एक महान चीनी संत, च्वांग्त्जु (Zhuang Zhou, romanization as Chuang Tzu) के बारे में एक सुन्दर कथा है। एक सुबह अपने बिस्तर पर बैठा वह बहुत उदास दिख रहा था। उसके शिष्यों ने उसे कभी इतना उदास नहीं देखा था। और सुबह उठने के बाद कभी भी अपने बिस्तर पर नहीं रुका था। क्या हुआ था? क्या वह बीमार था?
वे सब उसके पास गए और पूछा, "गुरुदेव, मामला क्या है?" उसने कहा, "मामला बड़ा जटिल है, मैं इसे सुलझा नहीं पा रहा; हो सकता है तुम लोग मेरी कुछ मदद कर सको। मैं तुम्हे बताता हूं कि मामला क्या है। रात मैंने सपने में देखा कि मैं एक तितली बन गया हूं, एक फूल से दुसरे फूल पर मंडरा रहा हूं।"
शिष्य बोले, "इसमें उदास होने जैसी तो कोई बात नहीं है। सपने में तो हम सभी अजीब हरकतें करते हैं; और यह तो फिर भी कुछ बुरा नहीं है, तितलि बन जाना--रंग-बिरंगी, खूबसूरत, एक रसदार फूल से दुसरे रसदार फूल पर मंडराती हुई। आप क्यों इतने चिंतित हैं?"
उसने कहा, "पूरी बात तो तुमने सुनी नहीं। समस्या यह है, कि अब मैं जाग गया हूं और यह सोच रहा हूं कि क्या च्वांग्त्जु ने सपना देखा कि वह तितली है या फिर अब तितली सोने चली गई है और सपना देख रही है कि वह च्वांग्त्जु है।"
दोनों बाते हो सकती हैं। यदि च्वांग्त्जु सपना देख सकता है कि वह एक तितली है, तब तितली क्यों सपना नहीं देख सकती कि वह च्वांग्त्जु है? शिष्य चुप रह गए; इसका कोई जवाब नहीं था। च्वांग्त्जु उस खास बात की तरफ इशारा कर रहा था जो कि सभी धर्म आज तक सिखाते आएं हैं-- कि सब कुछ सपना है। तितली एक सपना है, च्वांग्त्ज़ु एक सपना है। तब यथार्थ क्या है? यथार्थ बहुत दूर है। और इस सपने में विचलित ना हों। चाहें तुम ऊंट हो या गधे या बन्दर--इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। जो बात अर्थ रखती है वो ये है कि तुम इसे बिना किसी नाराज़गी के स्वीकार करो ताकि तुम एक दिन परमात्मा के वास्तविक संसार में पहुंच सको।
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