Thursday, 17 July 2025

ओशों की कहानिया एवं चुटकुले

नेपोलियन और घसियारिन


नेपोलियन जब हार गया तो सेंट हेलेना के द्वीप में उसे कैदी किया गया। पहले ही दिन सुबह नेपोलियन अपने डाक्टर को लेकर घूमने निकला है, और एक घसियारिन औरत अपना बड़ा घास का गट्ठर लिए पगडंडी पर चली आ रही है। डाक्टर ने चिल्लाकर कहा कि ऐ स्त्री, हट जा रास्ते से! देखती नहीं, कौन आ रहा है! सम्राट नेपोलियन आ रहे।नेपोलियन ने डाक्टर का हाथ खींच कर रास्ते से नीचे उतर गया। और कहा : तुम भूलते हो। तुम चूकते। अब वे दिन गए, जब नेपोलियन पहाड़ से कहता कि हट जा रास्ते पहाड़ हटता। अब तो घसियारिन भी हम से कह सकती है——हट जाओ रास्ते से!... ही जाता है।


जितने जल्दी हो सके, मर जाओ!


एक बहुत अनूठा संन्यासी, बोधिधर्म, जब चीन गया बुद्ध का संदेश लेकर, तो सम्राट वू ने उससे पूछा कि संक्षिप्त में मुझे बता दें, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है--तुम देख ही रहे हो कि साम्राज्य बड़ा है और मैं ज्यादा सत्संग नहीं कर सकता--मुझे संक्षिप्त में बता दो कि जीवन की सबसे बहुमूल्य बात क्या है? सबसे बड़ा सौभाग्य क्या है?बोधिधर्म ने कहा, तुम समझ न पाओगे। सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते।
वू थोड़ा चौंका--यह कोई सौभाग्य की बात कर रहा है आदमी कि तुम पैदा ही न होते! पर निश्चित ही बोधिधर्म सौभाग्य की ही बात कर रहा है। बुद्धों की यही तो आकांक्षा है कि पैदा न होते।
पर, बोधिधर्म ने कहा, वह बात तो हो नहीं सकती--खतम। तुम हो ही गए पैदा। वह तो नंबर एक का सौभाग्य है। इसलिए नंबर दो की कहता हूं कि जितने जल्दी मर जाओ।

कहते हैं, वू फिर कभी मिलने नहीं आया बोधिधर्म को--कि यह भी कोई ज्ञानी है!


लेकिन मैं भी तुमसे कहता हूं, नंबर एक का सौभाग्य कि तुम पैदा न हुए होते। लेकिन उस पर तो अब कोई बस नहीं, हो ही गए। तो अब दूसरा सौभाग्य है कि तुम जीते जी मर जाओ; जीवन से तुम्हारा राग-रंग छूट जाए। यह जीते जी मरने का अर्थ है: तुम ऐसे जीने लगो, जैसे तुम हो ही नहीं। बैठो बाजार में, क्योंकि कहीं तो बैठोगे ही; लेकिन ऐसे जैसे हो ही नहीं। पालो पत्नी-बच्चों को, पालना ही पड़ेगा; लेकिन ऐसे जैसे तुम हो ही नहीं। तुम अनुपस्थित हो जाओ। और जल्दी ही तुम पाओगे कि तुम्हारी अनुपस्थिति रिक्त नहीं रही, परमात्मा उसमें धीरे-धीरे उतर आया है।


इतना पागल नहीं कि फिर शादी कर लूं

मुल्ला नसरुद्दीन की पत्नी मरने के करीब थी। वह बिस्तर पर पड़ी है। आंख उसने खोली और उसने कहा, सुनो जी, क्या तुम सच कहते हो कि मैं मर जाऊंगी तो तुम पागल हो जाओगे?
नसरुद्दीन ने कहा, सौ फीसदी; तू मरेगी तो मैं निश्चित पागल हो जाऊंगा।
पत्नी हंसने लगी। कहा, झूठ बोलते हो। जहां तक मैं जानती हूं, मैं मरूंगी और तुम दूसरी शादी कर लोगे।
नसरुद्दीन ने कहा कि पागल हो जाऊंगा, यह सच है, लेकिन इतना पागल नहीं कि फिर शादी कर लूं।
अगर जीवन को तुम गौर से देखो, तो तुम दुबारा जन्म न लेना चाहोगे, तुम फिर शादी न करना चाहोगे। क्योंकि सिवाय दुख के और तुमने पाया क्या?


मेरे पिता का दिवाला निकल गया

मुल्ला नसरुद्दीन एक लखपति बाप की बेटी के प्रेम में था और कहता था: चाहे जीवन रहे कि जाए, तुझे नहीं छोड़ सकता। मरने को तैयार हूं, अगर उसकी भी जरूरत हो; शहीद हो सकता हूं, लेकिन तुझे नहीं छोड़ सकता। बड़ी बातें करता था।
एक दिन लड़की बड़ी उदास थी और उसने नसरुद्दीन से कहा कि सुनो, मेरे पिता का दिवाला निकल गया!
नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पहले से ही पता था कि तेरा बाप जरूर कोई न कोई गड़बड़ खड़ी करेगा और हमारा विवाह न होने देगा।
विवाह ही जिस कारण से कर रहे थे, वही खतम हो गया!
तुम्हारे संबंध, तुम कहते कुछ और हो, कारण उनका कुछ और ही होता है। तुम बताते कुछ और हो...और मजा ऐसा है कि तुम जो बताते हो, हो सकता है तुम ऐसा मानते भी होओ कि यही सच है। तुम अपने को भी धोखा दे लेते हो; दूसरे को ही देते हो, ऐसा नहीं है। आदमी बड़ा कुशल है, अपने को भी धोखा दे लेता है।


साईबाबा को भोजन का निमंत्रण

साईंबाबा के जीवन में एक उल्लेख है। एक हिंदू संन्यासी, जिस मस्जिद में साईंबाबा रहते थे, उससे कोई तीन मील दूर रहता था। वह रोज आता साईं के दर्शन को। और जब तक उनके दर्शन न हो जाते, तब तक वापस जाकर भोजन न करता। कभी-कभी बड़ी भीड़ होती, वह मस्जिद में भीतर ही न घुस पाता। कभी-कभी पूरा दिन बीत जाता, तब दर्शन होते। लेकिन जब तक वह पैर न छू ले, तब तक वह भोजन न करता। कभी-कभी रात हो जाती तो फिर भोजन करना मुश्किल हो जाता, उपवासा ही रह जाता; क्योंकि दिन में ही भोजन करने का नियम था।
साईंबाबा ने उससे कहा, नासमझ, तुझे यहां आने की जरूरत भी नहीं, मैं वहीं आ जाऊंगा। मगर पहचानना! ऐसा न हो कि मैं आऊं और तू पहचाने न। ठीक जब तेरा भोजन तैयार होगा, मैं आ जाऊंगा; तू वहीं दर्शन कर लेना और भोजन कर लेना। तीन मील आना-जाना, फिर कभी-कभी उपवासे रह जाना, मुझे भी पीड़ा होती है।
उसने कहा, यह तो बड़े सौभाग्य की बात है। तो कल मैं राह देखूंगा।
कल उसने खाना जल्दी बना लिया; बड़ी खुशी से राह देखने लगा। कोई नहीं आया, एक कुत्ता आया। कुत्ते को भोजन की गंध मिल गई होगी। उसने उठाया डंडा और कहा, भाग यहां से! हम साईं की प्रतीक्षा कर रहे हैं, आए तुम! दो डंडे मारे, कुत्ते को भगा दिया। फिर कोई नहीं आया। दोपहर हो गई, तो भागा हुआ मस्जिद पहुंचा। वहां भीड़ लगी है। जाकर कहा कि यह क्या मामला है? बोल कर, वचन देकर, आए नहीं? तुम तो यहां जमे हो, भीड़-भाड़ में बैठे हो। आओगे कैसे?
साईं ने कहा, मैं आया, दो डंडे भी खाए, तुम पहचाने नहीं।
घबड़ाया संन्यासी--दो डंडे! उसने कहा, कुत्ता आया था महाराज!
साईं ने कहा, वह मैंने पहले ही कह दिया था--पहचानना, आऊंगा जरूर। किस रूप में आऊंगा, उस समय कौन सा रूप सुलभ-सरल होगा आने के लिए, यह तो समय-समय की बात है। उस समय यही मौजूं था कि कुत्ते की शक्ल में आऊं। कोई दूसरा रूप उस वक्त भर दोपहरी में उपलब्ध भी न था। वह कुत्ता ही वहां था, सो हम उसी पर सवार हुए।
रोने लगा संन्यासी। उसने कहा, अब एक दफा भूल हो गई, एक मौका और! कल, चाहे कुछ भी हो, पहचान लूंगा।
कुत्ता अगर आता दूसरे दिन तो पहचान लेता, लेकिन कुत्ता आया ही नहीं। अब उसको पता था। वह दो की प्रतीक्षा कर रहा था--साईंबाबा सीधे आ जाएं तो ठीक, नहीं तो कुत्ते की राह देख रहा था। कुत्ता आया ही नहीं! अब कुत्ते भी कोई भरोसे के थोड़े ही हैं! मौज की बात--आ गए, आ गए--नहीं आया। आया एक भिखमंगा, कोढ़ी। चूक हो गई फिर। उसकी बास आ रही थी। भयंकर दुर्गंध थी। यह तो भोजन को भी खराब कर देगा, इसकी बास आ रही है। यह तो खाने का भी मन नहीं रह जाएगा। वमन की इच्छा होने लगी उसको देख कर। कहा कि भाई, जा! यहां आने की कोई जरूरत नहीं है; यहां अंदर प्रवेश भी मत करना। थोड़ा शक भी हुआ कि कहीं भूल तो नहीं हो रही। लेकिन यह कोढ़ी और साईंबाबा--कोई तालमेल नहीं दिखता; कुत्ता कम से कम स्वस्थ तो था।
सांझ फिर गया, कहा कि आप आए नहीं; आपकी भी राह देखी, कुत्ते की भी राह देखी।
साईंबाबा ने कहा, आया था, लेकिन दुर्गंध तुझे जंची ही नहीं; तूने दूर-दूर दुतकार दिया।
रोने लगा संन्यासी। कहा, एक बार और!
साईंबाबा ने कहा, हजार बार भी आऊं, तू न पहचानेगा।
पहचान तब संभव हो पाती है जब तुम जागते हो, जागे हुए होते हो।
गोविन्द को भजने का यही अर्थ है कि जो भी तुम्हें दिखाई पड़े, गोविन्द का भजन बन जाए; जहां से भी खबर आए, उसकी ही खबर आए। हवा बहे, तो उसकी याद; जल में कलकल नाद हो, तो उसकी याद; पक्षी गीत गाएं, तो उसकी याद; सन्नाटा हो, तो उसका; शोरगुल हो, तो उसका; बाजार हो, तो उसका; शून्य हिमालय हो, तो उसका। लेकिन उसकी याद हर जगह से आए--पत्ती, फूल, पत्थर--सब तरफ से उसकी याद आए। उसकी याद ही चारों तरफ बरसने लगे और तुम्हें घेर ले; जब भी तुम किसी की आंखों में झांको, उसी में झांको।


तत्वमसि, मारनेवाला भी तू ही हैं

एक संन्यासी को गलती से, भ्रांतिवश, एक सिपाही ने मार डाला। अठारह सौ सत्तावन की बात, क्रांति के दिन, एक मौन संन्यासी, नग्न संन्यासी गुजर रहा है अंग्रेजों की छावनी के पास से। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया, उससे पूछा, कौन हो? लेकिन वह मौन है, इसलिए वह उत्तर नहीं दिया। उत्तर नहीं दिया तो शक बढ़ा, संदेह हुआ। तो एक अंग्रेज सिपाही ने भाला उठा कर उसकी छाती में भोंक दिया। उस संन्यासी ने व्रत लिया था कि सिर्फ मरते वक्त एक बार बोलेगा, उसके पहले नहीं। ऐसा तीस साल से वह मौन था। जब भाला उसकी छाती में छिदा, खून का फव्वारा फूट पड़ा, तब उसने सिर्फ एक वचन उपनिषद का कहा: तत्वमसि श्वेतकेतु! तू भी वही है श्वेतकेतु!
भीड़ इकट्ठी हो गई, लोगों ने पूछा, तुम्हारा क्या मतलब है?
उसने कहा कि मेरा मतलब इतना ही है कि परमात्मा किसी भी रूप में आए, मुझे धोखा न दे पाएगा। आज वह भाला मारने के लिए आया है; भाला हाथ में लेकर आया है; भाला छाती में चुभ गया है; लेकिन मैं देख रहा हूं कि भीतर तू वही है। तत्वमसि श्वेतकेतु! तू मुझे धोखा न दे पाएगा।
छाती से खून बहते हुए वह संन्यासी नाचने लगा, क्योंकि वह अपने हत्यारे में भी परमात्मा को देख सका।


तुम्हारा असली चेहरा क्या है?

एक झेन आश्रम के द्वार पर एक संध्या एक भिक्षु ने दस्तक दी। जापान में झेन आश्रमों का यह नियम है कि अगर कोई भिक्षु, यात्री-भिक्षु, विश्राम करना चाहे, तो उसे कम से कम एक प्रश्न का उत्तर देना चाहिए। जब तक वह एक प्रश्न का ठीक उत्तर न दे दे, तब तक वह अर्जित नहीं करता विश्राम के लिए। वह आश्रम में रुक नहीं सकता, उसे आगे जाना पड़ेगा। आश्रम का प्रमुख द्वार पर आया, द्वार खोला और उसने झेन फकीरों की एक बहुत पुरानी पहेली इस अतिथि के सामने रखी। पहेली है कि तुम्हारा असली चेहरा क्या है? मूल चेहरा कौन सा है? वैसा मूल चेहरा, जो तुम्हारे मां और बाप के पैदा होने के पहले भी तुम्हारा ही था।
यह आत्मा के संबंध में एक प्रश्न है; क्योंकि मां और बाप से जो मिला, वह शरीर है; शरीर का चेहरा भी उनसे मिला। तुम्हारी ओरिजिनल, मौलिक मुखाकृति क्या है? तुम्हारा स्वभाव क्या है? और झेन फकीर कहते हैं, इसका उत्तर शब्दों से नहीं दिया जा सकता; इसका उत्तर तो जीवंत अभिव्यक्ति होनी चाहिए।
जैसे ही यह सवाल पूछा गया, उस अतिथि फकीर ने अपने पैर से जूता निकाला और पूछने वाले के चेहरे पर जूता मारा। पूछने वाला पीछे हट गया, झुक कर उसने सलाम की, नमस्कार किया, और कहा: स्वागत है; भीतर आओ।
दोनों ने भोजन किया, फिर जलती हुई अंगीठी के पास बैठ कर दोनों रात बात करने लगे। मेजबान ने मेहमान से कहा, तुम्हारा उत्तर अदभुत था।
मेहमान ने पूछा, तुम्हें स्वयं इस उत्तर का अनुभव है?
मेजबान ने कहा, नहीं, मुझे तो अनुभव नहीं है, लेकिन बहुत मैंने शास्त्र पढ़े हैं। और शास्त्रों से यह पाया है कि ठीक उत्तर देने वाला डगमगाता नहीं, झिझकता नहीं। तुम बिना झिझके उत्तर दिए। और तुम्हारे उत्तर में बात छिपी थी। शास्त्रों के आधार से मैं जानता हूं, मैं पहचान गया कि तुम्हें उत्तर मिल गया है। क्योंकि तुमने जो उत्तर दिया, वह उत्तर यह था कि नासमझ, शब्द में प्रश्न पूछता है, निःशब्द में उत्तर चाहता है! नासमझ, मूल चेहरे की बात पूछता है, और मूल चेहरा तो तेरे पास भी है! इसलिए मैं जूते मार कर तेरे चेहरे को उत्तर दे रहा हूं कि यह चेहरा मूल नहीं है, जूता मारने योग्य है।
मेजबान ने कहा कि मैं समझ गया तेरा उत्तर, शास्त्र मैंने पढ़े हैं और उसमें ऐसे उत्तर लिखे हैं।
मेहमान कुछ बोला न, चुपचाप चाय की चुस्की लेता रहा। तब जरा मेजबान को शक हुआ, उसने गौर से इसके चेहरे को देखा, इसके चेहरे में उसे कुछ प्रतीत हुआ जो बड़ा असंतोषदायी था। उसने फिर से पूछा कि मित्र, मैं एक बार फिर पूछता हूं, तुझे भी वस्तुतः उत्तर मिल चुका है या नहीं?
मेहमान ने कहा, मैंने भी बहुत शास्त्र पढ़े हैं। और जहां से तुमने मुझे पहचाना कि उत्तर मिल गया, वहीं से मैंने यह उत्तर पढ़ा है; उत्तर तो मुझे भी नहीं मिला है।
शास्त्र भयंकर धोखा हो सकता है, क्योंकि शास्त्र में उत्तर लिखे हैं। लेकिन शास्त्र के उत्तर को दोहराना वैसे ही है, जैसे गणित की किताब के पीछे उत्तर दिए होते हैं। तुम गणित पढ़ो, उलटा कर किताब के पीछे उत्तर देख लो। तो उत्तर तो तुम सही दे दोगे, लेकिन उस प्रश्न से उत्तर तक पहुंचने का जो मार्ग है, जो विधि है, वह तुम्हारे पास न होगी। उत्तर कितना ही सही हो, तुम गलत ही रहोगे; क्योंकि तुम तो विधि से गुजरते, तभी निखरते।


तुम्हारी सोलह आना जिंदगी बेकार गई

एक सूफी फकीर अपनी रोटी कमाने के लिए एक नदी पर लोगों को नाव से पार करवाता था। एक दिन गांव का पंडित उस पार जाना चाहता था। तो उस सूफी फकीर ने कहा, आपसे क्या पैसे लेने! पैसे भी वह एक-दो पैसे लेता था। आपको ऐसे ही पार करा देंगे। पंडित नाव में बैठा; वे दोनों चले। दोनों ही थे नाव में, पंडित ने पूछा--कुछ पढ़ना-लिखना आता है?
पंडित और पूछ भी क्या सकता है! जो वह जानता है, वही सोचता है, दूसरों को भी जना दे। हम वही दूसरों को दे सकते हैं, जो हमारे पास है।
सूफी फकीर का तेज उसे दिखाई न पड़ा। पंडित अपने ज्ञान में अंधा होता है। उसने तो समझा एक साधारण मांझी है। वह एक असाधारण पुरुष था। पंडित जिस परमात्मा की बात सोचता रहा है, सुनता रहा है, वह परमात्मा उस असाधारण पुरुष में मौजूद था; जिसकी पंडित ने अब तक चर्चा की थी, वह उस फकीर में से झांक रहा था। अगर आंख होती तो फकीर में वह सब मिल जाता, जिसके सपने देखे हैं, जिसके शास्त्र पढ़े हैं। प्रत्यक्ष था वहां कोई।
लेकिन पंडित ने पूछा, पढ़ना-लिखना आता है?
पंडित को अगर परमात्मा भी मिल जाए तो वह पूछेगा--सर्टिफिकेट? कहां तक पढ़े-लिखे हो? उसकी अपनी दुनिया है; वह अपने ही शब्दों में, अपने ही शास्त्र में जीता है।
उस फकीर ने कहा कि नहीं, पढ़ना-लिखना तो बिलकुल नहीं आता; मैं बिलकुल गंवार हूं, नासमझ हूं।
उसने जब ये शब्द कहे, तब अगर पंडित के पास जरा भी होश होता तो देख लेता कि कितनी गहरी विनम्रता है। अपने अज्ञान को स्वीकार कर लेना, ज्ञान की तरफ पहला कदम है। और अगर कोई समग्रता से अपने अज्ञान को स्वीकार कर ले, तो वही अंतिम कदम भी हो सकता है। क्योंकि जब तुम पूरे भाव से जानते हो कि कुछ भी नहीं जानता हूं, तब तुम्हारा अहंकार कहां टिकेगा? कहां खड़ा रहेगा? भूमि खो जाएगी पैर के तले से, गिर जाएगा भवन अहंकार का, तुम निरहंकार में उतर जाओगे। वही द्वार है; वहीं से कोई परमात्मा से जुड़ता है।
फकीर ने कहा, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं, बिलकुल बेपढ़ा-लिखा हूं।
पंडित ने कहा, तो फिर तुम्हारी चार आना जिंदगी बेकार गई।
नाव थोड़ी आगे बढ़ी। पंडित ने पूछा, और गणित तो आता ही होगा कम से कम? हिसाब-किताब के लिए जरूरी है।
फकीर ने कहा, अपने पास कुछ है ही नहीं, हिसाब-किताब क्या करना! खाली हाथ हैं; जो दिन में मिल जाता है, वह सांझ तक समाप्त हो जाता है, क्योंकि रोटी से ज्यादा कमाना नहीं है कुछ। रात तो हम फिर फकीर हो जाते हैं, सुबह उठ कर फिर कमा लेते हैं। और परमात्मा अब तक देता रहा है तो कल का हिसाब क्या रखना! और किसी ने दे दिया तो ठीक है और किसी ने न दिया तो भी ठीक है; क्योंकि अब तक जी लिए हैं, आगे भी जी लेंगे। न तो देने वाले से कुछ ऐसा मिल जाता है कि सदा काम आ जाए, और न न देने वाला कुछ छीन लेता है कि सदा के लिए कोई नुकसान हो जाए--सब खेल है।
पंडित ने कहा, तुम्हारी आठ आना जिंदगी बेकार गई।
और तभी अचानक तूफान आ गया; और नाव डगमगाने लगी; और नाव अब डूबी, तब डूबी होने लगी। फकीर हंसा, क्योंकि पंडित बहुत घबड़ा गया। मौत सामने देख कर कौन न घबड़ा जाएगा! ऐसे पंडित अमृत की बातें करते था--आत्मा अमर है--लेकिन जब मौत सामने आती है तब पांडित्य की आत्मा काम नहीं आती, न पांडित्य की अमरता काम आती है। घबड़ा गया; हाथ-पैर कंपने लगे।
फकीर ने पूछा, तैरना नहीं आता?
उसने कहा कि बिलकुल नहीं आता।
फकीर ने कहा, तुम्हारी सोलह आना जिंदगी बेकार गई। अब मैं तो कूदता हूं; हम तो चले; ये नाव तो डूबेगी।
'हे मूढ़, गोविन्द को भजो, गोविन्द को भजो, क्योंकि अंतकाल के आने पर...'
संभवतः, शंकर उस कहानी को जानते रहे हों जो मैंने तुमसे कही।
'क्योंकि अंतकाल के आने पर व्याकरण की रटन तुम्हारी रक्षा न करेगी।'
जब डूबना आएगा सामने, जब मौत घेरेगी, तब अगर तैरना आता हो तो ही काम आ सकेगा। मौत में तैरना आता हो! और अगर मौत में तैरना नहीं आता तो मौत डुबा लेगी। बहुत बार पहले भी उसने डुबाया--तुम अभी तक भी सजग नहीं हुए हो; तुमने अब तक भी तैरना नहीं सीखा।
अंतकाल के आने पर, मृत्यु के आने पर, कितनी तुम भाषा जानते हो या कितनी भाषाएं जानते हो, कितना व्याकरण जानते हो--कुछ भी तो काम न पड़ेगा।


पहले संस्कृत सीखो, फिर सिखाने आना

राम भारत वापस लौटे, तो उन्होंने सोचा कि अमरीका जैसे देश में, जहां धर्म की कोई परंपरा नहीं है, जहां लोग बिलकुल ही भौतिकवादी हैं--जब वहां मेरे वचनों का ऐसा प्रभाव हुआ और मेरे व्यक्तित्व ने ऐसी लहर पैदा की, तो भारत में तो न मालूम क्या हो जाएगा! लौटता हूं अपने घर, जहां की परंपरा हजारों साल पुरानी है। कब प्रारंभ हुआ जहां का इतिहास--सब अंधकार में खो गया है--इतना लंबा है। जहां वेद लिखे गए, उपनिषद रचे गए, गीता निर्मित हुई; जहां बुद्ध, महावीर और शंकर जैसे लोग पैदा हुए, वहां मेरी बात तो ऐसी पकड़ी जाएगी जैसे मैं हीरे बांटता होऊं। जब अमरीका में--जहां लोग पदार्थवादी हैं, जो ईश्वर को समझ ही नहीं पाते, जिनके ईश्वर से सारे संबंध टूट गए हैं--जब वहां ऐसा चमत्कार हुआ, तो भारत में क्या न होगा!
लेकिन भारत में जो हुआ, वह राम ने सोचा भी न था। यह सोच कर कि उचित होगा कि भारत में प्रवेश मैं काशी से करूं--क्योंकि वही नगरी है; भारत के सारे सौभाग्य का इतिहास काशी के कण-कण में छिपा है; बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन वहां दिया; शंकर ने अपनी विश्वविजय की घोषणा वहां की; वहां जैन तीर्थंकर हुए। काशी से पुराना कोई नगर सारे संसार में नहीं है। जेरुसलम भी नया है। मक्का और मदीना भी बहुत नये हैं। काशी प्राचीनतम तीर्थ है--पृथ्वी पर सबसे पहला सभ्य हुआ नगर है। तो राम पहले काशी पहुंचे। और उन्होंने पहला प्रवचन काशी में दिया।
लेकिन बीच प्रवचन में एक पंडित खड़ा हो गया और उसने कहा कि रुकें! संस्कृत आती है?
राम कुछ समझ न पाए। वे एक मस्त आदमी थे। उन्हें संस्कृत आती भी नहीं थी; उर्दू-फारसी जानते थे। यह उन्होंने सोचा भी न था कि संस्कृत का और वेद से, और ब्रह्म से, और ज्ञान से कोई संबंध है।
कोई भी भाषा न आती हो तो भी आदमी परमात्मा को जान सकता है। कबीर भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; मोहम्मद भी जान लेते हैं बिना पढ़े-लिखे; बढ़ई के बेटे जीसस के जीवन में भी वे फूल खिल जाते हैं। कुछ पंडित होना शर्त तो नहीं है।
राम चौंके! कहा, नहीं, संस्कृत तो नहीं आती।
वह पंडित हंसने लगा। और लोग भी उठ गए। उन्होंने कहा, जब संस्कृत ही नहीं आती, तो वेदांत कैसे आएगा! पहले संस्कृत सीखो, फिर सिखाने आना।
राम उसके बाद हिमालय चले गए। और एक बड़ी उदास घटना है कि राम ने संन्यासी का वेश छोड़ दिया। जब वे मरे तो गैरिक वस्त्रों में नहीं थे। क्योंकि उन्होंने कहा, जो धर्म शब्दों में अटक गया हो, और जिसका संन्यास केवल पांडित्य हो गया हो, और संस्कृत जानने से जहां वेदांत जाना जाता हो, उस समूह का क्या अपने को अंग मानना! जब वे मरे, तब वे गैरिक वस्त्रों में न थे। उन्होंने संन्यास का भी त्याग कर दिया।
परंपरा ने संन्यास तक को दूषित कर दिया है।
अमेरिका समझ सका, भारत न समझ पाया। अमेरिका नासमझ है इसलिए समझ सका। भारत बहुत समझदार है--जरूरत से ज्यादा समझदार है--बिना जाने बहुत कुछ जान लेने की भ्रांति भारत को पैदा हो गई है; पंडित तो हो गया है मन, प्रज्ञावान नहीं हो पाया है; शब्द तो भर गए हैं, निःशब्द के लिए जगह नहीं बची है। और धर्म का कोई संबंध शब्दों से नहीं है।
इसलिए मैं जो तुमसे कहूं, उससे भी ज्यादा ध्यान उस पर देना जो मैं तुमसे न कहूं। बोलूं--शब्द पर बहुत ध्यान मत देना; दो शब्दों के बीच में जो खाली जगह होती है, उस पर ध्यान देना। जो बोलूं, वह छूट जाए, हर्जा नहीं है; लेकिन जो अनबोला है, वह न छूट पाए।

फायदा न होने पर दाम वापस


मुल्ला नसरुद्दीन दवाएं बनाता है और बेचता है। एक पैकेट पर उसने लिख रखा था: फायदा न होने पर दाम वापस। मैं उसकी दुकान पर बैठा था। एक आदमी आया, वह बड़ा नाराज था। उसने कहा, महीना भर हो गया दवा फांकते-फांकते, कोई फायदा नहीं हुआ। दाम वापस चाहिए!
नसरुद्दीन ने कहा कि पैकेट पर लिखा है: फायदा न होने पर दाम वापस। तुम्हें न हुआ हो, हमें तो फायदा हुआ है।
अपनी-अपनी व्याख्या है। जीवन को तुम वैसा ही करके देखते हो, जैसा तुम देखना चाहते हो। शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं; सत्यों के अर्थ बदल जाते हैं। तुम अपने आस-पास अपनी ही मान्यताओं का एक संसार खड़ा कर लेते हो, फिर तुम उसी संसार में जीते हो। और आदमी अपने ही कारण खोजता चला जाता है, और कारणों के थेगड़े लगाए चला जाता है, ताकि मान्यताएं टूट न जाएं, फूट न जाएं; जोड़त्तोड़ बिठाता रहता है।

मैंने झापड़ा मारा तो चौंसठों दांत नीचे गिर जाएंगे...


मुल्ला नसरुद्दीन का बाजार में किसी से झगड़ा हो गया। वह आदमी बहुत नाराज था और उसने कहा, एक ऐसा झापड़ा मारूंगा--नसरुद्दीन को कहा--कि बत्तीसों दांत जमीन पर गिर जाएंगे, बत्तीसी नीचे गिर जाएगी।
मुल्ला नसरुद्दीन और जोश में आ गया, उसने कहा कि तूने समझा क्या है! अगर मैंने झापड़ा मारा तो चौंसठों दांत नीचे गिर जाएंगे।
एक तीसरा आदमी पास में खड़ा था, उसने कहा, भई बड़े मियां, इतना तो खयाल रखो कि चौंसठ दांत आदमी के होते ही नहीं।
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मुझे पता था कि तू भी बीच में कूद पड़ेगा, इसलिए चौंसठ। एक ही झापड़े में दोनों के गिरा दूंगा।
आदमी अपनी...तुमसे भूल भी हो जाए, तो भी तुम भूल स्वीकार नहीं करते। तुम अपनी भूल के लिए भी कारण खोज लेते हो, तर्क खोज लेते हो।
भूल को स्वीकार करना बड़ा साहस है। और जिसने भूल को स्वीकार कर लिया, धीरे-धीरे भूलें तिरोहित हो जाती हैं।

सब था, फिर भी आदमी भूखा ही मर गया!

सूफी कहते हैं, एक आदमी भूखा मर रहा था। आटा था घर में, जल भी था, चूल्हा भी था, ईंधन भी था; लेकिन उस आदमी को पता नहीं कि कैसे आटा गूंथे, कैसे आग जलाए, कैसे आग पर रोटी सेंके। सब था--भूख भी थी, भोजन भी था--संयोग न बन सका। वह आदमी भूखा ही मर गया!
यह सभी आदमियों की कथा है। तुम्हारे पास सब संयोग है और तुम भूखे हो! ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम्हारे पास मौजूद नहीं है। परमात्मा किसी को इस तरह भेजता ही नहीं; सब साधन देकर भेजता है। लेकिन साधनों को बिठाना पड़ेगा। उनका ठीक अनुपात, ठीक समन्वय, ठीक संगीत बन जाए, तो तुम्हारे भीतर परमात्मा का प्रकाश हो जाएगा। न तो बुद्धि से घिरना, न हृदय से; दोनों तटों के बीच तुम्हारी चेतना बह सके नदी की धार की भांति; तुम गंगा बन जाना; फिर सागर दूर नहीं है। 


मुल्ला का निमंत्रण

मुल्ला नसरुद्दीन अपने मित्रों को लेकर एक दिन सांझ घर आया। होटल में बैठे-बैठे जोश चढ़ गया। ऐसे ही कुछ बात चल रही थी, किसी ने कह दिया कि तुम बड़े कंजूस हो। उसने कहा, कौन कहता है? मेरा जैसा दानी नहीं! लोगों ने जोश पर चढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा है, तो आज हम सबको निमंत्रण करवा दो तुम्हारे घर। उसने कहा, आओ, जितने लोग यहां मौजूद हैं। कोई तीस-पैंतीस का जत्था आ गया। घर पहुंचते-पहुंचते होश आया कि यह क्या कर लिया! क्योंकि अब तक तो भूल ही गए थे जोश में कि पत्नी घर बैठी है। अब वह मुश्किल हो जाएगी। तीस-पैंतीस! एक आदमी ले आओ घर में तो मुसीबत खड़ी होती है। तो उसने कहा कि देखो भई, तुम भी सब घर-द्वार वाले हो, तुम भी जानते हो आदमी की असलियत। मैं भी एक साधारण पति हूं, पत्नी घर में बैठी है। तुम जरा बाहर रुको, पहले मैं उसे राजी कर लूं, समझा-बुझा लूं, फिर तुम्हें भीतर बुला लूंगा।

वह सबको बाहर छोड़ कर दरवाजा बंद करके भीतर गया। पत्नी तो एकदम पागल हो गई, गुस्से में आ गई कि हद्द हो गई, पूरा गांव लिवा लाए! और घर में खाना भी नहीं, सब्जी भी नहीं। दिन भर से कहां थे? आटा पिसा ही नहीं है। सब्जी तुम लाए नहीं--आ कहां से जाएगी? कोई आकाश से टपकती है?
तो मुल्ला ने कहा, अब तू ही बता, क्या करें? अब तो रात भी हो गई, बाजार भी बंद हो गया। इनसे किस तरह निपटारा हो?
उसने कहा, अब तुम ही समझो; जो निपटारा करना हो, करो! मैंने मुसीबत बुलाई भी नहीं, तुम्हीं लेकर आए हो।
तो उसने कहा, एक काम कर, तू जाकर उनसे कह दे कि मुल्ला घर पर नहीं है।
वह बाहर आई पत्नी, उसने उनसे कहा कि किसकी राह देख रहे हो? वे घर पर नहीं हैं।
यह कैसे हो सकता है--उन लोगों ने कहा--वे हमारे साथ ही आए थे, और हमने उनको बाहर जाते भी नहीं देखा, भीतर ही गए हैं।
वे पत्नी से जिरह करने लगे, दलीलबाजी करने लगे। आखिर मुल्ला को भी जोश आ गया। भीतर सुन रहा है दलील, वह भूल ही गया जोश में फिर, खिड़की से झांक कर बोला कि सुनो जी, पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया हो, यह भी तो हो सकता है।
आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते। 

बुद्ध जन्म : एक के विपरित सात
(मानियेले नाही बहुमता)


बुद्ध का जन्म हुआ। पांचवें दिन रिवाज के अनुसार श्रेष्ठतम पंडित इकट्ठे हुए। उन्होंने बुद्ध को नाम दिया--सिद्धार्थ। सिद्धार्थ का अर्थ होता है: कामना की पूर्ति; आशा की पूर्ति; अर्थ की उपलब्धि; मंजिल का मिल जाना। बूढ़े शुद्धोधन के घर में बेटा पैदा हुआ था। जीवन भर प्रतीक्षा की थी, आशा की थी, सपने देखे थे; बहुत बार निराश हुआ था; और अब बुढ़ापे में बेटा पैदा हुआ था; निश्चित ही सिद्धार्थ था। पंडितों ने नाम ठीक ही दिया था। आठ बड़े पंडित थे। सम्राट पूछने लगा, इस नवजात शिशु का भविष्य भी कहोगे? सात पंडितों ने अपने हाथ उठाए और दो अंगुलियों का इशारा किया। सम्राट कुछ समझा नहीं। उसने कहा, मैं कुछ समझा नहीं। इशारे में नहीं, स्पष्ट कहो। तो उन सात पंडितों ने कहा कि दो विकल्प हैं--या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सब छोड़ कर सर्वत्यागी, वीतरागी, संन्यस्त हो जाएगा; या तो यह चक्रवर्ती सम्राट होगा और या सर्व वीतरागी संन्यासी होगा।सिर्फ एक पंडित चुप रहा। वह सबसे युवा था। कोदन्ना उसका नाम था। लेकिन वह सबसे ज्यादा प्रतिभाशाली भी था। सम्राट ने पूछा, तुम चुप हो, तुमने दो अंगुलियां न उठाईं!
कोदन्ना ने कहा, दो अंगुलियां तो सभी के जन्म के साथ उठाई जा सकती हैं, क्योंकि दोनों विकल्प सभी के सामने होते हैं--या तो संसार की दौड़ का, या संन्यास का। संन्यास या संसार--ये तो दो विकल्प सभी के सामने होते हैं। इन पंडितों ने कुछ विशेष नहीं किया अगर बुद्ध के लिए दो अंगुलियां उठाईं; मैं एक अंगुली उठाता हूं: यह संन्यासी होगा।

लेकिन आदमी का अभागा मन, शुद्धोधन रोने लगा। यह कोदन्ना सर्वज्ञात ज्योतिषी है; युवा है, पर महातेजस्वी है; और उसके वचन कभी खाली नहीं गए। दूसरे पंडितों के साथ तो सुविधा थी थोड़ी कि चक्रवर्ती भी बन सकता है, कोदन्ना ने तो विकल्प ही तोड़ दिया। उसने तो कहा, यह निश्चित बुद्ध बनेगा। उन पंडितों के साथ तो सम्राट रोया न था, प्रसन्न हुआ था--चक्रवर्ती सम्राट होगा बेटा। और दूसरे विकल्प को उसने कोई मूल्य न दिया था, क्योंकि जब चक्रवर्ती सम्राट होने का विकल्प हो तो कौन संन्यासी होना चाहता है! लेकिन कोदन्ना ने तो मार्ग तोड़ दिया, उसने तो एक ही अंगुली उठाई है। लेकिन सम्राट ने अपने मन को समझाया, कोदन्ना अकेला है, विपरीत सात ज्योतिषी हैं। ऐसे ही तो आदमी अपने मन को सांत्वना देता है। सात ही ठीक होंगे, एक ठीक न होगा। लेकिन वह एक ही ठीक सिद्ध हुआ।


लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है?



एक अति प्राचीन कथा है। घने वन में एक तपस्वी साधनारत था--आंख बंद किए सतत प्रभु-स्मरण में लीन। स्वर्ग को पाने की उसकी आकांक्षा थी; न भूख की चिंता थी, न प्यास की चिंता थी। एक दीन-दरिद्र युवती लकड़ियां बीनने आती थी वन में। वही दया खाकर कुछ फल तोड़ लाती, पत्तों के दोने बना कर सरोवर से जल भर लाती, और तपस्वी के पास छोड़ जाती। उसी सहारे तपस्वी जीता था। फिर धीरे-धीरे उसकी तपश्चर्या और भी सघन हो गई--फल बिना खाए ही पड़े रहने लगे; जल दोनों में पड़ा-पड़ा ही गंदा हो जाता--न उसे याद रही भूख की और न प्यास की। लकड़ियां बीनने वाली युवती बड़ी दुखी और उदास होती, पर कोई उपाय भी न था।
इंद्रासन डोला; इंद्र चिंतित हुआ; तपस्या भंग करनी जरूरी है; सीमा के बाहर जा रहा है यह व्यक्ति--क्या स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा करने का इरादा है?
लेकिन कठिनाई ज्यादा न थी, क्योंकि इंद्र मनुष्य के मन को जानता है। स्वर्ग से जैसे एक श्वास उतरी--सूखी, दीन-दरिद्र, काली-कलूटी वह युवती अचानक अप्रतिम सौंदर्य से भर गई; जैसे एक किरण उतरी स्वर्ग से और उसकी साधारण सी देह स्वर्णमंडित हो गई। पानी भर रही थी सरोवर से तपस्वी के लिए, अपने ही प्रतिबिंब को देखा, भरोसा न कर पाई--साधारण स्त्री न रही, अप्सरा हो गई; खुद के ही बिंब को देख कर मोहित हो गई! तपस्वी की सेवा उसने करनी जारी रखी।
फिर एक दिन तपस्वी ने आंख खोलीं। इस वनस्थली से जाने का समय आ गया--तपश्चर्या को और गहन करना है, पर्वत-शिखरों की यात्रा पर जाना है। उसने युवती से कहा कि मैं अब जाऊंगा, यहां मेरा कार्य पूरा हुआ। अब और भी कठिन मार्ग चुनना है, स्वर्ग को जीत कर ही रहना है।
युवती रोने लगी। उसकी आंख से आंसू गिरने लगे। उसने कहा, मैंने कौन सा दुष्कर्म किया कि मुझे अपनी सेवा से वंचित करते हो? और तो कुछ मैंने कभी मांगा नहीं!
तपस्वी ने सोचा, उस युवती के चेहरे की तरफ देखा। ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। स्वप्न में भी ऐसा सौंदर्य कभी देखा नहीं था। युवती पहचानी भी लगती थी और अपरिचित भी लगती थी। रूप-रेखा तो वही थी, लेकिन कुछ महिमा उतर आई थी। अंग-प्रत्यंग वही थे, लेकिन कोई स्वर्ण-आभा से घिर गए थे। जैसे कोई गीत की कड़ी, भूली-बिसरी, फिर किसी संगीतज्ञ ने बांसुरी में भर कर बजाई हो।
तपस्वी बैठ गया। उसने पुनः आंख बंद कर लीं। वह रुक गया।
उस रात युवती सो न सकी--विजय का उल्लास भी था और साधु को पतित करने का पश्चात्ताप भी। आनंदित थी कि जीत गई और दुखी थी कि किसी को भ्रष्ट किया, किसी के मार्ग में बाधा बन गई, और कोई जो ऊर्ध्वगमन के लिए निकला था, उसकी यात्रा को भ्रष्ट कर दिया। रात भर सो न सकी--रोई भी, हंसी भी। सुबह निर्णय लिया, आकर तपस्वी के चरणों में झुकी और कहा, मुझे जाना पड़ेगा, मेरा परिवार दूसरे गांव जा रहा है।
तपस्वी ने आशीर्वाद दिया कि जाओ, जहां भी रहो, खुश रहो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।
युवती चली गई। वर्ष बीते, तपस्या पूरी हुई। इंद्र उतरा, तपस्वी के चरणों में झुका और कहा, स्वर्ग के द्वार स्वागत के लिए खुले हैं।
तपस्वी ने आंखें खोलीं और कहा, स्वर्ग की अब मुझे कोई जरूरत नहीं!
इंद्र तो भरोसा भी न कर पाया कि कोई मनुष्य और कहेगा कि स्वर्ग की मुझे अब कोई जरूरत नहीं। इंद्र ने सोचा, तब क्या मोक्ष की आकांक्षा इस तपस्वी को पैदा हुई है। पूछा, क्या मोक्ष चाहिए?
तपस्वी ने कहा, नहीं, मोक्ष का भी मैं क्या करूंगा।
तब तो इंद्र चरणों में सिर रखने को ही था कि यह तो आत्यंतिक बात हो गई, तपश्चर्या का अंतिम चरण हो गया, जहां मोक्ष की आकांक्षा भी खो जाती है। पर झुकने के पहले उसने पूछा, मोक्ष के पार तो कुछ भी नहीं है, फिर तुम क्या चाहते हो?
उस तपस्वी ने कहा, कुछ भी नहीं, वह लकड़ियां बीनने वाली युवती कहां है, वही चाहिए।
हंसना मत; आदमी की ऐसी कमजोरी है। सोचना, हंसना मत; क्योंकि पृथ्वी का ऐसा प्रबल आकर्षण है। कहानी को कहानी समझ कर टाल मत देना, मनुष्य के मन की पूरी व्यथा है। और ऐसा मत सोचना कि ऐसा विकल्प उस तपस्वी के सामने ही था कि युवती थी, स्वर्ग था, दोनों के बीच चुनना था। तुम्हारे सामने भी विकल्प वही है; सभी के सामने विकल्प वही है--या तो उन सुखों को चुनो जो क्षणभंगुर हैं, या उसे चुनो जो शाश्वत है; या तो शाश्वत को गंवा दो क्षणभंगुर के लिए, या क्षणभंगुर को समर्पित कर दो शाश्वत के लिए।

संन्यासी और वेश्या


मैंने सुना है, एक संन्यासी मरा। जिस दिन मरा, उसी दिन एक वेश्या भी मरी; दोनों आमने-सामने रहते थे। देवदूत लेने आए, तो संन्यासी को नरक की तरफ ले जाने लगे और वेश्या को स्वर्ग की तरफ। संन्यासी ने कहा, रुको, कुछ भूल हो गई मालूम होती है! यह क्या उलटा हो रहा है? मुझ संन्यासी को नरक की तरफ, वेश्या को स्वर्ग की तरफ! जरूर संदेश में कहीं कोई भूल-चूक हो गई है। संसार का इतना बड़ा काम है, भूल-चूक हो सकती है। छोटी-मोटी सरकारें भूल करती हैं, तो पूरे विश्व की व्यवस्था में भूल हो जाना कुछ आश्चर्यजनक नहीं। तुम फिर से पता लगा कर आओ।
शक तो देवदूतों को भी हुआ। उन्होंने कहा, भूल कभी हुई तो नहीं; लेकिन मामला तो साफ दिखता है कि यह वेश्या है और तुम संन्यासी हो। वे गए। लेकिन ऊपर से खबर आई कि कोई भूल-चूक नहीं है; जो होना था, वही हुआ है। वेश्या को स्वर्ग ले आओ, संन्यासी को नरक में डाल दो। अगर ज्यादा जिद करे, तो उसे समझा देना कि कारण यह है।
जिद संन्यासी ने की, तो देवदूतों को कारण बताना पड़ा। कारण यह था कि संन्यासी रहता तो मंदिर में था, लेकिन सोचता सदा वेश्या की था; पूजा तो करता था, आरती तो उतारता था भगवान की, लेकिन मन में प्रतिमा वेश्या की होती थी। और जब वेश्या के घर में रात राग-रंग होता, बाजे बजते, नाच होता, कहकहे उठते, नशे में डूब कर लोग उन्मत्त होते, तो उसको ऐसा लगता कि मैंने अपना जीवन व्यर्थ ही गंवाया। आनंद वहां है, मैं यहां क्या कर रहा हूं--इस निर्जन में बैठा, इस खाली मंदिर में, यह पत्थर की मूर्ति के सामने! पता नहीं, भगवान है भी! शक पैदा होता। और रात जाग कर वह करवटें बदलता; और वेश्या को भोगने के सपने देखता।
और वेश्या की हालत ऐसी थी कि वह वेश्या थी--लोगों को रिझाती भी, नाचती भी--पर मन उसका मंदिर में लगा था। वह सदा यह सोचती--जब मंदिर की घंटियां बजतीं--तो वह सोचती कि कब मेरे इस भाग्य का उदय होगा कि मैं भी मंदिर में प्रवेश कर सकूंगी। मैं अभागी, मैंने अपना जीवन गंदगी में बिता दिया। अगले जन्म में, हे परमात्मा, मुझे मंदिर की पुजारिन बना देना! मुझे मंदिर की सीढ़ियों की धूल भी बना देगा तो भी चलेगा--उनके पैरों के नीचे पड़ी रहूं जो पूजा को आते हैं, उतना भी बहुत है। जब मंदिर में सुगंध उठती धूप की, तो वह आनंदमग्न हो जाती। वह कहती, यह भी क्या कम सौभाग्य है कि मैं मंदिर के निकट हूं! बहुत हैं, जो मंदिर से दूर हैं। माना कि पापिनी हूं; लेकिन जब भी पुजारी पूजा करता, तब भी वह आंख बंद करके बैठ जाती।
पुजारी वेश्या की सोचता, वेश्या पूजा की सोचती। पुजारी नरक चला गया, वेश्या स्वर्ग चली गई। 

जलालुद्दीन रूमी और कुआ खोदनेवाला किसान


बहुत बड़ा सूफी फकीर हुआ, जलालुद्दीन रूमी। वह अपने विद्यार्थियों को एक दिन पास के खेत में ले गया। उसने वहां जाकर उनको बताया--सारा खेत खराब हो गया था। वह जो खेत का मालिक था, उसने पहले कुआं खोदना शुरू किया एक। कोई पंद्रह-बीस फीट खोदा, फिर पाया कि जल नहीं मिलता, तो दूसरी जगह खोदना शुरू किया। पागल रहा होगा। दूसरी जगह भी खोदा, वहां भी नहीं मिला, तो उसने तीसरी जगह खोदना शुरू कर दिया। उसने आठ गङ्ढे खोद डाले, सारा खेत खराब हो गया। अब वह नौवां खोद रहा था।
जलालुद्दीन ने कहा, इस आदमी को देखो! अगर इसने यह सारा श्रम एक ही जगह लगाया होता, तो जल कितना ही दूर होता तो भी मिल गया होता। लेकिन यह दस-बीस फीट खोदता है और सोचता है कि जब इतने दूर तक नहीं मिला तो आगे कैसे मिलेगा! तो कहीं और खोदो, इस जगह जल नहीं है। फिर दस-बीस फीट खोदता है। ऐसे यह आठ गङ्ढे खोद चुका है। सब मिल कर एक सौ साठ फीट की खुदाई हो चुकी है और जल नहीं मिला! अगर एक सौ साठ फीट यह एक ही जगह खोद लेता, तो जल मिलना सुनिश्चित है।
तुम जीवन में बहुत बार खुदाई शुरू करोगे। कभी ध्यान शुरू कर देते हो, जोश आ जाता है; पंद्रह दिन, महीना चला, फिर शांत हो गए! फिर दो-चार साल बाद खयाल आया, फिर थोड़ी सी खुदाई की, फिर शांत हो गए! ऐसे तुम कई गङ्ढे खोद लोगे, लेकिन जल तक न पहुंचोगे; तुम्हारा खेत खराब हो जाएगा। 

छतावर हरवला उंट


इब्राहीम नावाचा एक राजा होता.
भयंकर घाबरट वृत्तीचा. अतिशय दु:खी असायचा. त्याला सतत भीती वाटायची. आपलं राज्य जाईल. आपल्याला कोणीतरी मारेल. त्याने राजवाड्यावर कडक पहारे लावले होते.
एके रात्री त्याला छपरावर खुडबुडीच्या आवाजाने जाग आली. त्याच्या शयनकक्षाच्या वरच खुडबुड होत होती. तो उठून पलंगाखाली लपला. तिथून त्याने चाचरत विचारलं, कोण आहे तिथे? काय करतोयस तिथे? शिपायांना बोलावू का?
वरून एक जरबदार आवाज उत्तरला, माझा ऊंट हरवलाय तो शोधतोय.
ऊंट? छपरावर?
राजाने बोंब ठोकली, अरे धावा धावा, छपरावर कोणीतरी वेडा चढलाय.
शिपाई धावले, छपरावर दडदड आवाज आला. शिपायांनी खूप प्रयत्न केला, पण, छपरावर ऊंट शोधायला चढलेला माणूस काही त्यांच्या हाती लागला नाही.
राजा भयंकर बेचैन झाला. हे नक्कीच आपल्याला मारायचं कारस्थान असणार. यात नक्कीच काहीतरी अपशकुन दडलेला असणार, असं त्याच्या मनाने घेतलं आणि तो आणखी चिंतित झाला.
दुसऱ्या दिवशी दुपारी महालाच्या मुख्य प्रवेशद्वारावर बरीच गडबड उसळल्याचं त्याच्या लक्षात आलं. त्याने शिपायाला बोलावून विचारलं.
शिपाई म्हणाला, बाहेर एक वेडा माणूस आलाय. तो म्हणतोय की या धर्मशाळेत मलाही राहायचंय. आम्ही त्याला सांगितलं, ही धर्मशाळा नाही, राजवाडा आहे, पण तो ऐकतच नाही. तुम्ही चिंता करू नका. आम्ही त्याला आता आमच्या पद्धतीने धर्मशाळा दाखवतो.
तेवढ्यात राजाच्या कानावरही तो ओरडा आला आणि त्यातला तो आवाज… ती जरब… काल रात्रीच ऐकलेली.
भूल पडल्यासारखा राजा शिपायाला म्हणाला, त्याला हुसकावू नका. इकडे घेऊन या.
शिपायांनी मुसक्या बांधून आणलेला माणूस एक फकीर होता. राजा त्याला म्हणाला, महाराज, तुम्ही तर चांगले परमज्ञानी फकीर दिसताय. तुम्हाला राजवाडा आणि धर्मशाळा यांच्यातला फरक समजू नये?
फकीर म्हणाला, तू कोण?
राजा म्हणाला, मी इब्राहीम. मी राजा आहे आणि या राजवाड्याचा मालक.
फकीर म्हणाला, मी याआधीही इथे आलो होतो. तेव्हाही तुझ्यासारखाच दिसणारा एक माणूस इथे मला भेटला होता. तो तर म्हणत होता की तो राजा आहे, हे त्याचं सिंहासन आहे आणि हा राजवाडा त्याच्या मालकीचा आहे!
राजा म्हणाला, म्हणजे तुम्ही माझ्या वडिलांना भेटला होतात. ते आधीचे राजे होते ना!
फकीर म्हणाला, पण, त्याआधीही मी आलो होतो. तेव्हा एक पार पिकलेला म्हातारा या राज्यावर आणि राजवाड्यावर मालकी सांगत होता.
राजा म्हणाला, तुम्ही माझ्या आजोबांना भेटले असणार.
फकीर म्हणाला, आता तूच मला सांग. इथे कोणी चार वर्षं राहतो आणि कोणी चाळीस वर्षं राहतो. पण, इथून प्रत्येकाला जावं तर लागतंच ना कधी ना कधी? मग ही धर्मशाळा नाही का?
इब्राहीमच्या डोक्यात लख्ख प्रकाश पडला आणि तो साधूच्या पायावर लोळण घेत म्हणाला, तुम्ही माझे गुरू. मला शिष्य म्हणून स्वीकारा. या धर्मशाळेत हवा तेवढा काळ राहा. नंतर एकत्रच निघू. फक्त मला एकच विचारायचंय. तुम्ही छपरावर ऊंट शोधत होतात, ते का?
फकीर म्हणाला, छपरावर कधी ऊंट हरवू शकत नाही, ते अशक्य आहे, हे तुला कळतं. पण, मग सिंहासनात, संपत्तीत, स्त्रीसहवासात सुख कसा काय शोधत फिरतोस तू? तेही सगळे छपरावरचे ऊंटच ना? सगळा आनंद, सगळं सुख हे तुझ्या आत आहे, तिथे शोध.
ओशो

फिर दूकान पर कौन है?


एक आदमी मर रहा था। उसने पूछा आंख खोल के कि मेरा बड़ा बेटा कहां है? पत्नी ने कहा वह तुम्हारे पास ही खड़ा है। तुम्हारे पैरों के पास। उससे छोटा कहां है? वह भी पास बैठा था। आदमी की आंखें धुंधली हो गयी हैं। सांझ हो रही है और मरने के वह करीब है। उसने टेक लगाकर उठने की कोशिश की, और कहा कि तीसरा बेटा कहां है? पत्नी ने कहा आप उठने की कोशिश मत करें, वह तुम्हारे बाएं बैठा है। हम सब यही मौजूद हैं। कोई कहीं नहीं है, सब यहीं मौजूद हैं।
वह बहुत घबड़ा गया। वह उठ कर बैठ गया, और उसने कहा कि इसका मतलब? फिर दूकान पर कौन है? वह मर रहा है! वह पूछ भी नहीं रहा है कि बेटे यहां मेरे पास हैं? वह असल में यह पूछ रहा है कि दूकान चल रही है? सब बंद करके तो नहीं आ गए हैं यहीं?
मरते क्षण भी दुकान ही ओंठ पर होगी। अगर सारे जीवन दूकान ओंठ पर रही, स्वाभाविक है

 नेताजींचे भाषण आणि शेतकऱ्यांच्या गायी...!

एक नेता भाषण द्यायला गेला, तर सभास्थळी एकच शेतकरी श्रोता उपस्थित होता. नेता म्हणाला, भाषण देऊ की नको.
श्रोता म्हणाला,  “मी एक शेतकरी आहे. मी जेव्हा २० गायींना चारा टाकण्यासाठी जातो. पण, तिथे फक्त एकच गाय असते, तेव्हा मी तिला चारा न टाकता परत येत नाही. एक असली तरी तिला चारा टाकतोच.”
श्रोत्याच्या उत्तराने प्रभावित झालेला नेता तासभर धुव्वाधार भाषण देतो. भाषण संपल्यानंतर श्रोत्याला विचारतो, “कसे झाले भाषण?”
श्रोता म्हणतो, “छान. पण मला जेव्हा २० गायींच्या ऐवजी एकच गाय मिळते, तेव्हा त्या एकाच गायीला सर्व २० गायींचा चारा खाऊ घालत नसतात, हे मी जाणतो. २० गायींचा चारा तुम्ही मला एकट्यालाच खाऊ घातला.”

 शिकारी नसिरुद्दीन


मुल्ला नसिरुद्दीन आपल्या मुलाला शिकारीला घेऊन गेला. आपण किती पक्के निशाणेबाज आहोत, याच्या बढाया मारत असतो. आकाशात जाणाऱ्या बगळ्यांच्या एका थव्यावर तो निशाणा साधतो आणि गोळी झाडतो. पण, नेम चुकतो आणि बगळे पूर्वीसारखेच सुखेनैव उडत राहतात.
मुलगा हसायला लागतो.
मुल्ला म्हणतो, काय कमालीचे बगळे आहेत. गोळी लागल्यानंतरही उडतच आहेत.

 

 

 


 

अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार ।

अब हम सांची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार ।
छुटि जैहो या दुक्ख ते, तन सरवर के पार ।।

अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार
सुनते हो यह वचन! अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार।... पंख खोलो और उहो! पंख तुम्हारे पास हैं। तुम भूल ही गए हो कि तुम्हारे पास पंख हैं। तुम्हें याद ही नहीं रही पंखों की। रहे भी कैसे। जन्मों—जन्मों से उड़े नहीं, खुले आकाश में पंख फैलाए नहीं। कारागृहों में रहने के आदी हो गए हो। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, शुद्र, ब्राह्मण... न मालूम कितने कारागृहों के भीतर तुम रहने के आदी हो गए हो! पंख फड़फड़ाने की भी जगह नहीं है। सींकचे ही सींकचे हैं। और धीरे— धीरे तुम भूल गए हो। भूलना ही पड़ा है। नहीं तो अहंकार को बड़ी चोट लगती है कि मैं कारागह में पड़ा हूं! अहंकार के लिए यही सुविधापूर्ण है कि पंख ही नहीं हैं मेरे पास, मैं उडूं भी तो कैसे उडूं।
और तुम बातें भी करते रहते हो कि मैं उड़ना चाहता हूं। तुम मुक्ति की चर्चा भी चलाते हो। वह भी धोखा है, वह सिर्फ बातचीत है। वह असलियत से बचने का उपाय है।
इसलिए कहते हैं धनी धरमदास : अब हम सांची कहत है। धनी धरमदास कहते हैं कि तुम्हें भली लगे चाहे बुरी लगे, अब हम सांची ही कह रहे हैं कि पंख तुम्हारे पास हैं। पूछो मत कि हमारे पास पंख कैसे उग आएं पंख तुम्हारे पास हैं। आकाश मौजूद है। पैर तुम्हारे पास हैं। सुबह हो गई। आंख तुम्हारे पास है, खोलो तो प्रकाश है। परमात्मा एक क्षण को दूर नहीं है, पीठ किए खड़े हो। अब हम सांची कहते हैं।
सांची बात ठीक नहीं लगती। आदमी चाहता है कुछ ऐसी बात कहो जिससे मैं यह समझ पाऊं कि जो मुझसे भूल हुई, होनी ही थी, मजबूरी थी। अब भी हो रही है तो आवश्यक है, अनिवार्य है। कहावतें लोगों ने बना ली हैं।’’ टू इर इस ह्युमन '' भूल करना आदमी का स्वभाव है। इससे राहत मिलती है। तो हमसे भूल हो रही है, तो बिल्कुल स्वभाव हो रहा है, स्वाभाविक हो रहा है।
जब भी कोई तुमसे सांची बात कहेगा, चोट लगेगी। सांच में आंच है। जलाएगी आंच, भभकाएगी अग्नि तुम्हारे भीतर। झूठे आदमी अच्छे लगते हैं। क्योंकि झूठे आदमी तुम जैसे हो वैसे ही रहो, इसका तुम्हें आश्वासन देते हैं। वे कहते हैं, तुम बिल्कुल भले हो। वे तुम्हें सांत्वना देते हैं। झूठे आदमी लौरी गाते हैं तुम्हारे आसपास। वे तुम्हारी नींद को और गहरा करवाते हैं। वे कहते हैं: भइया, करवट बदल लो, और कम्बल हम ओढ़ाए देते हैं। और अभी तो बड़ा अंधेरा है, मजे से सोओ।
तुम उनके पास जाते हो जो तुम्हें सोने की विधियां देते हैं, जो तुम्हें नींद के उपाय बताते हैं। जो तुमसे कहते हैं कि अच्छे सपने कैसे देखो। हजारों किताबें लिखी जाती है इस संबंध में। डेल कारनेगी की बड़ी प्रसिद्ध किताबें हैं— '' हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्‍फ्लूएंस पीपल ''। मित्रता कैसे बढ़े, लोग कैसे जीते जाएं।’’ अभी अपने को जीता नहीं है, लोगों को जीतने चले! मगर लोग पढ़ते हैं। कहते हैं बाइबिल के बाद सबसे ज्यादा दुनिया में जो किताब बिकी है, वह यही है— डेल कारनेगी की किताब। बाइबिल के बाद! मतलब साफ है कि बाइबिल से ज्यादा बिक गई, क्योंकि बाइबिल खरीदता कौन है, मुफ्त बांटी जाती है। लोग बांटते ही रहते हैं बाइबिल। फिर हर ईसाई को रखनी ही पड़ती है घर में। न तो कोई कभी पढ़ता है, न कोई कभी पन्ने उलटता है। कौन पढ़ता है।
एक छोटे बच्चे से उसके पादरी ने पूछा कि तुमने अपना पाठ पूरा किया। बाइबिल पढ़ कर आए हो। क्या है बाइबिल में।
उस बच्चे ने कहा : सब मुझे मालूम है कि बाइबिल में क्या है।
उस पादरी ने कहा : सब तुम्हें मालूम है! सब तो मुझे भी नहीं मालूम।
क्या तुम्हें मालूम है।
उसने कहा कि मेरे पिताजी की लाटरी की टिकट है उसमें। मेरे छोटे भाई के बालों का गुच्छा है उसमें। मेरी मां ने एक ताबीज भी रखा हुआ है उसमें किसी हिमालय के आए हुए महात्मा ने दिया है। मुझे सब चीजें पता हैं कि उसमें क्या— क्या है।
कौन बाइबिल को देखता है! कौन बाइबिल को पढ़ता है! कौन खरीदता है! इस तरह की किताबें बिकती हैं: '' जीवन में सफल कैसे हों। सम्मान कैसे पाएं। धन कैसे पाएं। नेपोलियन हिल की प्रसिद्ध किताब है : '' हाउ टू ग्रो रिच ''। लाखों प्रतियां बिकी हैं।
ये सारे के सारे लोग तुम्हें विधियां दे रहे हैं कि और गहरी नींद कैसे सोओ, और मजे से कैसे सोओ, सेज फूलों की कैसे बने, सपने मधुर कैसे आएं, सपने रंगीन और टेक्नीकलर कैसे हों। अब ब्लैक और व्हाईट सपने बहुत देख चुके, अब सपनों में थोड़ा रंग डालो! थोड़े सपनों की कुशलता और कला सीखो। ये लौरिया गाने वाले लोग हैं।
इसलिए धनी धरमदास कहते हैं : अब हम सांची कहत हैं। अब तुम्हें भला लगे या बुरा, हम सच बात ही कह देते हैं कि तुम चाहो तो इसी वक्त, इसी क्षण उडियो पंख पसार। पंख तुम्हारे पास हैं। कारागृह किसी और की बनाई हुई नहीं है! तुम्हारी अपनी बनायी हुई है। कोई पहरेदार नहीं है। तुम्हीं कैदी हो, और तुम्हीं पहरेदार हो। तुम जब तक अपने को गुलाम रखना चाहते हो रहोगे। जब तक अंधे रहना चाहते हो, रहोगे। जिस दिन निर्णय करोगे कि अब नहीं अंधे रहना है, उसी क्षण क्रांति शुरू हो जाएगी। सिर्फ तुम्हारे निर्णय की देर है। सिर्फ तुम्हारे संकल्प के जगने की देर है। और किसी चीज की कमी नहीं है।

अब हम सांची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार ।
छुटि जैहो या दुक्ख ते, तन सरवर के पार ।।
और अगर उड़ सको, पंख फैला सको, अगर उसके आकाश को स्वीकार कर सको, अगर उसमें लचपच हो सको, अगर उसके रंग में पूरे सौ प्रतिशत रंगने का साहस हो, तो छुटि जैहो या दुःख ते... तो सारे दुःखों से मुक्त हो जाओगे।... तन सरवर के पार। तन के पार, सीमाओं के पार, देह के पार, मिट्टी के पार, मृण्मय के पार——चिमय की उपलब्धि हो जाएगी!

( Source : का सोवै दिन रैन--(प्रवचन--11)

 

Tuesday, 15 July 2025

सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते

मैंने सुना है कि एक बहुत अनूठा संन्यासी, बोधिधर्म, जब चीन गया बुद्ध का संदेश लेकर, तो सम्राट वू ने उससे पूछा कि संक्षिप्त में मुझे बता दें, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है--तुम देख ही रहे हो कि साम्राज्य बड़ा है और मैं ज्यादा सत्संग नहीं कर सकता--मुझे संक्षिप्त में बता दो कि जीवन की सबसे बहुमूल्य बात क्या है? सबसे बड़ा सौभाग्य क्या है?
बोधिधर्म ने कहा, तुम समझ न पाओगे। सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते।
वू थोड़ा चौंका--यह कोई सौभाग्य की बात कर रहा है आदमी कि तुम पैदा ही न होते! पर निश्चित ही बोधिधर्म सौभाग्य की ही बात कर रहा है। बुद्धों की यही तो आकांक्षा है कि पैदा न होते।
पर, बोधिधर्म ने कहा, वह बात तो हो नहीं सकती--खतम। तुम हो ही गए पैदा। वह तो नंबर एक का सौभाग्य है। इसलिए नंबर दो की कहता हूं कि जितने जल्दी मर जाओ।
कहते हैं, वू फिर कभी मिलने नहीं आया बोधिधर्म को--कि यह भी कोई ज्ञानी है! लेकिन मैं भी तुमसे कहता हूं, नंबर एक का सौभाग्य कि तुम पैदा न हुए होते। लेकिन उस पर तो अब कोई बस नहीं, हो ही गए। तो अब दूसरा सौभाग्य है कि तुम जीते जी मर जाओ; जीवन से तुम्हारा राग-रंग छूट जाए। यह जीते जी मरने का अर्थ है: तुम ऐसे जीने लगो, जैसे तुम हो ही नहीं। बैठो बाजार में, क्योंकि कहीं तो बैठोगे ही; लेकिन ऐसे जैसे हो ही नहीं। पालो पत्नी-बच्चों को, पालना ही पड़ेगा; लेकिन ऐसे जैसे तुम हो ही नहीं। तुम अनुपस्थित हो जाओ। और जल्दी ही तुम पाओगे कि तुम्हारी अनुपस्थिति रिक्त नहीं रही, परमात्मा उसमें धीरे-धीरे उतर आया है।

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।

स्रोत : भज गोविंद मूढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--01



३११. मरणाही आधी राहिलों मरोनी । मग केलें मनीं होतें तैसें ॥ १ ॥ 

४०२८. तुका म्हणे देह वाहिला विठ्ठलीं । तेव्हांच घडली सर्व पूजा ॥ ५ ॥
४०३२. सुखा आणि दुःखा । म्हणे वेगळा मी तुका ॥ ४ ॥
४०३३. आम्ही मेलों तेव्हां देह दिला देवा । आतां करूं सेवा कोणाची मी ॥ १ ॥ 

४०३४. आपुलें मरण पाहिलें म्यां डोळां । तो झाला सोहळा अनुपम्य ॥ १ ॥ आनंदें दाटलीं तिन्ही त्रिभुवनें । सर्वात्मकपणें भोग झाला ॥ २ ॥ एकदेशी होतों अहंकारें आथिला । त्याच्या त्यागें झाला सुकाळ हा ॥ ३ ॥
 

४०३५. मरण माझें मरोन गेलें । मज केलें अमर ॥ १ ॥ ठाव पुसिलें बुड पुसिलें । वोस वोसलें देहभाव ॥ २ ॥
४०३७. हातीं घेऊनियां काठीं । तुका लागला कलेवरा पाठी ॥ १ ॥ नेऊनि निजविलें स्मशानीं । माणसें जाळी तें ठिकाणीं ॥ २ ॥


४०३३. तुका म्हणे तुम्ही आइका हो मात । आम्ही या अतीत देहाहूनी ॥ ५ ॥
४०३३. बोलतसें जैसें बोलवितो देव । मज हा संदेह कासयाचा ॥ ३ ॥ पाप पुण्य ज्याचें तोचि जाणे कांहीं । संबंध हा नाहीं आम्हांसवें ॥ ४ ॥

४०३९. जाला प्रेतरूप शरीराचा भाव । लक्षियेला ठाव स्मशानींचा ॥ १ ॥ रडती रात्रंदिवस कामक्रोधमाया । म्हणती हायहाय यमधर्म ॥ २ ॥ वैराग्याच्या शेणी लागल्या शरीरा । ज्ञानाग्नि लागला ब्रह्मत्वेंसी ॥ ३ ॥ फिरविला घट फोडिला चरणीं । महावाक्य ध्वनि बोंब झाली ॥ ४ ॥ दिली तिळांजुळी कुळनामरूपासी । शरीर ज्याचें त्यासी समर्पिलें ॥ ५ ॥ तुका म्हणे रक्षा झाली आपोआप । उजळला दीप गुरुकृपा ॥ ६ ॥

Saturday, 12 July 2025

आनंद बंटना चाहता है, दुख सिकुड़ना चाहता है

जीसस क्राइस्ट यात्रा पर थे। जो उन्हें मिला था उसे लुटाने की यात्रा पर थे। और आनंद का स्वभाव है कि वह मिल जाए तो उसे लुटाना अनिवार्य हो जाता है। दुख मनुष्य को सिकोड़ता है और आनंद मनुष्य को फैला देता है। दुख में मनुष्य चाहता है, मैं अपने में बंद हो जाऊं; और आनंद में मनुष्य चाहता है, मैं सब तक पहुंच जाऊं और सब तक फैल जाऊं। इसीलिए आनंद को ब्रह्म कहा है। दुख अहंकार की अंतिम सीमा है; आनंद निर-अहंकारिता की, ब्रह्म होने की। 

शायद आपने खयाल किया हो, महावीर और बुद्ध या क्राइस्ट जब दुख में हैं, तब वे जंगल में भाग गए हैं; और जब उन्हें आनंद उपलब्ध हुआ है, वे बस्ती में वापस लौट आए हैं। आनंद बंटना चाहता है, दुख सिकुड़ना चाहता है। दुख अपने में बंद होना चाहता है, आनंद दूसरे तक फैलना चाहता है।

क्राइस्ट को जब आनंद उपलब्ध हुआ, वे उसे बांटने की यात्रा पर निकल गए। वे एक गांव में पहुंचे। सुबह-सुबह ही उस गांव को वे पार करते थे--एक झील के किनारे उन्होंने एक मछुए को मछली मारते देखा। उसने अपना जाल फेंका था और मछलियों की प्रतीक्षा करता था। उसे पता भी नहीं था कि पीछे से कौन गुजरता है। क्राइस्ट ने जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा और उससे कहा, मित्र, मेरी ओर देखो! कब तक मछलियां ही मारते रहोगे? 

और जो क्राइस्ट ने उससे कहा, मैं हरेक आदमी के कंधे पर हाथ रख कर मेरा भी मन होता है कि पूछूं कि कब तक मछलियां ही मारते रहोगे?इससे क्या फर्क पड़ता है कि रोटियां मार रहे हैं या मछलियां मार रहे हैं! सब मछलियां मारना है। जीवन अधिक लोगों का मछलियां मारने में ही नष्ट हो जाता है। 


क्राइस्ट ने उससे पूछा कि कब तक मछलियां मारते रहोगे? 

उसने लौट कर देखा, एक झील सामने थी और पीछे इस आदमी की आंखें थीं जो झील से भी ज्यादा गहरी थीं। उसने सोचा कि अब इस जाल को वहीं फेंक दूं और इन आंखों में एक जाल को फेंकूं। उसने जाल वहीं फेंक दिया और क्राइस्ट के पीछे हो लिया। उसने कहा, मैं साथ चलता हूं। अगर कुछ और पकड़ा जा सकता है, उसे पकड़ने को मैं तैयार हूं। यह जाल यहीं फेंक दिया, ये मछलियां यहीं छोड़ दीं। 

जिसे धर्म की खोज करनी हो, उसे इतना साहस होना चाहिए कि समय पड़े तो जाल को और मछलियों को फेंक दे।

वह क्राइस्ट के पीछे गया। वे गांव के बाहर भी नहीं निकल पाए, एक आदमी ने आकर उस मछुए को खबर दी कि तुम कहां जा रहे हो? तुम्हारे पिता जो बीमार थे, उनकी रात्रि में मृत्यु हो गई। अभी-अभी वे समाप्त हो गए हैं। लौटो, हम तुम्हें खोजते हुए सब तरफ घूम आए हैं! 

वह युवा मछुआ क्राइस्ट से बोला, क्षमा करें, मैं जाऊं और अपने पिता का अंतिम संस्कार करके दो-चार दिन में वापस लौट आऊंगा। 

क्राइस्ट ने उसका हाथ पकड़ा और उससे कहा, तुम तो मेरे पीछे आओ। एंड लेट दि डेड बरी देयर डेड। और वे जो गांव के मुर्दे हैं, वे मुर्दे को दफना लेंगे। तुम मेरे पीछे आओ। क्राइस्ट ने कहा, वे जो गांव में बहुत मुर्दे हैं, वे मुर्दे को दफना लेंगे। तुम्हें जाने की कौन सी जरूरत है? 

बहुत ही अजीब बात उन्होंने कही और बहुत अर्थपूर्ण भी। निश्चित ही जिन्हें अभी जीवन का पता नहीं है, वे मृत ही हैं। और हमें जीवन का कोई भी पता नहीं है। जिसे हम जीवन कहते हैं, वह तो क्रमिक मृत्यु का ही नाम है। वह वस्तुतः जीवन नहीं है। हम जिस दिन पैदा होते हैं और जिस दिन हम मर जाते हैं, इन दोनों के बीच में जो फैला हुआ है, वह जीवन नहीं है, वह तो धीमे-धीमे मरते जाने का नाम है। हम रोज मरते जा रहे हैं। जिसे हम जीवन कह रहे हैं, वह रोज मरते जाना है। वह ग्रेजुअल डेथ है। 

अमृत की दशा

-ओशो

बोलावें तें आम्ही आतां अबोलणें । एकाचि वचनें सकळासि ॥

एक गांव में एक अपरिचित फकीर का आगमन हुआ था। उस गांव के लोगों ने शुक्रवार के दिन, जो उनके धर्म का दिन था, उस फकीर को मस्जिद में बोलने के लिए ...