नेपोलियन और घसियारिन
मरते वक्त नेपोलियन हार चुका था युद्ध में और एक छोटे से द्वीप सेंट हैलेना में उसको बंद कर दिया गया था। अब नेपोलियन उन थोड़े से लोगों में से था, जिन्होंने सारी जमीन को हिला दिया। जिन्होंने पहाड़ों से कहा–हट जाओ! तो पहाड़ों को हट जाना पड़ा। जिन्होंने कौमों से कहा–मिट जाओ! तो कौमों को मिट जाना पड़ा। उन थोड़े से लोगों में एक था। आखिरी वक्त हार गया और हैलेना में बंद कर दिया गया। पहले ही दिन सुबह उठ कर वह घूमने निकला, एक छोटी सी पगडंडी पर। उसका मित्र, उसका डाक्टर उसके साथ था। छोटी थी, संकरी थी पगडंडी। उस तरफ से एक घास लेने वाली औरत घास का गट्ठा सिर पर लिए हुए आती थी। नेपोलियन के डाक्टर मित्र ने चिल्ला कर कहाः घसियारिन, रास्ता छोड़ दे! देखती नहीं कौन रास्ते पर आ रहा है?
लेकिन नेपोलियन ने कहाः मेरे मित्र, तुम भूल करते हो। रास्ता हमें छोड़ देना चाहिए। अब नेपोलियन कहां है! अब मैं कौन हूं! एक कैदी से ज्यादा नहीं।
और नेपोलियन छोड़ कर रास्ता खड़ा हो गया और उसने कहाः घासवाली को निकल जाने दो, वह कुछ है, मैं तो अब कुछ भी नहीं हूं। मैं नेपोलियन था कल तक और मैंने पहाड़ों से कहा होता–रास्ते से हट जाओ, तो पहाड़ हट गए होते। लेकिन आज, आज मैं क्या हूं! एक घासवाली फिर भी कुछ है, मैं तो कुछ भी नहीं, ना-कुछ, नोबडी। मुझे हट जाने दो।
वह नेपोलियन हट गया। यह नेपोलियन कल तक सब कुछ था, आज ना-कुछ कैसे हो गया? क्या छिन गया इसके पास से? इसके वस्त्र छिन गए, इसके कपड़े छिन गए, इसकी कुर्सी छिन गई, अब यह ना-कुछ है।
नेपोलियन ने कैद मे रहते कपडे नही बदले
नेपोलियन जब हार गया तो उसे सेंट हेलेना के द्वीप में बंद कर दिया गया। हारे नेपोलियन की बड़ी दुर्दशा होती है। जीत थी तो वह संसार का मालिक था, हार गया तो दो कौड़ी का हो गया। लेकिन फिर भी, जैसे रस्सी जल जाती है और अकड़ रह जाती है; रस्सी तो जल गई, लेकिन मरते दम तक नेपोलियन ने कपड़े न बदले। सड़ गए, गंदे हो गए; फट गए। बहुत बार कहा गया कि नये कपड़े आपके लिए उपलब्ध हैं, आप पहन लें। उसने कहा कि नहीं। मरते वक्त उसने अपनी डायरी में लिखा है कि ये कपड़ों की बात ही और, ये सम्राट के कपड़े हैं। और तुम कितने ही ताजे और नये कपड़े ले आओ, वे एक कैदी के कपड़े होंगे।
राख हो गई सब, लेकिन अकड़ बाकी है। अभी भी वह चलता है तो उसी अकड़ से। फटे हैं कपड़े, पुराने हैं कपड़े, जराजीर्ण हो गए, लेकिन वह अब भी अपने को सोच रहा है कि सम्राट है। मरते समय उसने लिखा है कि मान लिया कि मैं अब सम्राट नहीं हूं, लेकिन इसे तो कोई भी इनकार न करेगा कि मैं एक हारा हुआ सम्राट हूं। हारा हुआ हूं माना, मगर हूं तो सम्राट ही। मगर हारे हुए सम्राट का क्या मतलब होता है?
आदमी जितना भीतर अभाव अनुभव करता है हीनता का, हीनता का कीड़ा जितना भीतर काटता है, उतने ही बाहर उपाय करता है कि कैसे उसे ढांक ले। बाहर रोशनियां जलाता है ताकि भीतर का अंधेरा न दिखाई पड़े। भीतर तो हर कोई जानता है कि मैं ना-कुछ हूं, इसलिए दूसरों पर अकड़ जताता है। और ध्यान रखना, जितना ही कोई अकड़ जताए दूसरों पर उतना ही छोटा आदमी भीतर छिपा है। बड़े आदमी की तो अकड़ होती ही नहीं। बड़ा आदमी तो ऐसा होता है जैसे हो ही न। महानता शून्यता है। और जब तुम कहीं भी उस शून्यता को देखते हो तब अचानक तुम्हारा सिर झुक जाता है। तब तुम किसी को सिर पर रख लेना चाहते हो।
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