता चलता है।
मैं बैठा रहा। थोड़ी देर बाद देखा कि जिन सज्जन की पत्नी मर गई थी पहले, वे आ गये और इनको समझाने लगे कि क्या रोते हो? आत्मा तो अमर है।
ऐसा चलता लेन-देन। पारस्परिक सांत्वना! तुम हमको समझा देते, हम तुम्हें समझा देते। न तुम्हें पता, न हमें पता। लोग मान लेते हैं। लेकिन मान लेने का अर्थ निःशंक हो जाना नहीं है। मान तो हम वही बात लेते हैं जो हम मान लेना चाहते हैं।
इस फर्क को खयाल में रखना। यह देश है, इस देश में आत्मा की अमरता का सिद्धांत सनातन से चला आ रहा है। और इस देश से ज्यादा कायर देश खोजना मुश्किल है। अब यह बड़े आश्चर्य की बात है। यह होना नहीं चाहिए। क्योंकि जिस देश में आत्मा की अमरता मानी जाती हो, उस देश को तो कायर होना ही नहीं चाहिए। लेकिन पश्चिम के लोग आकर हुकूमत कर गये, जो आत्मा को नहीं मानते, नास्तिक हैं। जो मानते हैं कि एक दफे मरे तो मरे; फिर कुछ बचना नहीं है। वे आकर आत्मवादियों पर हुकूमत कर गये। और आत्मवादी डरकर अपने-अपने घर में छिपे रहे। वहीं बैठकर अपने उपनिषद पढ़ते रहे कि आत्मा अमर है।
आत्मा अमर है तो फिर भय क्या है? (लाज भय शंका दुराविला मान । न कळे साधन यापरते ।। ३ ।।) जिस आदमी को निःशंक रूप से पता चल गया आत्मा अमर है, उसके तो सब भय निरसन हो गये। उसके तो सारे भय गये। अब क्या भय है? अब तो मौत भी आये तो कोई भय नहीं है। ऐसे आदमी को परतंत्र तो बनाया ही नहीं जा सकता। ऐसे देश को तो परतंत्र बनाया ही नहीं जा सकता जो मानता हो, आत्मा अमर है।
लेकिन मामला कुछ और है। हम मानते ही इसलिए आत्मा को अमर हैं कि हम कायर हैं। हममें इतनी भी हिम्मत नहीं कि हम सीधी-सीधी बात मान लें, भई, हमें पता नहीं। जहां तक दिखाई पड़ता है वहां तक तो यही मालूम पड़ता है कि आदमी मरा कि खतम हुआ। और हम भी मरेंगे तो खतम हो जायेंगे। इतनी भी हिम्मत नहीं है हममें स्वीकार करने की। हम बचना चाहते हैं। आत्मा की अमरता हमारे लिए शरण बन जाती है। हम कहते हैं, नहीं, शरीर मरेगा, मन मरेगा, मैं तो रहूंगा। हम किसी तरह अपने को बचा लेते हैं। लेकिन यह कोई निःशंक अवस्था नहीं है। इसलिए इसका जीवन में कोई परिणाम नहीं होता।
तो पहली तो बात है, शंकारहित--निःशंको। (लाज भय शंका दुराविला मान ।) यह तुम्हारा अनुभव होना चाहिए, उपनिषद की सिखावन से काम न चलेगा। दोहरायें लाख कृष्ण, और दोहरायें लाख महावीर, इससे कुछ काम न चलेगा। बुद्ध कुछ भी कहें, इससे क्या होगा? जब तक तुम्हारे भीतर का बुद्ध जागकर गवाही न दे। जब तक तुम न कह सको कि हां, ऐसा मेरा भी अनुभव है। जब तक तुम न कह सको कि ऐसा मैं भी कहता हूं अपने अनुभव के आधार पर, अपनी प्रतीति के, अपने साक्षात के आधार पर कि मेरे भीतर जो है, वह शाश्वत है। (तुका कुणबीयाचा नेणे शास्त्रमत । एक पंढरीनाथ विसंबेना ।। ३ ।।)
लेकिन तब तुम यह भी पाओगे कि जो शाश्वत है वह तुम नहीं हो। तुम तो अहंकार हो। तुम तो मरोगे। तुम तो जाओगे। तुम बचनेवाले नहीं हो। तुम्हारा शरीर जायेगा, तुम्हारा मन जायेगा। इन दोनों के पार कोई तुम्हारे भीतर छिपा है जिससे तुम्हारी अभी तक पहचान भी नहीं हुई। वही बचेगा। और वह तुमसे बिलकुल अन्यथा है, तुमसे बिलकुल भिन्न है। तुम्हें उसकी झलक भी नहीं मिली है। तुमने सपने में भी उसका स्वप्न नहीं देखा है।
शंकारहित कैसे होओगे? कैसे यह निःशंक अवस्था होगी? कठिन तो नहीं होनी चाहिए यह बात, क्योंकि जो भीतर ही है उसको जानना अगर इतना कठिन है तो फिर और क्या जानना सरल होगा? कठिन तो नहीं होनी चाहिए। तुमने शायद भीतर जाने का उपाय ही नहीं किया। शायद तुम कभी घड़ी भर को बैठते ही नहीं। घड़ी भर को मन की तरंगों को शांत होने नहीं देते। जलाये रहते हो मन में आग, ईंधन डालते रहते हो। दौड़ाये रखते हो मन के चाक को। चलाये रखते हो मन के चाक को। कभी मौका नहीं देते कि चाक रुके और तुम कील को पहचान लो। वह जो कील है, जिस पर चाक घूमता है, वह नहीं घूमती।
देखते? हिंदुस्तान में बड़ा अदभुत नाम है। कहते हैं, चलती का नाम गाड़ी। अब गाड़ी का मतलब होता है, गड़ी हुई। चलती का नाम गाड़ी? चलती का नाम तो गाड़ी नहीं होना चाहिए। गाड़ी का मतलब गड़ी हुई। गड़ी हुई चीज तो चलती नहीं। चलती हुई चीज तो गाड़ी नहीं हो सकती। लेकिन फिर भी चलती को गाड़ी कहते हैं। ( रंगी को ना -रंगी कहे, खरे दूध को खोया । चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया ।।)
कारण? क्योंकि चाक असली चीज नहीं है गाड़ी में; असली चीज कील है, और कील गड़ी है। चाक चलता है, कील नहीं चलती। चाक हजारों मील चल लेगा, कील जहां की तहां है, जैसी की तैसी। उस कील के कारण गाड़ी को गाड़ी कहते हैं, चाक के कारण नहीं कहते। चाक तो गौण है। असली चीज तो कील है, उस पर ही चाक घूमता है। कील केंद्र है, चाक परिधि है।
तुम्हारे भीतर भी कील है जिस पर जीवन का चाक घूमता है, जीवन-चक्र चलता। जीवन-चक्र के बहुत से आरे हैं, वे ही तुम्हारी वासनायें हैं। लेकिन सब के भीतर छिपी हुई एक कील है--अचल, कभी चली नहीं; अकंप, कभी कंपी नहीं। वही कील तुम्हारी आत्मा है।
जरा बैठो कभी। थोड़ा समय निकालो अपने लिए भी। सब समय औरों में मत गंवा दो। धन में कुछ लगता है, काम में कुछ लगता है, पत्नी-बच्चों में कुछ लगता है; हर्ज नहीं, लगने दो। कुछ तो अपने लिए बचा लो। घड़ी भर अपने लिए बचा लो। तेईस घंटे दे दो संसार को, एक घंटा अपने लिए बचा लो। और एक घंटा सिर्फ एक ही काम करो कि आंख बंद करके चाक को ठहरने दो। मत दो इसको सहारा। तुम्हारे सहारे चलता है। तुम ईंधन देते हो तो चलता है। तुम हाथ खींच लोगे, रुकने लगेगा। शायद थोड़ी देर चलेगा--मोमेंटम, पुरानी गति के कारण, लेकिन फिर धीरे-धीरे रुकेगा।
दो-चार महीने अगर तुम एक घंटा सिर्फ बैठते ही गये, बैठते ही गये--जल्दी भी मत करना, धैर्य रखना। सिर्फ एक घंटा रोज बैठते गये, आंख बंद करके बैठ गये दीवाल से टिककर और कुछ भी न किया, कुछ भी न किया--दो-चार-छः महीने के बाद तुम अचानक पाओगे, चाक अपने आप ठहरने लगा। एक दिन साल-छः महीने के बाद तुम पाओगे...। और साल-छः महीने कोई वक्त है इस अनंतकाल की यात्रा में? कुछ भी तो नहीं। क्षण भर भी नहीं। साल-छः महीने में किसी दिन तुम पाओगे कि चाक ठहरा है और कील पहचान में आ गई। उसी दिन निःशंक हुए। उसी दिन जान लिया जो जानने योग्य है, पहचान लिया जो पहचानने योग्य है। फिर चलाओ खूब चाक। अब कील भूल नहीं सकती। अब चलते चाक में भी पता रहेगा। अब दौड़ो, भागो, यात्रायें करो संसारों की; और तुम जानते रहोगे कि भीतर कील ठहरी हुई है।
‘शंकारहित और युक्त मनवाला...।’
उसी कील के अनुभव से तुम्हारे भीतर संयुक्तता आती है, योग आता है, इंटिग्रेशन आता है। जिसने अपनी कील नहीं देखी वह तो भीड़ है। एक मन कुछ कहता है, दूसरा मन कुछ कहता है, तीसरा मन कुछ कहता है। महावीर ने विशेष शब्द उपयोग किया है इस अवस्था के लिए: बहुचित्तवान। आधुनिक मनोविज्ञान एक शब्द उपयोग करता है: पॉलीसाइकिक। इस शब्द का ठीक-ठीक अनुवाद बहुचित्तवान है, जो महावीर ने दो हजार साल पहले, ढाई हजार साल पहले उपयोग किया।
जब तक तुमने अपनी कील नहीं देखी, जब तक तुमने एक को नहीं देखा है अपने भीतर तब तक तुम अनेक के साथ उलझे रहोगे। मन अनेक है, आत्मा एक है। उस एक को जानकर ही व्यक्ति संयुक्त होता है।
न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशंको युक्तमानसः।
‘और ऐसा जो युक्त मनवाला पुरुष है, शंकारहित, यम-नियमादि मुक्तिकारी योग को आग्रह के साथ नहीं ग्रहण करता।’
यह खयाल में रखना। ऐसे व्यक्ति के जीवन में यम-नियम पाओगे तुम, लेकिन आग्रह न पाओगे। चेष्टा करके यम-नियम नहीं साधता। यम-नियम सधते हैं सहज, बिना किसी आग्रह के। कोई हठ नहीं, कोई जबर्दस्ती नहीं।
२२६५. वैष्णवांसंगती सुख वाटे जीवा । आणीक मी देवा कांहीं नेणें ॥ १ ॥ गायें नाचें उड़ें आपुलिया छंदें । मनाच्या आनंदें आवडीनें ॥ २ ॥ लाज भय शंका दुराविला मान । न कळे साधन यापरतें ॥ ३ ॥ तुका म्हणे आतां आपुल्या सायासें । आम्हां जगदीशें सांभाळावें ॥ ४ ॥
रंगी को ना -रंगी कहे, खरे दूध को खोया ।
चलती को गाड़ी कहे, देख कबीरा रोया ।।
४३९२. जालासि पंडित पुराण सांगसी। परि तूं नेणसी मी हें कोण ॥ १ ॥ गाढवभरी पोथ्या उलथिशी पानें । परि गुरुगम्यखुणे नेणशी बापा ॥ २ ॥ तुका कुणबीयाचा नेणे शास्त्रमत । एक पंढरीनाथ विसंबेना ।। ३ ।।
बोलावें तें आम्ही आतां अबोलणें । एकाचि वचनें सकळासि ॥
एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए ...