Monday, 11 August 2025

मोहम्मद कहा करते थे : तुम एक कदम चलो उसकी तरफ, वह हजार कदम चलता है।

कृष्ण भोजन को बैठे, रुक्मिणी ने थाली लगाई। एक कौर लिया होगा मुश्किल से कि हड़बड़ा कर भागे। रुक्मिणी समझ न पाई। लेकिन द्वार तक गए, वापस लौट आए; फिर बैठ गए थाली पर। रुक्मिणी ने कहा, बेबूझ हो गई बात। किसलिए भागे? और फिर क्यों द्वार से वापस लौट आए? भागे तो ऐसे जैसे कहीं आग लग गई हो--कि अब भोजन कैसे किया जा सकता है, आग पहले बुझानी होगी। और लौट आए ऐसे जैसे कुछ भी न हुआ था। यह क्या किया?
कृष्ण ने कहा, जरूर आग लग गई थी; भागा। लेकिन द्वार तक पहुंचा कि आग बुझ गई, लौट आया। मेरा एक भक्त एक राजधानी की सड़क से गुजर रहा है, लोग उस पर पत्थर फेंक रहे हैं, लहू बह रहा है उसके माथे से और वह गोविन्द-गोविन्द किए जा रहा है। वह न तो उत्तर दे रहा है, न बचाव कर रहा है; उसने अपने को बिलकुल मेरे हाथों में छोड़ दिया। भागना एकदम अनिवार्य था।
जो इस भांति असहाय हो जाए, भगवान को उसकी तरफ भागना ही पड़ता है। जो इतना शून्य हो जाए कि पत्थर पड़ रहे हैं, उनसे बचाव भी न करे, भागे भी न, उत्तर भी न दे, तो सारा अस्तित्व उसकी रक्षा के लिए आ जाता है। गङ्ढा हो गया; चारों तरफ से जलधार बहने लगती है--उसे भरने को, उसे झील बनाने को।
फिर, रुक्मिणी ने पूछा, लौट क्यों आए?
कृष्ण ने कहा, लेकिन जब तक मैं द्वार पर पहुंचा, उसने अपना चित्त ही बदल लिया; उसने खुद ही पत्थर हाथ में उठा लिया; अब वह खुद ही जवाब दे रहा है, मेरी कोई जरूरत न रही।
परमात्मा की जरूरत वहीं है, जहां तुम असहाय हो। और तुम्हारी असहाय अवस्था से गोविन्द-गोविन्द का नाम निकल जाए, भजन हो गया। कोई शब्द कहने की जरूरत नहीं कि तुम गोविन्द-गोविन्द चिल्लाओ। भीतर भाव--कि वे भाव भरी आंखें आकाश की तरफ उठ जाएं, कि तुम्हारा हृदय आकाश की तरफ खुल जाए--और तुम अपने तईं कुछ भी न करो; उसी क्षण परमात्मा तुम्हारी तरफ दौड़ पड़ता है। तुम गङ्ढे बनो, परमात्मा भरने को सदा राजी है।
 

मोहम्मद कहा करते थे: तुम एक कदम चलो उसकी तरफ, वह हजार कदम चलता है।
पर तुम एक कदम ही नहीं चलते। और वह एक कदम अत्यंत जरूरी है। क्योंकि जब तक तुम्हारी तरफ से संकेत न मिले कि निमंत्रण है, तब तक परमात्मा कैसे आए? आना भी चाहे तो कैसे आए? जिसे तुमने निमंत्रण ही नहीं दिया है, जिसे तुमने बुलावा ही नहीं भेजा है, वह आ भी जाए तुम्हारे द्वार पर, तो तुम्हारे द्वार खुले न पाएगा। वह दस्तक भी दे, तो तुम समझोगे हवा का झोंका है। वह चिल्लाए, पुकारे भी, तो तुम अपने भीतर के शोरगुल के कारण उसकी आवाज न सुन पाओगे।

भज गोविंद मूढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--01 


 

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