Tuesday, 15 July 2025

सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते

मैंने सुना है कि एक बहुत अनूठा संन्यासी, बोधिधर्म, जब चीन गया बुद्ध का संदेश लेकर, तो सम्राट वू ने उससे पूछा कि संक्षिप्त में मुझे बता दें, मेरे पास ज्यादा समय नहीं है--तुम देख ही रहे हो कि साम्राज्य बड़ा है और मैं ज्यादा सत्संग नहीं कर सकता--मुझे संक्षिप्त में बता दो कि जीवन की सबसे बहुमूल्य बात क्या है? सबसे बड़ा सौभाग्य क्या है?
बोधिधर्म ने कहा, तुम समझ न पाओगे। सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि तुम पैदा ही न होते।
वू थोड़ा चौंका--यह कोई सौभाग्य की बात कर रहा है आदमी कि तुम पैदा ही न होते! पर निश्चित ही बोधिधर्म सौभाग्य की ही बात कर रहा है। बुद्धों की यही तो आकांक्षा है कि पैदा न होते।
पर, बोधिधर्म ने कहा, वह बात तो हो नहीं सकती--खतम। तुम हो ही गए पैदा। वह तो नंबर एक का सौभाग्य है। इसलिए नंबर दो की कहता हूं कि जितने जल्दी मर जाओ।
कहते हैं, वू फिर कभी मिलने नहीं आया बोधिधर्म को--कि यह भी कोई ज्ञानी है! लेकिन मैं भी तुमसे कहता हूं, नंबर एक का सौभाग्य कि तुम पैदा न हुए होते। लेकिन उस पर तो अब कोई बस नहीं, हो ही गए। तो अब दूसरा सौभाग्य है कि तुम जीते जी मर जाओ; जीवन से तुम्हारा राग-रंग छूट जाए। यह जीते जी मरने का अर्थ है: तुम ऐसे जीने लगो, जैसे तुम हो ही नहीं। बैठो बाजार में, क्योंकि कहीं तो बैठोगे ही; लेकिन ऐसे जैसे हो ही नहीं। पालो पत्नी-बच्चों को, पालना ही पड़ेगा; लेकिन ऐसे जैसे तुम हो ही नहीं। तुम अनुपस्थित हो जाओ। और जल्दी ही तुम पाओगे कि तुम्हारी अनुपस्थिति रिक्त नहीं रही, परमात्मा उसमें धीरे-धीरे उतर आया है।

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।

स्रोत : भज गोविंद मूढ़मते(आदि शंक्राचार्य) प्रवचन--01



३११. मरणाही आधी राहिलों मरोनी । मग केलें मनीं होतें तैसें ॥ १ ॥ 

४०२८. तुका म्हणे देह वाहिला विठ्ठलीं । तेव्हांच घडली सर्व पूजा ॥ ५ ॥
४०३२. सुखा आणि दुःखा । म्हणे वेगळा मी तुका ॥ ४ ॥
४०३३. आम्ही मेलों तेव्हां देह दिला देवा । आतां करूं सेवा कोणाची मी ॥ १ ॥ 

४०३४. आपुलें मरण पाहिलें म्यां डोळां । तो झाला सोहळा अनुपम्य ॥ १ ॥ आनंदें दाटलीं तिन्ही त्रिभुवनें । सर्वात्मकपणें भोग झाला ॥ २ ॥ एकदेशी होतों अहंकारें आथिला । त्याच्या त्यागें झाला सुकाळ हा ॥ ३ ॥
 

४०३५. मरण माझें मरोन गेलें । मज केलें अमर ॥ १ ॥ ठाव पुसिलें बुड पुसिलें । वोस वोसलें देहभाव ॥ २ ॥
४०३७. हातीं घेऊनियां काठीं । तुका लागला कलेवरा पाठी ॥ १ ॥ नेऊनि निजविलें स्मशानीं । माणसें जाळी तें ठिकाणीं ॥ २ ॥


४०३३. तुका म्हणे तुम्ही आइका हो मात । आम्ही या अतीत देहाहूनी ॥ ५ ॥
४०३३. बोलतसें जैसें बोलवितो देव । मज हा संदेह कासयाचा ॥ ३ ॥ पाप पुण्य ज्याचें तोचि जाणे कांहीं । संबंध हा नाहीं आम्हांसवें ॥ ४ ॥

४०३९. जाला प्रेतरूप शरीराचा भाव । लक्षियेला ठाव स्मशानींचा ॥ १ ॥ रडती रात्रंदिवस कामक्रोधमाया । म्हणती हायहाय यमधर्म ॥ २ ॥ वैराग्याच्या शेणी लागल्या शरीरा । ज्ञानाग्नि लागला ब्रह्मत्वेंसी ॥ ३ ॥ फिरविला घट फोडिला चरणीं । महावाक्य ध्वनि बोंब झाली ॥ ४ ॥ दिली तिळांजुळी कुळनामरूपासी । शरीर ज्याचें त्यासी समर्पिलें ॥ ५ ॥ तुका म्हणे रक्षा झाली आपोआप । उजळला दीप गुरुकृपा ॥ ६ ॥

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