संन्यासी और गृहस्थ में फर्क
इतना ही फर्क है संन्यासी में और गृहस्थ में। गृहस्थ दुख से छूटना चाहता है और सुख को पकड़ना चाहता है; संन्यासी समझ लिया कि हर सुख के पीछे दुख है। वह अब दुख से ही नहीं छूटना चाहता, सुख से भी छूटना चाहता है।
और जो दोनों से छूटना चाहता है, वह छूट सकता है; जो एक से छूटना चाहता है, वह नहीं छूट सकता। यह तो ऐसे ही है जैसे कि तुम्हारे हाथ में एक सिक्का है और तुम उसके एक पहलू से छूटना चाहते हो और दूसरे पहलू को बचाना चाहते हो। तुम जो बचाओगे, उसमें पूरा सिक्का बच जाएगा। या तो पूरा बचेगा या पूरा छोड़ना पड़ेगा। या तो सुख-दुख दोनों जाएंगे या सुख-दुख दोनों रहेंगे। ऐसी स्पष्टता जब तुम्हारे जीवन में फलित हो जाएगी--तो वैराग्य; तो संन्यास।
मंदिर कौन पहुंच सकता हैं?
मंदिर कोई स्थान थोड़े ही है, भाव-दशा है। जब तक मांग है, तब तक कैसा मंदिर! जब तक क्षुद्र वस्तुएं जो बाजार में बिक रही हैं, उन्हीं को मांगने तुम परमात्मा के पास जाते हो, तो तुम शायद समझते हो कि परमात्मा कोई सुपर मार्केट है; छोटी-मोटी दुकानों में चीजें नहीं मिलीं, चलो मंदिर में मिल जाएंगी! संसार में नहीं मिलीं तो मोक्ष में मिल जाएंगी! लेकिन तुम मांगते क्या हो?
मंदिर वही पहुंचता है, जिसने समझ लिया कि मांगना व्यर्थ है; जिसने समझ लिया कि मांगने से मिलता ही नहीं कुछ सिवाय दुख के; जिसने समझ लिया कि कितनी ही चेष्टा करो, भिखमंगे का पात्र खाली ही रह जाता है, भरता नहीं।
मंदिर वही पहुंचता है जो धन्यवाद देने जाता है, मांगने नहीं। जिस दिन तुम्हारे भीतर से अहर्निश धन्यवाद उठने लगे--फूल खिलें और तुम्हारे भीतर से धन्यवाद उठे, आकाश से बादल बरसें और तुम्हारे भीतर धन्यवाद उठे, एक बच्चा किलकारी मारे और तुम्हारे भीतर धन्यवाद उठे, तुम श्वास लो और तुम्हारा होना ही इतना शांति का हो कि धन्यवाद उठे।
कच्चा फल और पका फल
मैं संसार से तुम्हें तोड़ना नहीं चाहता; मैं संसार से तुम्हें मुक्त करना चाहता हूं, तोड़ना नहीं चाहता। और तोड़ना और मुक्त होना, बड़ी अलग बातें हैं।
तोड़ना ऐसा है जैसे कच्चे फल को तोड़ो; और मुक्त होना ऐसा है जैसे पका फल गिर जाए। ..... दोनों में बड़ा मौलिक अंतर है। कच्चे फल को तोड़ते हो--फल में भी टीस रह जाती है और वृक्ष में भी घाव छूट जाता है। पका फल तोड़ने की जरूरत ही नहीं होती--पका फल अपने से गिरता है, सहजता से गिरता है; न तो टीस रहती कोई, न पीछे वृक्ष की याद आती कि थोड़ी देर और रह जाते वृक्ष के साथ। पक ही गया, बात ही समाप्त हो गई; वृक्ष का काम पूरा हो गया। और न वृक्ष में कोई पीड़ा रह जाती। पका फल वृक्ष को पूरी तरह भूल जाता है, पीछे लौट कर नहीं देखता। और वृक्ष भी पके फल के गिरने पर निर्भार हो जाता है, घाव नहीं छूटता।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः
उपनिषदों का महावचन है: तेन त्यक्तेन भुंजीथाः।
इससे ज्यादा क्रांतिकारी वचन मुझे दुनिया के किसी शास्त्र में नहीं मिला। यह वचन बड़ा अनूठा है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं।
तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। जिन्होंने त्यागा, उन्होंने ही केवल भोगा। एक अर्थ।
दूसरा अर्थ: तेन त्यक्तेन भुंजीथाः। जिन्होंने भोगा, उन्होंने ही त्यागा।
और दोनों ही अर्थ बड़े बहुमूल्य और कीमती हैं। और दोनों अर्थ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते
आप अपना ही खंडन नहीं कर सकते। पीछे का दरवाजा या बाहर का दरवाजा, आप यह नहीं कह सकते कि मैं नहीं हूं। कोई तुम्हारे द्वार पर दस्तक दे, तुम यह नहीं कह सकते कि मैं घर पर नहीं हूं। इसका क्या मतलब होगा? इसका सिर्फ इतना मतलब होगा कि तुम हो; क्योंकि इनकार करने के लिए भी तुम्हारी जरूरत पड़ जाएगी।