अब हम सांची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार ।
छुटि जैहो या दुक्ख ते, तन सरवर के पार ।।
अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार
सुनते हो यह वचन! अब हम सांची कहत हैं, उडियो पंख पसार।... पंख खोलो और उहो! पंख तुम्हारे पास हैं। तुम भूल ही गए हो कि तुम्हारे पास पंख हैं। तुम्हें याद ही नहीं रही पंखों की। रहे भी कैसे। जन्मों—जन्मों से उड़े नहीं, खुले आकाश में पंख फैलाए नहीं। कारागृहों में रहने के आदी हो गए हो। हिंदू, मुसलमान, ईसाई, हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी, शुद्र, ब्राह्मण... न मालूम कितने कारागृहों के भीतर तुम रहने के आदी हो गए हो! पंख फड़फड़ाने की भी जगह नहीं है। सींकचे ही सींकचे हैं। और धीरे— धीरे तुम भूल गए हो। भूलना ही पड़ा है। नहीं तो अहंकार को बड़ी चोट लगती है कि मैं कारागह में पड़ा हूं! अहंकार के लिए यही सुविधापूर्ण है कि पंख ही नहीं हैं मेरे पास, मैं उडूं भी तो कैसे उडूं।
और तुम बातें भी करते रहते हो कि मैं उड़ना चाहता हूं। तुम मुक्ति की चर्चा भी चलाते हो। वह भी धोखा है, वह सिर्फ बातचीत है। वह असलियत से बचने का उपाय है।
इसलिए कहते हैं धनी धरमदास : अब हम सांची कहत है। धनी धरमदास कहते हैं कि तुम्हें भली लगे चाहे बुरी लगे, अब हम सांची ही कह रहे हैं कि पंख तुम्हारे पास हैं। पूछो मत कि हमारे पास पंख कैसे उग आएं पंख तुम्हारे पास हैं। आकाश मौजूद है। पैर तुम्हारे पास हैं। सुबह हो गई। आंख तुम्हारे पास है, खोलो तो प्रकाश है। परमात्मा एक क्षण को दूर नहीं है, पीठ किए खड़े हो। अब हम सांची कहते हैं।
सांची बात ठीक नहीं लगती। आदमी चाहता है कुछ ऐसी बात कहो जिससे मैं यह समझ पाऊं कि जो मुझसे भूल हुई, होनी ही थी, मजबूरी थी। अब भी हो रही है तो आवश्यक है, अनिवार्य है। कहावतें लोगों ने बना ली हैं।’’ टू इर इस ह्युमन '' भूल करना आदमी का स्वभाव है। इससे राहत मिलती है। तो हमसे भूल हो रही है, तो बिल्कुल स्वभाव हो रहा है, स्वाभाविक हो रहा है।
जब भी कोई तुमसे सांची बात कहेगा, चोट लगेगी। सांच में आंच है। जलाएगी आंच, भभकाएगी अग्नि तुम्हारे भीतर। झूठे आदमी अच्छे लगते हैं। क्योंकि झूठे आदमी तुम जैसे हो वैसे ही रहो, इसका तुम्हें आश्वासन देते हैं। वे कहते हैं, तुम बिल्कुल भले हो। वे तुम्हें सांत्वना देते हैं। झूठे आदमी लौरी गाते हैं तुम्हारे आसपास। वे तुम्हारी नींद को और गहरा करवाते हैं। वे कहते हैं: भइया, करवट बदल लो, और कम्बल हम ओढ़ाए देते हैं। और अभी तो बड़ा अंधेरा है, मजे से सोओ।
तुम उनके पास जाते हो जो तुम्हें सोने की विधियां देते हैं, जो तुम्हें नींद के उपाय बताते हैं। जो तुमसे कहते हैं कि अच्छे सपने कैसे देखो। हजारों किताबें लिखी जाती है इस संबंध में। डेल कारनेगी की बड़ी प्रसिद्ध किताबें हैं— '' हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लूएंस पीपल ''। मित्रता कैसे बढ़े, लोग कैसे जीते जाएं।’’ अभी अपने को जीता नहीं है, लोगों को जीतने चले! मगर लोग पढ़ते हैं। कहते हैं बाइबिल के बाद सबसे ज्यादा दुनिया में जो किताब बिकी है, वह यही है— डेल कारनेगी की किताब। बाइबिल के बाद! मतलब साफ है कि बाइबिल से ज्यादा बिक गई, क्योंकि बाइबिल खरीदता कौन है, मुफ्त बांटी जाती है। लोग बांटते ही रहते हैं बाइबिल। फिर हर ईसाई को रखनी ही पड़ती है घर में। न तो कोई कभी पढ़ता है, न कोई कभी पन्ने उलटता है। कौन पढ़ता है।
एक छोटे बच्चे से उसके पादरी ने पूछा कि तुमने अपना पाठ पूरा किया। बाइबिल पढ़ कर आए हो। क्या है बाइबिल में।
उस बच्चे ने कहा : सब मुझे मालूम है कि बाइबिल में क्या है।
उस पादरी ने कहा : सब तुम्हें मालूम है! सब तो मुझे भी नहीं मालूम।
क्या तुम्हें मालूम है।
उसने कहा कि मेरे पिताजी की लाटरी की टिकट है उसमें। मेरे छोटे भाई के बालों का गुच्छा है उसमें। मेरी मां ने एक ताबीज भी रखा हुआ है उसमें किसी हिमालय के आए हुए महात्मा ने दिया है। मुझे सब चीजें पता हैं कि उसमें क्या— क्या है।
कौन बाइबिल को देखता है! कौन बाइबिल को पढ़ता है! कौन खरीदता है! इस तरह की किताबें बिकती हैं: '' जीवन में सफल कैसे हों। सम्मान कैसे पाएं। धन कैसे पाएं। नेपोलियन हिल की प्रसिद्ध किताब है : '' हाउ टू ग्रो रिच ''। लाखों प्रतियां बिकी हैं।
ये सारे के सारे लोग तुम्हें विधियां दे रहे हैं कि और गहरी नींद कैसे सोओ, और मजे से कैसे सोओ, सेज फूलों की कैसे बने, सपने मधुर कैसे आएं, सपने रंगीन और टेक्नीकलर कैसे हों। अब ब्लैक और व्हाईट सपने बहुत देख चुके, अब सपनों में थोड़ा रंग डालो! थोड़े सपनों की कुशलता और कला सीखो। ये लौरिया गाने वाले लोग हैं।
इसलिए धनी धरमदास कहते हैं : अब हम सांची कहत हैं। अब तुम्हें भला लगे या बुरा, हम सच बात ही कह देते हैं कि तुम चाहो तो इसी वक्त, इसी क्षण उडियो पंख पसार। पंख तुम्हारे पास हैं। कारागृह किसी और की बनाई हुई नहीं है! तुम्हारी अपनी बनायी हुई है। कोई पहरेदार नहीं है। तुम्हीं कैदी हो, और तुम्हीं पहरेदार हो। तुम जब तक अपने को गुलाम रखना चाहते हो रहोगे। जब तक अंधे रहना चाहते हो, रहोगे। जिस दिन निर्णय करोगे कि अब नहीं अंधे रहना है, उसी क्षण क्रांति शुरू हो जाएगी। सिर्फ तुम्हारे निर्णय की देर है। सिर्फ तुम्हारे संकल्प के जगने की देर है। और किसी चीज की कमी नहीं है।
अब हम सांची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार ।
छुटि जैहो या दुक्ख ते, तन सरवर के पार ।।
और अगर उड़ सको, पंख फैला सको, अगर उसके आकाश को स्वीकार कर सको, अगर उसमें लचपच हो सको, अगर उसके रंग में पूरे सौ प्रतिशत रंगने का साहस हो, तो छुटि जैहो या दुःख ते... तो सारे दुःखों से मुक्त हो जाओगे।... तन सरवर के पार। तन के पार, सीमाओं के पार, देह के पार, मिट्टी के पार, मृण्मय के पार——चिमय की उपलब्धि हो जाएगी!
( Source : का सोवै दिन रैन--(प्रवचन--11)
No comments:
Post a Comment